आजादी की जंग लड़ने वाले पहले नायक थे महाराजा फतेह बहादुर शाही
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :22 Jan 2020 6:49 AM (IST)
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सुरेश कुमार राय, भोरे : आजादी की लड़ाई का बिगुल फूंकने वाले पहले योद्धा थे महाराजा फतेह बहादुर शाही, जिन्होंने गुलाम भारत में सबसे पहले अंग्रेजों से लोहा लिया. उन्होंने अपने जीते जी कभी भी अपने राज्य में अंग्रेजों को कर नहीं लेने दिया. लेकिन, विडंबना यह रही कि आजादी के इस नायक को आज […]
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सुरेश कुमार राय, भोरे : आजादी की लड़ाई का बिगुल फूंकने वाले पहले योद्धा थे महाराजा फतेह बहादुर शाही, जिन्होंने गुलाम भारत में सबसे पहले अंग्रेजों से लोहा लिया. उन्होंने अपने जीते जी कभी भी अपने राज्य में अंग्रेजों को कर नहीं लेने दिया. लेकिन, विडंबना यह रही कि आजादी के इस नायक को आज भुला दिया गया.
उनके हुस्सेपुर राज्य के अवशेषों को न तो संजोया गया और न ही सरकार द्वारा उनकी जन्म एवं कर्मस्थली की कभी सुधि ली गयी. अलबत्ता कुछ वर्ष पूर्व होने के कुछ वर्ष पूर्व बुद्धिजीवियों ने हुस्सेपुर में उनकी आदमकद प्रतिमा बनवाने की बात कही थी, लेकिन बिहार के गौरव की गाथा के एक ऐसे नायक जिन्होंने आजादी के लिए कई लड़ाइयां लड़ीं.
अपने भाई तक को उन्होंने इस लड़ाई में मार गिराया. आज उनकी सुधि लेने वाला कोई नहीं है. उन्हें हर राष्ट्रीय पर्व पर याद करना एक कर्मकांड सा हो सकता है, लेकिन हकीकत तो यहीं है कि फतेह बहादुर शाही यादों में ही सिमट कर रह गये हैं.
हुस्सेपुर राज्य के राजा सरदार बहादुर शाही के मरने के बाद पुत्र फतेह बहादुर शाही हुस्सेपुर राज्य के राजा बने. वे आजाद ख्यालात एवं उदार प्रवृत्ति के थे. औरंगजेब के खिलाफ उन्होंने मीर कासिम का सहयोग किया था. मीर कासिम को मुंगेर से बक्सर तक उनकी सैन्य सहायता प्राप्त होती रही.
1765 की इलाहाबाद संधि की शर्तों के मुताबिक बंगाल, बिहार व ओड़िशा के मामलों की, जो दीवानी शक्ति अंग्रेज को प्राप्त हुई, उसका फतेह बहादुर शाही ने विरोध किया. मुगल सम्राटों द्वारा अंग्रेजों की दीवानी का जो प्रमाणपत्र प्राप्त हुआ, उसकी बेतिया और हुस्सेपुर राज ने साथ मिलकर अनदेखी की. उन्होंने संयुक्त रूप से ईस्ट इंडिया कंपनी को चुनौती दी. बाद में बेतिया के शासक ने कंपनी के अधिकारियों से समझौता कर लिया.
मगर,फतेह बहादुर शाही ने हार नहीं मानी. वे प्रशासकों व कंपनी सरकार के सैनिकों से लड़ते रहे. थक-हार कर अंग्रेजों ने महाराजा फतेह बहादुर शाही के भाई वसंत शाही को मिला लिया तथा उन्हें हुस्सेपुर राज्य सौंपने का लालच दिया. वसंत शाही के धोखे से क्षुब्ध होकर फतेह बहादुर शाही ने वसंत शाही की तब हत्या कर दी, जब वे 25 घुड़सवारों के साथ कर वसूलने के लिए यादवपुर ठहरे थे.
दोनों की हत्या कर कंपनी ने सरकार की कमर ही तोड़ दी. फतेह बहादुर शाही द्वारा उत्पन्न की गयी स्थिति से थक कर अंग्रेजों ने कर की वसूली हुस्सेपुर में नहीं की. वारेन स्टिंग्स को इस बात की जानकारी हुई, तो उसने भी उनकी सैन्य शक्ति और श्रेष्ठता को दबाने कोशिश की, लेकिन वह असफल रहा. महाराज फतेह बहादुर शाही ने हुस्सेपुर से कुछ दूर जाकर अवध साम्राज्य के क्षेत्र में तमकुही राज की स्थापना की.
जब कंपनी सरकार का अाधिपत्य अवध साम्राज्य पर हो गया, तो तमकुही का साम्राज्य भी सीमित हो गया. 1790 के लगभग उन्होंने विद्रोही क्रियाकलाप त्याग और राजपाट अपने पुत्र को सौंप कर वे संन्यासी हो गये.
अंग्रेजों के सेनापति मीर जाफर को मारकर दी थी चुनौती : उनके किये गये कार्य कर रहे मित्र आर्या शाह की सूचना पर गुरिल्ला युद्ध में माहिर फतेह बहादुर शाही ने सैनिकों के साथ मिलकर उनके कैंप पर हमला बोल दिया, जिसमें अंग्रेजों के सेनापति मीर जाफर सहित कई लोग मारे गये. मीर जाफर के नाम पर ही मीरगंज शहर बनाया गया था.
तब अंग्रेजों के लिए यह पहला मौका था कि भारत में किसी ने इतनी बड़ी चुनौती दी थी. फतेह बहादुर शाही के मित्र आर्या शाह को जब यह लगा कि अंग्रेज उन्हें अपने कब्जे में लेकर मार डालेंगे, तब आर्या शाह ने अपने मित्र के हाथों अपनी समाधि तैयार करायी जिसमें उन्होंने हंसते-हंसते मौत को गले लगा लिया. आज भी शाह बतरहां में आर्या शाह का मकबरा मौजूद है.
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