Women's Day 2025: पति के निधन के बाद भी नहीं हारीं हिम्मत, जहां की थीं मजदूरी, आज वहीं से विकास की गाथा लिख रहीं ललिता उरांव
Published by : Guru Swarup Mishra Updated At : 08 Mar 2025 6:11 AM
डाटा एंट्री करतीं और खेतों में काम करतीं मुखिया ललिता उरांव
Women's Day 2025: लोहरदगा के उडुमुडू में पंचायत भवन निर्माण के दौरान मजदूरी करनेवाली ललिता उरांव आज उसी भवन में बैठकर विकास की गाथा लिख रही हैं. पति के निधन के बाद भी वह हिम्मत नहीं हारीं और तीसरी बार चुनाव जीतकर पंचायत की मुखिया हैं.
Women’s Day 2025: कुड़ू (लोहरदगा), अमित राज-शादी के पांच साल बाद ही ललिता के पति का निधन हो गया था. दो छोटी-छोटी बच्चियों की जिम्मेदारी माथे पर आ गयी, लेकिन हालात से वह हार नहीं मानीं. ससुराल छोड़ मायके पहुंची ललिता ने बच्चियों के पालन पोषण के लिए दिहाड़ी मजदूरी का काम किया. ललिता कभी जिस पंचायत सचिवालय में दिहाड़ी मजदूर का काम करती थी, पिछले 16 सालों से उसी पंचायत भवन में बैठ पंचायत के विकास की गाथा लिख रही हैं. हम बात कर रहे हैं कुड़ू प्रखंड के उडुमुड़ू पंचायत की मुखिया ललिता उरांव की. ललिता उरांव की कहानी संघर्ष से भरी है.
राजू उरांव से हुई थी शादी
कुड़ू प्रखंड के उडुमुड़ू गांव की रहनेवाली ललिता उरांव की शादी वर्ष 2000 में लोहरदगा सदर थाना क्षेत्र के राजू उरांव के साथ हुई थीं. ललिता ने दो पुत्रियों महिमा कुजूर तथा करिश्मा कुजूर को जन्म दिया. साल 2005 में ललिता के पति राजू उरांव की मौत बीमारी से हो गयी. घटना के बाद ललिता पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. ससुराल में उसे ताना दिया जाने लगें. इनसे उब कर साल 2006 मे दोनों बेटियों को लेकर ललिता अपने मायके आ गयी. उस समय बड़ी बेटी की उम्र तीन साल तथा छोटी बेटी का उम्र एक साल थी. मायके में आने के बाद ललिता ने बेटियों की परवरिश के लिए दिहाड़ी मजदूरी का काम करना शुरू किया. साल 2008 में उडुमुडू में पंचायत भवन का निर्माण हो रहा था. वहां वह मजदूरी करने लगी. इसी दौरान ललिता ने प्रण लिया कि कभी मौका मिला तो इसी पंचायत भवन में बैठकर गांव की विधवा महिलाओं का कल्याण करुंगी.
26 वोट से चुनाव जीतकर पहली बार बनीं मुखिया
साल 2010 में पंचायत चुनाव की घोषणा हुई. ललिता ने मुखिया पद के लिए नामांकन किया . ललिता के पास न तो पंपलेट, बैनर, पोस्टर छपवाने के लिए पैसा था, ना कोई पहचान. इतना ही नहीं उडुमुड़ू के दो दिग्गज परिवारों से उनका मुकाबला था. पंचायत चुनाव में ललिता ने पैदल डोर टू डोर प्रचार किया और अपनी लाचारी बतायी. चुनाव परिणाम जब आया तो ललिता महज 26 वोट से चुनाव जीतकर पहली बार मुखिया बनीं. उन्होंने पांच सालों तक गांव का विकास किया. गांव की विधवा, वृद्ध महिलाओं को पेंशन दिलायी. इस दौरान परिवार को संभालने के लिए खेतों में काम भी किया.
तीसरी बार बनीं उडुमुड़ू पंचायत की मुखिया
साल 2015 में उडुमुड़ू पंचायत को चुनाव आयोग ने आदिवासी सुरक्षित सीट बना दिया, जहां आदिवासी महिला तथा पुरुष कोई भी चुनाव लड़ सकता था. 12 उम्मीदवारों ने नामांकन किया. इसमें चार रसूखदार थे. बावजूद इसके ललिता 749 वोट से चुनाव जीतने में सफल रहीं. साल 2022 में ललिता 1700 वोट से चुनाव जीत कर तीसरी बार उडुमुड़ू पंचायत की मुखिया बनीं. ललिता उरांव ने बताया कि हिम्मत से कोई भी राह मुश्किल नहीं है सिर्फ जज्बा होना चाहिए. ललिता उरांव विधवा महिलाओं के लिए एक प्रेरणा हैं.
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लेखक के बारे में
By Guru Swarup Mishra
मैं गुरुस्वरूप मिश्रा. फिलवक्त डिजिटल मीडिया में कार्यरत. वर्ष 2008 से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से पत्रकारिता की शुरुआत. आकाशवाणी रांची में आकस्मिक समाचार वाचक रहा. प्रिंट मीडिया (हिन्दुस्तान और पंचायतनामा) में फील्ड रिपोर्टिंग की. दैनिक भास्कर के लिए फ्रीलांसिंग. पत्रकारिता में डेढ़ दशक से अधिक का अनुभव. रांची विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एमए. 2020 और 2022 में लाडली मीडिया अवार्ड.
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