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CM नीतीश की विधान परिषद सदस्यता रद्द करने की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग को जारी किया नोटिस

Updated at : 11 Sep 2017 1:57 PM (IST)
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CM नीतीश की विधान परिषद सदस्यता रद्द करने की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग को जारी किया नोटिस

नयी दिल्ली : बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के खिलाफ दायर याचिका पर सोमवार को सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राज्य निर्वाचन आयोग को नोटिस भेजा है. बिहार के मुख्यमंत्री द्वारा चुनाव ऐफिडेविट में जानकारी छिपाने का आरोप लगाते हुए उनकी विधान परिषद सदस्यता रद्द करने के लिए दाखिल की गई जनहित याचिका पर […]

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नयी दिल्ली : बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के खिलाफ दायर याचिका पर सोमवार को सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राज्य निर्वाचन आयोग को नोटिस भेजा है. बिहार के मुख्यमंत्री द्वारा चुनाव ऐफिडेविट में जानकारी छिपाने का आरोप लगाते हुए उनकी विधान परिषद सदस्यता रद्द करने के लिए दाखिल की गई जनहित याचिका पर निर्वाचन आयोग को यह नोटिस भेजा है. इसी वर्ष 31 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के एमएलसी की सदस्यता को रद्द करने को लेकर यह याचिका दायर की गयी थी. याचिकाकर्ता वकील मनोहर लाल शर्मा ने अपनी याचिका में कहा है कि नीतीश कुमार के खिलाफ आपराधिक मामला कोर्ट में चल रहा है और इस कारण वे किसी भी संवैधानिक पद पर आसीन नहीं हो सकते हैं.

याचिकाकर्ता वकील मनोहर लाल शर्मा ने अपने याचिका में कहा है कि नीतीश कुमार के खिलाफ पटना जिले के बाढ़ इलाके में 1991 में लोकसभा चुनाव के दौरान एक कांग्रेस कार्यकर्ता सीताराम सिंह की गोली मारकर हत्या करने का पटना हाईकोर्ट में मुकदमा चल रहा है. ऐसे हालात में, नीतीश जो कि विधान परिषद के सदस्य हैं, उनकी सदस्यता को रद्द करने की मांग की गयी है. मनोहर लाल शर्मा के मुताबिक नीतीश कुमार के खिलाफ उन्होंने यह याचिका राजद के कहने पर नहीं बल्कि निजी तौर पर दायर की है. इस याचिका में न्यायालय से सीबीआइ को इस मामले में नीतीश कुमार के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश देने का अनुरोध भी किया गया है. याचिका में कहा गया है कि प्रतिवादी संख्या दो ने कुमार के खिलाफ आपराधिक मामले की जानकारी होने के बावजूद उनकी सदन की सदस्यता रद्द नहीं की और प्रतिवादी आज तक संवैधानिक पद पर बने हुए हैं. अधिवक्ता ने चुनाव आयोग के वर्ष 2002 के आदेश के अनुसार कुमार की सदस्यता रद्द करने की मांग की है, जिसके अनुसार उम्मीदवारों को नामांकन पत्र के साथ हलफनामे में अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों का ब्योरा भी देना पड़ता है. उन्होंने दावा किया कि बिहार के मुख्यमंत्री ने वर्ष 2012 को छोड़कर वर्ष 2004 के बाद कभी भी अपने खिलाफ लंबित मामले की जानकारी नहीं दी.

इससे पहले हत्या के इसी मामले को आधार बनाकर बीते दिनों लालू प्रसाद की पार्टी राजद ने नीतीश कुमार से नैतिकता के आधार पर इस्तीफा देने की मांग की थी. राजद की तरफ से मांग की गयी थी कि 1991 में सीता राम सिंह, जिनकी हत्या हुई, उनके परिवार को आज भी न्याय की आस है. ऐसे में नीतीश कुमार के खिलाफ चल रहे केस में तेजी आनी चाहिए और स्पीडी ट्रायल भी कराया जाना चाहिए. साथ ही राजद ने आरोप लगाते हुए कहा था कि तेजस्वी यादव के खिलाफ सिर्फ बेनामी संपत्ति अर्जित करने को लेकर प्राथमिकी दर्ज की गयी थी और इसी को आधार मानकर नीतीश कुमार ने उनका इस्तीफा मांगा था. वहीं नीतीश के खिलाफ आपराधिक मामला चल रहा है और ऐसे मैं उन्हें अपने पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं है.

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