गोपालगंज : आचार संहिता की भेंट चढ़ गयीं कई योजनाएं, दलों से जनता तक विकास के मुद्दे अहम
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :13 Mar 2019 8:56 AM (IST)
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संजय कुमार अभय गोपालगंज : यूपी और बिहार का सीमावर्ती इलाके में पिछले तीन दशक से हर चुनाव में गन्ना और गंडक मुख्य मुद्दा बनता था. राजनीतिक दलों के तरफ से तैयार किये जाने वाले चुनावी घोषणा पत्र में भी यह मुद्दा शामिल होता रहा. इसबार के लोकसभा चुनाव में भी गन्ना मुख्य मुद्दा बनने […]
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संजय कुमार अभय
गोपालगंज : यूपी और बिहार का सीमावर्ती इलाके में पिछले तीन दशक से हर चुनाव में गन्ना और गंडक मुख्य मुद्दा बनता था. राजनीतिक दलों के तरफ से तैयार किये जाने वाले चुनावी घोषणा पत्र में भी यह मुद्दा शामिल होता रहा. इसबार के लोकसभा चुनाव में भी गन्ना मुख्य मुद्दा बनने को तैयार हैं. गन्ना किसान कर्ज से डुबे हुए है. गन्ना किसानों पर लगभग 60 करोड़ का विभिन्न बैंकों का कर्ज हैं. कर्ज का चुकता करने की चिंता किसानों को खाये जा रही है.
पिछले चुनावों में विभिन्न राजनीतिक दलों के द्वारा किसानों के इस जख्म पर आश्वासन का मरहम लगाया गया. वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान एकडेरवा स्थित तिलंगही के मैदान में प्रधानमंत्री के दावेदार रहे नरेंद्र मोदी ने चुनावी सभा के दौरान मौजूद किसानों को संबोधित करते हुए कहा था,गोपालगंज में बने चीनी से अमेरिका में बैठे ओबामा चाय पियेंगे, तो दूसरे दिन बात तुरकहां में कांग्रेस के तरफ से राहुल गांधी ने गन्ना किसानों के दर्द को उठाते हुए किसानों के फटेहाली को दूर करने की भरोसा दिलायी. ब्रिटिश शासन काल से गोपालगंज गन्नांचल के नाम से विख्यात हैं. यहां किसानों का मुख्य नगदी फसल गन्ना हैं.
आज किसान शादी विवाह, इइलाज जैसे जरूरी कार्यों के लिए भी चीनी मिल में टकटकी लगाये हुए है. किसानों के बकाये मूल्यों का भुगतान नहीं मिलने के कारण उनमे मायूसी छायी हुई है. अकेले सासामुसा चीनी मिल में 40 करोड़ का बकाया है.
पिछले ही वर्षों का लगभग 12 करोड़ का बकाया है. चीनी मिलों की मनमानी के कारण सिधवलिया चीनी मिल पर किसानों का प्रदर्शन, धरना और आंदोलन हो चुका है. गन्ना किसानों को समय पर चालान नहीं मिलना. निर्धारित अवधि में भुगतान नहीं मिलना, फसल क्षति होने पर मुआवजा का नहीं मिलना सबसे बड़ा मुद्दा होगा.
तिरहुत और मिथिलांचल के इलाके में होने लगी विकास बनाम भ्रष्टाचार पर बहस
प्रभात खबर टोली, मुजफ्फरपुर. लोक सभा चुनाव के एलान के साथ ही तिरहुत और मिथिलांचल के इलाके में विकास बनाम भ्रष्टाचार पर बहस छिड़ गयी है. एनडीए जहां केंद्र और राज्य सरकार द्वारा किये गये विकास कार्यों को चुनावी मुद्दा बना रहा है.
वहीं, विपक्षी पार्टियां अब तक लंबित और आचार संहिता के कारण जिन कार्यों पर ब्रेक लग गये, उसे भुनाने की योजना बना रही. वैसे आखिरी चरण में मुद्दे गौण हो जाते और सामाजिक समीकरण ही हावी होता रहा है. पर, चौक चौराहों पर चर्चा शुरू हो गयी है. मुजफ्फरपुर शहर की कई ड्रीम प्रोजेक्ट पर आचार संहिता के कारण ब्रेक लग गया है.
सड़क, पुल, पुलिया एवं सरकारी भवन के निर्माण के लिए अब टेंडर नहीं होगा. जिले के विकास को गति देने के लिए 50 एकड़ में टेक्सटाइल पार्क बनाने का निर्णय लिया गया था. इसके लिए मड़वन में जमीन भी चिन्हित किया गया था. इससे जिले में रोजगार के अवसर सृजित होते. इसी तरह, लहठी उद्योग को और विकसित करने की योजना बनी थी. लाह की चूड़ी (लहठी) निर्माण के लिए आधुनिक मशीन स्थापित करने और लहठी बिक्री केंद्र खोलने की योजना बनी थी.
