उद्धारक का बाट जो रहा गोरहौल शरीफ मजार

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उद्धारक का बाट जो रहा गोरहौल शरीफ मजार फोटो- 11 मजार के समीप मन्नत मांगते सचिव व अन्य. बोखड़ा. प्रखंड के भाउर पंचायत अंतर्गत गोरहौल शरीफ गांव के वार्ड नंबर एक में एक प्रसिद्ध मजार है, जहां सालों भर फरियादियों का आना-जाना लगा रहता है. ऐसी मान्यता है कि जो भी दुखिया सच्चे मन से […]

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उद्धारक का बाट जो रहा गोरहौल शरीफ मजार फोटो- 11 मजार के समीप मन्नत मांगते सचिव व अन्य. बोखड़ा. प्रखंड के भाउर पंचायत अंतर्गत गोरहौल शरीफ गांव के वार्ड नंबर एक में एक प्रसिद्ध मजार है, जहां सालों भर फरियादियों का आना-जाना लगा रहता है. ऐसी मान्यता है कि जो भी दुखिया सच्चे मन से यहां आ कर मन्नत मांगते हैं, उनकी मुराद अवश्य पूरी होती है. स्थानीय लोग बताते हैं कि आसपास के जिलों के अलावा यहां विदेश से भी लोग मन्नत मांगने आते हैं और उनकी मुराद पूरी होती है. वर्ष 1934 में बना था मजार दस संबंध में ग्रामीण व पूर्व सरपंच मो जावेद ने बताया कि हजरत बसारत करीम रहमतुल्लाह अल्लेह के निधन के बाद उक्त मजार की स्थापना की गयी, जहां सालों भर फरियादियों की भीड़ लगती रहती है. उक्त मजार के बगल में हजरत की पत्नी रफीका खातून का भी मजार है. गोरहौल शरीफ के नाम से प्रसिद्ध यह मजार किसी दार्शनिक स्थल से कम नहीं दिखता है, पर सरकार की ओर से अब तक कोई खास पहल नहीं की गयी है, जिसके चलते यह स्थल पर्यटन स्थल नहीं बन पाया है. बताया कि ग्रामीणों ने मजार के नाम पर 16 एकड़ एकड़ जमीन दिया था, जिसमें तालाब का निर्माण तो किया गया, पर अन्य सुविधाओं का घोर अभाव है. बताया यहां चादर चढ़ाने की प्रथा नहीं है, फरियादी सिर्फ प्रार्थना कर मन्नत मांगते है. पूर्व मंत्री ने की थी अनुशंसा ग्रामीणों ने बताया कि पूर्व में पूर्व मंत्री द्वय शाहिद अली खां व देवेश चंद्र ठाकुर ने उक्त मजार स्थल को पर्यटन स्थल का दर्जा देने के लिए तत्कालीन पर्यटन मंत्री से अनुशंसा किया था, पर अब तक इस दिशा में कोई कार्रवाई नहीं हुई है. अगर सरकार द्वारा अनुदान देकर इस स्थल का सौंदर्यीकरण करा दिया जाए तो यह धार्मिक स्थल प्रखंड ही नहीं जिला का एक धरोहर साबित होगा.

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