डर से बैरक में नहीं रहते जवान

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 28 Sep 2016 4:56 AM

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लापरवाही हाल कोर्ट बैरक का, कभी हो सकता है हादसा, अंधेरा रहता है कायम मधुबनी : कोर्ट की सुरक्षा में लगे 12 जवानों में से 11 जवानों ने बैरक की जर्जर हाल से डर कर बैरक को खाली कर दिया है. बैरक की हालत ऐसी है कि छत से लेकर दीवार तक में दरारें हैं. […]

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लापरवाही हाल कोर्ट बैरक का, कभी हो सकता है हादसा, अंधेरा रहता है कायम

मधुबनी : कोर्ट की सुरक्षा में लगे 12 जवानों में से 11 जवानों ने बैरक की जर्जर हाल से डर कर बैरक को खाली कर दिया है. बैरक की हालत ऐसी है कि छत से लेकर दीवार तक में दरारें हैं. चारों ओर पानी जमा है. छत से पानी रिसता है. ना तो पीने के पानी का इंतजाम ना ही शौचालय. जर्जर भवन के कारण संभावित दुर्घटना को देखते हुए तीन हवलदार व आठ जवानों ने बैरक को खाली कर दिया है. इन जवानों के जिम्मे ही कोर्ट की सुरक्षा है.
खुले में जाते हैं शौच खुले में शौच की प्रथा को रोकने के लिये केद्र से लेकर राज्य सरकार तक योजना बना रही है. कार्यक्रम चल रही हैं. पर इसका क्या हो कि कोर्ट बैरक में रहने वाले जवान आज खुले में शौच में जाने को मजबूर हैं. बैरक में रहने वाले हवलदार नागेश्वर यादव बताते हैं कि विगत साल आये भूकंप में बैरक के जवानों के लिए बने शौचालय पूरी तरह से टूट कर जर्जर हो गया है. जिस कारण जवान खुले में शौच जाने को मजबूर हैं.
सांप का लगा रहता है भय कोर्ट बैरक में सांप कीड़े का बसेरा हो गया है. हवलदार नागेश्वर यादव बताते हैं कि दो रोज पहले रात भर सांप के कमरे में रहने के कारण वे जागकर बिताये हैं. बैरक में िबजली भी नहीं है. बैरक के उपर बिजली विभाग का बकाया है. जिस कारण बिजली का कनेक्शन काट दिया गया है.
बैरक की होगी जांच
एस पी दीपक बरनवाल बताते हैं कि बैरक की जांच कर इसके बेहतर के लिये पहल की जायेगी.
1990- 92 में हुआ था निर्माण
साल 1990- 92 में के दशक में कोर्ट बैरक का निर्माण हुआ था. कोर्ट के महज कुछ मीटर की दूरी पर इस बैरक के निर्माण का उद्देश्य यह था कि कोर्ट की सुरक्षा में लगे जवानों को आने जाने व रहने में सहूलियत हो. पर इस बैरक के देख रेख की कभी पहल नहीं हुई. साल दर साल इस बैरक की हालत खराब होती गयी. आज स्थिति यह है कि इस बैरक में मात्र एक जवान ही रहते हैं. कभी सांप के कारण रात भर जागना पड़ता है तो कभी पानी के कारण.
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