इन सभी काम के लिए बियाडा क्षेत्र के अतिरिक्त बखरी और झपहा में भी केंद्र खोलने की योजना बनी थी. इन कार्यों पर अब चुनाव बाद ही निर्णय हो पायेगा. इसी तरह मुजफ्फरपुर के अखाड़ाघाट पुल के समानांतर पूर्वी छोर में बूढ़ी गंडक नदी पर फोरलेन पुल बनाने की कवायद तेजी से चल रही थी. पुल निर्माण निगम ने डीपीआर बनाने के लिए एजेंसी से करार कर लिया था.
50 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान लगाया था. लेकिन, चुनाव की तारीखों के एलान के बाद यह प्रोजेक्ट भी ठंडे बस्ते में चला गया है. जिले में 91 करोड़ के लागत से बनने वाली 6 बड़ी सड़क का निर्माण अटका गया है….समस्तीपुर में भोला टॉकीज रेलवे गुमटी पर फ्लाई ओवर ब्रिज का निर्माण होना है.
रेलवे व राज्यसरकार में समझौते के तहत इसगुमटी पर फ्लाई ओवरब्रिज का निर्माण आरसीडी को करना है. रेलवे अपने हिस्से का खर्च राज्य सरकार को दे देगी. इस वर्ष जनवरी माह में जगह चिन्हित कर मिट्टी की जांच करायी थी. लेकिन, अब काम आगे बढ़ता नहीं दिख रहा है.
सीतामढ़ी में जाम की समस्या से निजात पाने के लिए वर्षों से बन रहा मेहसौल ओवरब्रिज का निर्माण कार्य भी प्रभावित होगा. वर्ष 2011 में रेलवे और राज्य सरकार ने संयुक्त रूप से ओवरब्रिज निर्माण का निर्णय लिया था. चुनाव की घोषणा हो जाने के बाद इसका निर्माण भी प्रभावित होगा.
कोसी-पूर्व बिहार इन मुद्दों पर है नजर
भागलपुर : कोसी-पूर्व बिहार की राजनीति में जातीय व व्यक्तिवादी सोच पर आधारित वोट का गणित बड़ी भूमिका निभाती रही है. भागलपुर में विक्रमशिला सेतु एक बड़ा मुद्दा बन सकता है. हालांकि इसके आसपास ही समानांतर पुल बनाने की घोषणा हो चुकी है, लेकिन लगातार चल रहे भीषण जाम से सभी वर्गों के लोग परेशान हैं. कोढ़ में खाज की तरह कटिहार का कुरसेला कोसी पुल के क्षतिग्रस्त पुल ने आर्थिक रूप से भी 10 जिलों के बाजार को प्रभावित किया है.
यह मसला सीधे वोटरों से जुड़ा है. वैसे ही भागलपुर की महत्वाकांक्षी एनएच-80 व बाइपास भी बड़े मुद्दे के रूप में सामने आ सकता है. बाइपास निर्माण की गति कतिपय कारणों से काफी धीमी है. इस योजना से केवल भागलपुर ही नहीं, बल्कि बांका, नवगछिया, कटिहार के लोग भी प्रभावित हैं. मधेपुरा में शुरू हुए रेल कारखाना व अमान परिवर्तन, मेडिकल कॉलेज मधेपुरा चर्चा का केंद्र है
पूर्णिया में कोसी-पूर्व बिहार की सबसे बड़ी मंडी गुलाबबाग मंडी में मूलभूत सुविधा, हाइकोर्ट बेंच की स्थापना और सौरा नदी के संरक्षण का मुद्दा भी इस बार उठ सकता है. मुंगेर में अपराध नियंत्रण भी केंद्र में है.
मगध प्रमंडल के तीन संसदीय क्षेत्र
मुद्दे, जाे नहीं हुए पूरे
कंचन, गया. लाेकसभा चुनाव के पहले चरण में मगध प्रमंडल के तीन जिले गया, नवादा व आैरंगाबाद में 11 अप्रैल काे मतदान है. गया शहर में फ्लाई अाेवर के निर्माण और पाैराणिक, ऐतिहासिक व धार्मिक नगरी गया के लिए एक्शन प्लान का मुद्दा इस बार गरमाया हुआ है. गया से डाल्टेनगंज व गया से चतरा रेल लाइन बिछाने के लिए सर्वे का काम दाे-दाे बार हुआ पर निर्माण काम अब तक नहीं शुरू हुआ.
नवादा में बरही-बख्तियारपुर वाया पटना एनएच 31 काे फाेर लेन करने और नवादा में वारिसलीगंज चीनी मिल व गया में गुरारू चीनी मिल काे चालू कराने की मांग उठती रही है.वारिसलीगंज चीनी मिल फरवरी 1993 में बंद हुआ था. 72 एकड़ में बने इस मिल में सात साै कर्मचारी थे, जिनके परिवार का निवाला छिन गया. आैरंगाबाद में उतर कोयल नहर परियोजना, हड़ियाही नहर परियोजना, बिहटा-औरंगाबाद रेल लाइन का मुद्दा छाता रहा.
उतर कोयल नहर परियोजना का शिलान्यास किया गया है. इससे बिहार व झारखंड की सवा लाख हेक्टेयर भूमि सिंचित होगी. इसमें एक लाख औरंगाबाद व बाकी झारखंड के पलामू जिले की जमीन शामिल है.
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