Dhanbad News: गोल्डन आवर में सही इलाज से बच सकती है मां की जान : डॉ शीला
Published by : ANAND KUMAR UPADHYAY Updated At : 17 May 2026 1:29 AM
Dhanbad News: डॉस्गोकॉन-2026 में सुरक्षित मातृत्व पर मंथन, पीपीएच, इंफर्टिलिटी और आधुनिक तकनीक पर देशभर के विशेषज्ञों ने साझा किये अनुभव.
धनबाद, धनबाद सोसाइटी ऑफ ऑब्सटेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजी (डॉस्गो) के स्वर्ण जयंती वर्ष पर बैंकमोड़ स्थित एक होटल में शनिवार से दो दिवसीय डॉस्गोकॉन-2026 सम्मेलन की शुरुआत हुई. देश के विभिन्न राज्यों से पहुंचे स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञों ने भाग लिया. पहले दिन पोस्ट पार्टम हेमरेज (पीपीएच) यानी प्रसव के बाद अत्यधिक रक्तस्राव की समस्या और उससे बचाव के उपायों पर विस्तृत चर्चा हुई. चिकित्सकों को पीपीएच की पहचान, आपातकालीन प्रबंधन, रक्तस्राव रोकने की तकनीक और समय पर रेफरल के बारे में विस्तार से जानकारी दी गयी. सम्मेलन में बड़ी संख्या में युवा डॉक्टरों और मेडिकल छात्रों ने भी हिस्सा लिया. लाइव डेमो, वैज्ञानिक सत्र और इंटरएक्टिव चर्चा के माध्यम से चिकित्सकों को नई चिकित्सा पद्धतियों की जानकारी दी गयी.
पीपीएच मातृ मृत्यु का बड़ा कारण
बेंगलुरू से आईं प्रसिद्ध गायनेकोलॉजिस्ट और इंडियन कॉलेज ऑफ ऑब्सटेट्रिक एंड गायनेकोलॉजी की चेयरपर्सन डॉ शीला माने ने कहा कि पोस्ट पार्टम हेमरेज (पीपीएच) आज भी मातृ मृत्यु का एक बड़ा कारण बना हुआ है. उन्होंने कहा कि प्रसव के बाद अत्यधिक रक्तस्राव होने पर शुरुआती एक घंटा सबसे महत्वपूर्ण होता है. इसे ही गोल्डन आवर कहा जाता है. यदि इस दौरान मरीज को सही इलाज, पर्याप्त दवाएं, ब्लड सपोर्ट और प्रशिक्षित मेडिकल टीम मिल जाए तो अधिकांश मामलों में जान बचायी जा सकती है. बताया कि पीपीएच से बचाव के लिए प्रसव के दौरान सतर्क निगरानी जरूरी है. गर्भवती महिलाओं का नियमित एंटीनेटल चेकअप, हीमोग्लोबिन की जांच और हाई रिस्क मरीजों की पहले से पहचान बेहद जरूरी है. उन्होंने कहा कि ग्रामीण और छोटे अस्पतालों में भी पीपीएच मैनेजमेंट की ट्रेनिंग दी जानी चाहिए ताकि गंभीर स्थिति में तुरंत उपचार शुरू हो सके. डॉ माने ने कहा कि सुरक्षित मातृत्व केवल डॉक्टरों की नहीं बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र की जिम्मेदारी है.
हर अस्पताल में लाइफरैप होना जरूरी : पूनम
दिल्ली से आई फॉक्सी की सेफ मदरहुड कमेटी की सदस्य पूनम ने सम्मेलन में लाइफरैप तकनीक के महत्व पर विस्तार से जानकारी दी. उन्होंने बताया कि लाइफरैप एक विशेष प्रकार का नॉन-न्यूमेटिक एंटी शॉक गारमेंट है, जिसका उपयोग अत्यधिक रक्तस्राव की स्थिति में मरीज की जान बचाने के लिए किया जाता है. कहा कि पीपीएच के मामलों में मरीज अक्सर अस्पताल पहुंचने से पहले ही गंभीर स्थिति में पहुंच जाती हैं. ऐसे समय में लाइफरैप शरीर के निचले हिस्से पर दबाव बनाकर रक्तसंचार को नियंत्रित करता है और मरीज को स्थिर रखने में मदद करता है. इससे मरीज को रेफर करने या आगे के इलाज के लिए समय मिल जाता है. कहा कि खासकर ग्रामीण और संसाधन की कमी वाले अस्पतालों में लाइफरैप बेहद उपयोगी साबित हो सकता है. इसकी मदद से कई मां की जान बचाई जा सकती है. उन्होंने कहा कि हर प्रसूति केंद्र और अस्पताल में लाइफरैप की उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए ताकि आपात स्थिति में तुरंत इसका उपयोग हो सके.
चिकित्सकों को दी गयी नयी तकनीक और चुनौतियों की जानकारी
बेंगलुरू, दिल्ली, मुंबई, कोलकाता समेत देश के कई हिस्सों से पहुंचे विशेषज्ञों ने आधुनिक प्रसूति एवं स्त्री रोग चिकित्सा से जुड़ी नई तकनीकों और चुनौतियों पर अपने अनुभव साझा किए. सम्मेलन में इंफर्टिलिटी, यूएसजी स्कैनिंग, एंटीनेटल चेकअप, हाई रिस्क प्रेग्नेंसी और लैप्रोस्कॉपी जैसे विषयों पर भी चर्चा हुई. विशेषज्ञों ने कहा कि तकनीक और समय पर जांच से जटिल गर्भावस्था के मामलों में काफी हद तक जोखिम कम किया जा सकता है.स्वर्ण जयंती वर्ष में विशेष आयोजन
डॉस्गो की सचिव डॉ रीना बरनवाल ने बताया कि संगठन के स्वर्ण जयंती वर्ष के अवसर पर डॉस्गोकॉन-2026 का आयोजन विशेष रूप से सुरक्षित मातृत्व और आधुनिक चिकित्सा तकनीकों को ध्यान में रखकर किया गया है. उन्होंने कहा कि सम्मेलन में देशभर के विशेषज्ञ चिकित्सक अपने अनुभव साझा कर रहे हैं, जिससे स्थानीय डॉक्टरों और युवा चिकित्सकों को काफी लाभ मिलेगा. उन्होंने बताया कि दो दिवसीय सम्मेलन में वैज्ञानिक सत्र, लाइव चर्चा और प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं.प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी
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