बिहार में लिवर ट्रांसप्लांट का एकमात्र सेंटर, आइजीआइएमएस में एक वर्ष से बंद है ट्रांसप्लांट

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 25 Nov 2019 8:36 AM

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साकिब पटना: राज्य में लिवर फेल्योर मरीजों को राहत मिलती नहीं दिख रही है. राज्य में लिवर ट्रांसप्लांट की सुविधा एकमात्र आइजीआइएमएस में उपलब्ध है, लेकिन, पिछले एक वर्ष से अधिक समय से यहां ट्रांसप्लांट बंद है. यहां पहला व अंतिम ट्रांसप्लांट 26 सितंबर, 2018 को हुआ था, इसके बाद फिर दुबारा नहीं हुआ. इसके […]

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साकिब

पटना: राज्य में लिवर फेल्योर मरीजों को राहत मिलती नहीं दिख रही है. राज्य में लिवर ट्रांसप्लांट की सुविधा एकमात्र आइजीआइएमएस में उपलब्ध है, लेकिन, पिछले एक वर्ष से अधिक समय से यहां ट्रांसप्लांट बंद है. यहां पहला व अंतिम ट्रांसप्लांट 26 सितंबर, 2018 को हुआ था, इसके बाद फिर दुबारा नहीं हुआ. इसके पीछे कारण बताया जा रहा है कि आम लोगों में जागरूकता की कमी के कारण यहां ट्रांसप्लांट बंद है. जबकि, इसके लिए सभी मशीनें व ट्रेंड डॉक्टर यहां मौजूद हैं. एक अनुमान के मुताबिक बिहार में हर वर्ष करीब चार हजार मरीजों को लिवर ट्रांसप्लांट की जरूरत होती है. लेकिन 100 से भी कम लोग लिवर ट्रांसप्लांट करवा पाते हैं. इसके लिए भी वह राज्य के बाहर जाते हैं.
आइजीआइएमएस प्रशासन का कहना है कि लिवर ट्रांसप्लांट के लिए डोनर चाहिए. मरीज के परिजन डोनेट करने के लिए तैयार नहीं होते. वहीं, ब्रेन डेड व्यक्ति के परिजन भी लिवर डोनेट नहीं करना चाहते. ऐसे में ट्रांसप्लांट हो नहीं पा रहा. हाल यह है कि आइजीआइएमएस में लिवर ट्रांसप्लांट करवाने के लिए सात लिवर फेल्योर मरीज कतार में हैं. यह स्थिति तब है जब आइजीआइएमएस में लिवर ट्रांसप्लांट करवाने में खर्च मात्र 10 से 15 लाख लगता है जबकि बिहार से बाहर निजी अस्पतालों में यह खर्च 25 से 35 लाख लगता है.
लिवर फेल्योर के मरीजों की बढ़ रही है संख्या
बिहार समेत पूरे देश में लिवर फेल मरीजों की संख्या में इजाफा देखने को मिला है. इसका मुख्य कारण फैटी लिवर, ज्यादा अल्कोहल का इस्तेमाल करना, हेपेटाइटिस जैसी बीमारी है. एक अनुमान के मुताबिक देश में तीन में से एक व्यक्ति फैटी लिवर की समस्या से परेशान है. ऐसे में विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले समय में यह समस्या और बढ़ेगी.
डोनर मिले, तो हो सकता है ट्रांसप्लांट
आइजीआइएमएस में लिवर ट्रांसप्लांट की सुविधा उपलब्ध है. हमने सफलतापूर्वक ट्रांसप्लांट 26 सितंबर 2018 को किया था. इसके बाद से फिर दुबारा ट्रांसप्लांट नहीं हुए क्योंकि हमें डोनर नहीं मिलते. अगर डोनर मिले तो हम फिर ट्रांसप्लांट कर सकते हैं. समाज में अंधविश्वासों और जागरूकता की कमी के कारण हमें डोनर नहीं मिलते.
डॉ मनीष मंडल, चिकित्सा अधीक्षक, आइजीआइएमएस पटना
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