धनबाद में गड़बड़झाला: रैयतों की जमीन बनी सरकारी, 15 हजार परिवारों पर छाया संकट

धनबाद के बेलगड़िया में झरिया के विस्थापितों के लिए बने फ्लैट. फोटो: प्रभात खबर
Dhanbad News: धनबाद के बेलगड़िया पुनर्वास परियोजना में बीसीसीएल द्वारा अधिग्रहीत 378 एकड़ जमीन का बड़ा हिस्सा “गैर आबाद” पाया गया. म्यूटेशन अटकने से झरिया के 15 हजार विस्थापित परिवारों का पुनर्वास प्रभावित हो रहा है. प्रशासनिक और कानूनी जटिलताओं के कारण जमीन के मालिकाना हक और आवास आवंटन पर संकट मंडरा रहा है. इससे संबंधित पूरी खबर नीचे पढ़ें.
धनबाद से शोभित रंजन की रिपोर्ट
Dhanbad News: झारखंड की कोयलानगरी धनबाद के बेलगड़िया पुनर्वास परियोजना में जमीन से जुड़ा एक बड़ा गड़बड़झाला सामने आया है. इससे हजारों विस्थापित परिवारों के भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं. बीसीसीएल द्वारा रैयतों से अधिग्रहीत की गई करीब 378.39 एकड़ जमीन का बड़ा हिस्सा हालिया सर्वे में “गैर-आबाद” (सरकारी) पाया गया है. इस विसंगति के कारण जमीन का म्यूटेशन अटक गया है. अब पूरे अधिग्रहण की वैधता पर ही सवाल उठने लगे हैं. सवाल उठ रहा है कि आखिर इसके पीछे जिम्मेदार कौन है और आगे इस जमीन का क्या होगा? अगर कागज पर जमीन ही सरकारी हो गई, तो बेलगड़िया में बसे लोग किस आधार पर मालिक बनेंगे?
विस्थापितों के पुनर्वास के लिए जमीन अधिग्रहण
बेलगड़िया में झरिया के अग्नि प्रभावित और अति खतरनाक क्षेत्रों से विस्थापित परिवारों को बसाने के लिए बीसीसीएल ने बड़े पैमाने पर जमीन अधिग्रहीत की थी. यह अधिग्रहण पुराने सर्वे रिकॉर्ड के आधार पर हुआ था. लेकिन हालिया सर्वे में बड़ा हिस्सा “गैर आबाद” दर्ज कर दिया गया. इसका खुलासा खाता संख्या की जांच के दौरान हुआ. इससे जमीन का नेचर बदल गया और म्यूटेशन की प्रक्रिया उलझ गई. अब तक केवल 47.32 एकड़ जमीन का ही म्यूटेशन बलियापुर अंचल कार्यालय द्वारा किया जा सका है. यानी अब तक मात्र 12.50 प्रतिशत जमीन का म्यूटेशन हुआ है.
मंत्रालय के पत्र से खुली पोल
मामले का खुलासा तब हुआ, जब कोयला मंत्रालय ने 24 मार्च 2026 को धनबाद उपायुक्त को पत्र भेजकर बेलगड़िया की 378 एकड़ जमीन का म्यूटेशन जल्द पूरा करने का निर्देश दिया है. पत्र में स्पष्ट कहा गया है कि झरिया पुनर्वास योजना के तहत विस्थापितों को घर और जमीन देने के लिए म्यूटेशन अनिवार्य है. बीसीसीएल द्वारा सर्किल ऑफिस में आवेदन देने के बावजूद सर्वे गड़बड़ी के कारण प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पा रही है.
क्यों अटका म्यूटेशन, समझिए असली वजह
अधिग्रहण के बाद नए सर्वे में बीसीसीएल द्वारा दावा प्रस्तुत नहीं किया गया. इससे कई जमीनें “गैर-आबाद” दर्ज हो गईं. इन्हें सरकारी जमीन मानकर एनजीडीआरएस की प्रतिबंधित सूची में डाल दिया गया. प्रतिबंधित सूची में आने से रजिस्ट्रेशन और म्यूटेशन पूरी तरह रुक गया. सबसे बड़ी समस्या यह है कि ऐसे मामलों के समाधान को लेकर अब तक सरकार की ओर से कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी नहीं हुआ है.
कैसे पूरा होगा पुनर्वास
- कुल प्रस्तावित आवास: 18,272 (5940 करोड़ का प्रोजेक्ट)
- तैयार आवास: 16,336
- निर्माणाधीन: करीब 1,900
- आवंटन के लिए तैयार: 6,300
- आवंटन पत्र जारी: 5,000
- अब तक शिफ्ट हुए परिवार: 2,855
पहले चरण में 13,301 विस्थापितों को 99 साल की लीज पर मालिकाना हक देने का निर्णय लिया गया है.
2028 तक का लक्ष्य भी खतरे में
- झरिया के 81 अति खतरनाक अग्नि प्रभावित क्षेत्रों से हजारों परिवारों को चरणबद्ध तरीके से शिफ्ट किया जाना है.
