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अचार संहिता हटते ही एमयू पर बढ़ेगा शिक्षकों व कर्मियों के आंदोलन का दवाब

अचार संहिता हटते ही एमयू पर बढ़ेगा शिक्षकों व कर्मियों के आंदोलन का दवाब

आंदोलन के दौरान विश्वविद्यालय की मर्यादा बनाये रखना होगा बड़ा सवाल

मुंगेर. 4 जून को लोक सभा चुनाव की मतगणना के बाद आचार संहिता समाप्त हो जायेगा. जिसके बाद मुंगेर विश्वविद्यालय का आरडी एंड डीजे कॉलेज भी चुनाव अधिग्रहण से मुक्त हो जायेगा. इसके बाद एमयू पर अपने ही विद्यार्थियों, शिक्षकों और कर्मियों की मांगों का दवाब बढ़ेगा. जिसके लिये शायद आंदोलन भी हो. लेकिन इस दौरान एमयू की मर्यादा को बनाये रखने विश्वविद्यालय के अधिकारियों के लिये खुद विद्यार्थियों, शिक्षकों व कर्मियों के लिये बड़ा सवाल होगा.

लोक सभा चुनाव को लेकर आचार संहिता लग जाने के कारण छात्र संघ चुनाव व सीनेट चुनाव को स्थगित कर दिया गया था. जिसके लिये 4 जून के बाद छात्र संघ नेताओं और शिक्षक एवं शिक्षकेतर कर्मचारियों का दवाब विश्वविद्यालय पर बढ़ेगा. इतना ही नहीं दोनों चुनाव को जल्द से जल्द कराने को लेकर शिक्षक व कर्मचारी तथा छात्र संघ नेता अभी से मूड में आने लगे हैं. साथ ही शिक्षक प्रमोशन और कर्मचारियों के वेतन निर्धारण को लेकर भी शिक्षक व कर्मचारी विश्वविद्यालय पर दवाब डालेंगे. जिसे लेकर बीते दिनों एमयू के शिक्षकेत्तर कर्मचारी संघ और कुलसचिव के बीच बहस भी हो चुकी है. इस सब के बीच एमयू के लिये 4 जून के बाद एडवांस सेटलमेंट और सीनेट चुनाव संपन्न कराना भी बड़ी जिम्मेदारी होगा. यह सब, तब होगा, जब राजभवन द्वारा कुलपति के अधिकारों को सीमित कर दिया गया है. ऐसे में शिक्षक एवं कर्मियों सहित छात्र नेताओं का दवाब कुलसचिव पर बढ़ेगा.

मर्यादा बनाये रखना होगी बड़ी जिम्मेदारी

हाल के दिनों में एमयू में मर्यादाओं की सीमा को पार करने का जो मामला सामने आया है. उससे चार जून के बाद न केवल एमयू के अधिकारियों, बल्कि एमयू के शिक्षकों, कर्मचारियों और छात्र संघ नेताओं पर मर्यादा बनाये रखने की बड़ी जिम्मेदारी होगी. बता दें कि 9 मई को एमयू में शिक्षकेतर कर्मचारियों और कुलसचिव के बीच 83 कर्मियों के प्रमोशन की अधिसूचना जारी किये जाने तथा उनके वेतन निर्धारण को लेकर जिस प्रकार के बहस का विडियो सामने आया था. उससे एमयू के कर्मचारियों पर मर्यादा को लेकर बड़ा सवाल उठने लगा है. इतना ही नहीं 18 मई को विश्वविद्यालय में जिस प्रकार पीजी सेमेस्टर-3 के रिजल्ट को लेकर छात्र नेताओं व अधिकारियों के बीच हुए विवाद का मामला सामने आया था. उसने भी अब विश्वविद्यालय के मर्यादा को बनाये रखने पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है.

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