हजारीबाग के कटकमसांडी के मीठा तालाब में पहली बार होगी मोती की खेती
Published by : Prabhat Khabar News Desk Updated At : 10 Aug 2024 7:28 PM
झारखंड में पहली बार हजारीबाग जिले के कटकमसांडी के मीठा तालाब में मोती की खेती की जायेगी.
(प्रशिक्षण)
मोती की खेती से चमकेगी किसानों की किस्मत
प्रतिनिधि, हजारीबागझारखंड में पहली बार हजारीबाग जिले के कटकमसांडी के मीठा तालाब में मोती की खेती की जायेगी. सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ फिसरी एजुकेशन मोती की खेती के लिए तीन दिवसीय प्रशिक्षण शनिवार को शुरू हुआ. इसमें जिले भर के 50 मत्स्य पालकों ने हिस्सा लिया. प्रशिक्षण एससीएसपी योजना के तहत दिया जा रहा है. मत्स्य विभाग के डायरेक्टर एचएन द्विवेद्वी और सीआइएफइ मुंबई के मछली विशेषज्ञ डॉ प्रेम कुमार ने प्रशिक्षणार्थियों को प्रशिक्षण दिया. प्रशिक्षक डॉ प्रेम कुमार ने बताया कि कृषि की तरह पानी में भी एक्कीकृत मल्टी लेयर एक्वा कल्चर से मत्स्य पालन और मोती की खेती जायेगी. उन्होंने बताया कि इस तकनीक से एकही साथ मत्स्य पालक जलाशयों से मछली, पानी फल सिंघाड़ा और मोती का उत्पादन कर सकते हैं. इससे मत्स्य पालकों को आर्थिक उन्नति में सहयोग होगा. उन्होंने बताया कि पानी के अंदर बन रहे ऑर्गेनिक एक्सटेटिव लोड जैसे अमोनिया से शिप में मोती का उत्पादन होगा. पानी में इन ऑर्गेनिक स्टेक्टिव लोड जैसे नाइट्रोजन और फासफोरस बनता है. इन रसायनों का उपयोग कर जलाशयों में पानी फल सिंघाड़ा का उत्पादन करेंगे.
इस तरह किसान कर सकते हैं मोती की खेती
डॉ कुमार ने बताया कि पानीफल सिंघाड़ा चार महीने में, मछली आठ महीने में और मोती 18 महीने में उत्पादन होता है. 10 हजार सीपों को तालाब में डाला जा सकता है. एक सीप की कीमत 10 रुपए पड़ती है. इससे ये बारिश में नेचुरल हो जाएगा. सीप डालने से पहले तालाब को कल्चर करना पड़ता है. इसके लिए इसमें गोबर का घोल और सीप के भोजन के लिए समुद्री शैवाल का चूरा डाला जाता है. जिला मत्स्य पदाधिकारी प्रदीप कुमार ने बताया कि एकीकृत मल्टी लेयर एक्वाकल्चर से मत्स्य पालकों की आर्थिक उन्नति होगी. साथ ही पर्यावरण स्थिरता में भी मदद मिलेगी. किसानों को कम लागत में, कम जोखिम और बेहतर उत्पादन से वंचित समुदायों में रोजगार का सृजन होगा.
15 से 18 महीने में तैयार होता है मोती
सीपों को नायलॉन बैग में रखकर बांस के सहारे तालाब में एक मीटर की गहराई पर लटका दिया जाता है. सीप के आकार के आधार पर एक सीप में दो से चार पर्ल न्यूक्लियस को डाला जाता है. अंदर से निकलने वाले पदार्थ पर्ल न्यूक्लियस के चारों ओर जमने लगते हैं, जो बाद में मोती का रूप ले लेते हैं. 15 से 18 महीने बाद सीप को चीरकर मोती निकाल लिया जाता है. अभी डिजाइनर मोती खासे पसंद किए जा रहे हैं. इसकी बाजार में काफी डिमांड है.प्रशिक्षणार्थियों में उत्साह :
मोती की खेती का प्रशिक्षण को लेकर प्रशिक्षणार्थियों में काफी उत्साह देखा गया. प्रशिक्षण ले रहे कटकमसांडी के मत्स्य पालक राजेंद्र रविदास ने कहा कि इस विधि का उपयोग कर मत्स्य पालक अधिक आमदनी कर पायेंगे.डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है
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