- 2028 तक 15 हजार से अधिक परिवारों के पुनर्वास का लक्ष्य रखा गया है.
- लेकिन म्यूटेशन अटका रहने से जमीन का स्वामित्व हस्तांतरण और लीज प्रक्रिया बाधित हो रही है.
बंदोबस्त कार्यालय से हुई गड़बड़ी
- पुराने सर्वे के आधार पर अधिग्रहण कैसे हुआ?
- नये सर्वे में जमीन की स्थिति क्यों बदल गई?
- बीसीसीएल ने दावा क्यों नहीं किया?
- राजस्व और सर्वे विभाग की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे
अब क्या है विकल्प?
- मौजूदा स्थिति में इस विवाद का समाधान सिविल कोर्ट के जरिए ही संभव दिख रहा है.
- बीसीसीएल को अब कोर्ट में केस दायर करना होगा.
- कोर्ट के आदेश के बाद ही संबंधित जमीन को पंजी-2 में ट्रांसफर कर म्यूटेशन की प्रक्रिया पूरी हो सकेगी.
इसे भी जानें
- बेलगड़िया इलाके की जमीन का मूल अधिग्रहण 1986 के आसपास शुरू हुआ था, जब बीसीसीएल ने इसे ओपन कास्ट खनन परियोजना के लिए लिया था.
- इसके बाद 2004 में सरकार ने जेआरडीए के माध्यम से इस जमीन का उपयोग शुरू किया.
- 2006 में बेलगड़िया टाउनशिप के निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई.
- 2020 में 5,191 और इसके बाद 2023 से हाइकोर्ट के आदेश के बाद 21,039 रुपये प्रति डिसमिल की दर से मुआवजा दिया गया था.
- 1932 के रिकार्ड के हिसाब से जमीन सर्वे हुआ था.
क्या कहते हैं सीओ साहब
- सवाल : बेलगड़िया के जमीन का म्यूटेशन नहीं हो रहा है क्या मामला सही है?
- जवाब : हां, मामला सामने आया है. पुराने सर्वे रिकॉर्ड के आधार पर जिस जमीन को रैयतों से अधिग्रहित बताया गया था, हालिया सर्वे में उसी जमीन का बड़ा हिस्सा ‘गैर आबाद’ दिख रहा है. इससे रिकॉर्ड में अंतर स्पष्ट दिख रहा है और इसी वजह से म्यूटेशन प्रक्रिया प्रभावित हुई है.
- सवाल : किसकी जिम्मेदारी है, यह गलती किस स्तर पर हुई?
- उत्तर: यह एक जटिल मामला है. प्राथमिक तौर पर यह सर्वे और रिकॉर्ड में विसंगति का मामला लगता है. सर्वे का काम बंदोबस्त विभाग द्वारा किया जाता है. अब किससे गलती हुई, यह जांच के बाद ही स्पष्ट होगा.
- सवाल : अब क्या विकल्प हैं?
- जवाब : सबसे पहले रिकॉर्ड का मिलान जरूरी है. इसके लिए अब कंपनी सिविल कोर्ट में केस दायर करेगी. कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए, पंजी दो में बदलाव किया जायेगा. इसके बाद ही म्यूटेशन की प्रक्रिया शुरू हो पायेगी.
- सवाल : म्यूटेशन में क्या दिक्कत आ रही है?
- जवाब : मुख्य समस्या यह है कि वर्तमान सर्वे रिकॉर्ड में जमीन की श्रेणी गैर आबाद है. जमीन गैर आबाद होने के वजह से एनजीडीआरएस (प्रतिबंधित सूची ) में है. प्रतिबंधित सूची में आने से रजिस्ट्रेशन व म्यूटेशन की प्रक्रिया रुक गयी है. सबसे बड़ी समस्या यह है कि ऐसे मामलों के निष्पादन को लेकर अब तक सरकार की ओर से कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी नहीं किया गया है.
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क्या कहते हैं जानकार
अब प्रशासनिक स्तर पर समाधान संभव नहीं रह जाता. इसके लिए अदालत का सहारा लेने के अलावा कोई प्रभावी विकल्प नहीं बचता. कानूनी प्रक्रिया के तहत संबंधित पार्टी को जमीन पर अपने दावे और अधिग्रहण की वैधता को कोर्ट में साबित करना होगा. यदि अदालत पार्टी के पक्ष में फैसला देती है, तो उस आदेश के आधार पर अंचल अधिकारी (सीओ) राजस्व अभिलेखों में संशोधन करेंगे. इसके बाद संबंधित मौजा को पंजी-दो में दर्ज कर जमीन को कंपनी के नाम म्यूटेशन किया जा सकेगा. यह प्रक्रिया लंबी जरूर है, लेकिन वर्तमान विवाद के समाधान का यही सबसे वैधानिक और टिकाऊ रास्ता है.
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लेखक के बारे में
By KumarVishwat Sen
कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.
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