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मजदूरी कर बच्चों को दी शिक्षा, खुद मिथिला के लिए हैं समर्पित

Updated at : 30 Apr 2025 5:23 PM (IST)
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मजदूरी कर बच्चों को दी शिक्षा, खुद मिथिला के लिए हैं समर्पित

खुद भी मिथिला के लिए अपने को समर्पित कर दिया. जिससे आज मिथिला क्षेत्र में उनकी अलग पहचान बन गयी है.

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लक्ष्मीनिया धाम के संस्थापक भोगेंद्र शर्मा मिथिला के दशरथ मांझी के रूप में हुए चर्चितदर्जनों सम्मान से हो चुके हैं सम्मानित सहरसा कौन कहता कि जग में कर सकता क्या अकेला, लाखों में काम करता है सुरमा अकेला. इस कहावत को लक्षमीनियां धाम के संस्थापक दैनिक मजदूर भोगेंद्र शर्मा ने चरितार्थ कर दिखाया है. सत्तरकटैया प्रखंड स्थित लक्ष्मीनिया गांव में विद्यापति सांस्कृतिक परिसर लक्षमीनियां धाम का अकेले दम पर स्थापना करने वाले भोगेंद्र शर्मा के त्याग, तपस्या एवं समर्पण को देख लोग उन्हें मिथिला के दशरथ मांझी के रूप में जानने लगे हैं. गरीबी में जन्म होने एवं अशिक्षा के बाद भी उन्होंने ना सिर्फ अपने बच्चों को काबिल बनाया. खुद भी मिथिला के लिए अपने को समर्पित कर दिया. जिससे आज मिथिला क्षेत्र में उनकी अलग पहचान बन गयी है. साथ ही दर्जनों पुरस्कार से सम्मानित भी हुए हैं. इसके बावजूद वे आज भी मजदूरी कर अपने परिवार का पालन पोषण करते हैं. भोगेंद्र शर्मा ने बताया कि उन्हें बचपन से ही पेंटिंग के क्षेत्र में जन्मजात गुण मिले हैं. जिसके कारण हुए दूसरी कक्षा में पढ़ते हुए अपने घर के पालतु मवेशी गाय को चराने जाते थे. इस क्रम में सड़कों पर विभिन्न प्रकार की आकृति को बनाया करते थे. बचपन से ही उन्होंने बहुत सारी पेंटिंग बनायी जिसे सहरसा कॉलेज में प्रदर्शनी में शामिल किया गया. लेकिन वह बताते हैं कि दुर्भाग्यवश उनकी सभी पेंटिंग चोरी हो गयी. लेकिन उन्होंने फिर भी हार नहीं मानी. बल्कि कला के क्षेत्र में दरभंगा से उन्होंने चित्रकला का प्रशिक्षण प्राप्त किया. तब से वे पेंटिंग मजदूर के रूप में कार्य कर अपने परिवार का भरण पोषण करते मैथिली अभियान को जारी रखे हैं. उनके भगीरथ प्रयास से ही विद्यापति सांस्कृतिक परिसर लक्ष्मीनिया धाम की स्थापना हुई. इस धाम में राजा जनक, याज्ञवल्क्य, महाकवि विद्यापति, उगना महादेव, लोरिक, सल्हेस, दिनाभद्री, कारू खिरहर, मांगन खब्बास सहित अन्य महापुरुषों की प्रतिमा स्थापित की. साथ ही 15 फीट उंची मां जानकी की प्रतिमा भी बनायी. जो लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है. मैथिली भाषा को किया प्रचारित भोगेंद्र शर्मा ने बताया कि उन्होंने अपना सारा जीवन गरीबी में बिताया है. लेकिन उनके अंदर छिपी हुई प्रतिभा ने उन्हें चैन से नहीं रहने दिया. विशेष कर उन्होंने मैथिली अभियानी के रूप में मिथिला में घूम-घूम कर स्लोगन लिखकर मैथिली भाषा को प्रचारित एवं प्रसारित करने का काम किया. उन्हें एक पुत्र एवं दो पुत्री हैं. उन्होंने बताया कि एक लड़की मैट्रिक एवं दूसरी इंटर पास है. जिसकी शादी हो चुकी है. वहीं पुत्र शिक्षक के रूप में कार्यरत है. उन्होंने बताया कि लक्ष्मीनिया धाम की स्थापना के लिए 2001 से भिक्षाटन शुरू किया. वहीं 2006 से मंदिर निर्माण की प्रक्रिया शुरू की. 2014 में इसका उद्घाटन किया गया. 2017 में जानकी जी की विशाल प्रतिमा का अपने हाथों से निर्माण किया. उन्होंने बताया कि सांस्कृतिक परिसर में प्रत्येक वर्ष कार्तिक शुक्ल त्रयोदशी 19 नवंबर को स्थापना दिवस मनाया जाता है. वहीं इस धाम के द्वारा लोरिक सम्मान, मांगन खब्बास सम्मान, लोक कला सम्मान के साथ कवि गोष्ठी का भी आयोजन किया जाता है. इस धाम पर निरंतर विकास कार्य किया जा रहा है. जिसके तहत पूर्व विधायक स्व अब्दुल गफूर द्वारा सामुदायिक लोरिक सांस्कृतिक भवन का निर्माण कराया गया. वहीं प्रखंड प्रमुख के द्वारा सामुदायिक शौचालय का निर्माण किया गया है. जिसके कारण इस धाम पर आने वाले श्रद्धालुओं को काफी सहूलियत मिल रही है. दर्जनों पुरस्कार से हुए हैं सम्मानित भोगेंद्र शर्मा के त्याग, तपस्या एवं समर्पण को देखते हुए उन्हें अब तक कई पुरस्कार एव सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है. जिसमें मिथिला लोकमंच सम्मान लहेरियासराय में, मिथिला सेवा सम्मान, लोक कला मधुबनी, चेतना समिति पटना द्वारा सुलभ सेवा सम्मान, मिथिला विभूति सम्मान गुजरात में, मिथिला रत्न अयोध्या में, अंतर्राष्ट्रीय मैथिली सम्मेलन नेपाल में, चेतना समिति बनगांव एवं सुपौल द्वारा मिथिला शिरोमणि की उपाधि से सम्मानित किया गया है. भोगेंद्र शर्मा ने बताया कि दैनिक मजदूर के रूप में उन्होंने बहुत कष्ट एवं तपस्या से इस धाम का निर्माण किया है. जिससे आत्मिक सुख एवं अलौकिक आनंद की अनुभूति हो रही है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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