Giridih News :पाप से बचना है, तो उसके कारणों से बचें : प्रमाण सागर

Giridih News :पाप केवल बड़े अपराधों से ही नहीं, बल्कि हमारी असावधानी, प्रमाद और अज्ञान से भी होता है. यह बात जैन मुनि मुनि श्री प्रमाण सागर ने गुणायतन संस्था में आयोजित संध्याकालीन शंका समाधान सभा में कही.
उन्होंने कहा कि केवल पाप से डरना पर्याप्त नहीं है, बल्कि जीवन को शुभ दिशा देना भी आवश्यक है. भगवान का स्मरण, स्वाध्याय, जप, ध्यान और सत्संग मन को निर्मल बनाते हैं तथा मन शुभ कार्यों में लगने पर अशुभ प्रवृत्तियां स्वतः समाप्त होने लगती हैं. मुनिश्री ने कहा कि पाप के निमित्त से बचोगे, तभी पाप से बच पाओगे. बताया कि पाप बाहर से नहीं, बल्कि व्यक्ति के भीतर की असावधानी और प्रमाद से जन्म लेता है. जो व्यक्ति अंतरंग रूप से जागरूक रहता है, वहीं आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ता है. उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति सजग होकर जीवन जीना शुरू करता है, तब उसके व्यवहार में परिवर्तन आने लगता है. यदि चलने, बोलने, खाने, कमाने और व्यवहार करने में यह विवेक जाग जाये कि मेरे कारण किसी जीव को कष्ट तो नहीं पहुंच रहा, तभी धर्म का वास्तविक आरंभ होता है.
जैन दर्शन में समिति और गुप्ति के महत्व पर प्रकाश डाला
जैन दर्शन में समिति और गुप्ति के महत्व पर प्रकाश डालते हुए मुनिश्री ने कहा कि सावधानीपूर्वक चलना, संयमित वाणी बोलना, मर्यादित भोजन करना तथा शुद्ध भाव से व्यवहार करना पाप के द्वार बंद करने का माध्यम है. धर्म केवल विचार नहीं, बल्कि व्यवहार और चरित्र का विषय है. गृहस्थ जीवन के लिए बताये गये अष्टमूलगुणों का उल्लेख करते हुए मुनिश्री ने कहा कि मद्य, मांस, मधु (शहद) तथा पांच उदुंबर फलों बड़, पीपल, पाकड़, उमर और कठूमर का त्याग करने वाला ही अष्टमूलगुणों का धारक कहलाता है. इन पदार्थों के सेवन में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हिंसा जुड़ी होने के कारण इनका त्याग आवश्यक है. उन्होंने गुटखा, तंबाकू और अन्य नशीले पदार्थों से दूर रहने तथा दवाइयों में मद्य और शहद के उपयोग से बचने की भी प्रेरणा दी.
अहिंसा सिद्धांत नहीं, जीवनशैली है
मुनिश्री ने कहा कि अहिंसा केवल एक सिद्धांत नहीं, बल्कि जीवनशैली है. जैनत्व की पहचान बाहरी नाम से नहीं, बल्कि संयमित आचरण से होती है. धर्म और अध्यात्म के अंतर को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि धर्म बाहरी आचरण, पूजा, व्रत और विधियों से जुड़ा होता है, जबकि अध्यात्म आत्मजागृति, आत्मचिंतन, संवेदनशीलता और आत्मानुभूति से संबंधित है. धर्म को ‘किया’ जाता है, जबकि अध्यात्म को ‘जिया’ जाता है. उन्होंने कहा कि हर धार्मिक व्यक्ति आध्यात्मिक हो, यह जरूरी नहीं, लेकिन जो वास्तव में आध्यात्मिक होता है, उसके जीवन में धर्म स्वतः उतर आता है. मौके पर काफी संख्या में श्रद्धालु मौजूद थे.
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