ममता का आभामंडल टूटा, पार्टी में अंदरूनी दरारें उजागर, हार के बाद अस्तित्व के संकट से जूझ रही तृणमूल
Published by : Ashish Jha Updated At : 11 May 2026 8:23 AM
ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी
Mamata Banerjee: 71 वर्षीय ममता बनर्जी आज भी तृणमूल की सबसे बड़ी नेता हैं, लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं. चुनावी नतीजों ने 2011 से तृणमूल के चारों ओर बने अजेय होने के आभामंडल को भी तोड़ दिया है.
मुख्य बातें
Mamata Banerjee: कोलकाता. राज्य में भाजपा के पहले मुख्यमंत्री के रूप में शुभेंदु अधिकारी के शपथ लेने के कुछ ही घंटों बाद शनिवार शाम को राज्यभर के कई तृणमूल कांग्रेस कार्यालयों में अविश्वास और बेचैनी का माहौल दिखा. दक्षिण बंगाल के एक पार्टी कार्यालय में कार्यकर्ता चुपचाप टीवी स्क्रीन पर भाजपा के जश्न के दृश्य देखते रहे. चाय के कप वैसे ही पड़े रहे और बातचीत में बार-बार एक ही सवाल उठ रहा था : ममता बनर्जी ने पिछले 28 वर्षों में जो राजनीतिक संगठन खड़ा किया था, उसका अब क्या होगा ? इनमें से 13 साल उन्होंने विपक्ष में और पिछले 15 साल सत्ता में बिताये.
मौजूदा संकट महज चुनावी नहीं
तृणमूल के लिए मौजूदा संकट अब केवल चुनावी नहीं रह गया है, बल्कि यह संगठनात्मक, मनोवैज्ञानिक और अस्तित्व से जुड़ा संकट बन चुका है. नतीजों के तुरंत बाद ही अंदरूनी तनाव के संकेत सामने आने लगे. जो नेता कुछ दिन पहले तक पार्टी नेतृत्व का बचाव कर रहे थे, वे अब अलग-अलग सुर में बोलने लगे हैं, जिससे लंबे समय से छिपी दरारें उजागर हो गयी हैं.
आइ-पैक को लेकर पार्टी में रोष
तृणमूल के वरिष्ठ नेता असित मजूमदार ने नेतृत्व के कुछ वर्गों पर अहंकार और प्रशासनिक निष्क्रियता का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि गुटबाजी के कारण शासन और विकास परियोजनाएं ठप हो गयीं. वहीं वरिष्ठ सांसद कल्याण बनर्जी ने राजनीतिक सलाहकार संस्था आइ-पैक को दोषी ठहराते हुए संगठन के भीतर तोड़फोड़ की बात कही. विरोध अभी खुलकर सामने नहीं आया है, लेकिन बंगाल का राजनीतिक इतिहास बताता है कि ऐसे क्षण अक्सर बड़े बदलाव की शुरुआत का संकेत होते हैं.
तृणमूल को तृणमूल ने ही हराया है
चार बार के सांसद कल्याण बनर्जी ने कहा, ‘कोई भी राजनीतिक ताकत हमेशा अपने चरम पर नहीं रह सकती. जब उभार चरम तक पहुंच जाता है, तो पतन भीतर से शुरू होता है. तृणमूल को तृणमूल ने ही हराया है.’ उन्होंने टिकट वितरण और आइ-पैक आधारित चुनावी रणनीति को भी हार का कारण बताया. उनके अनुसार, ‘हर ग्राम पंचायत सदस्य खुद को टिकट का हकदार मान रहा था. अंदरूनी दरारों ने हमारी हार में बड़ी भूमिका निभायी.’
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स्थानीय नेताओं के प्रति जनता की नाराजगी
राजनीतिक विश्लेषक विश्वनाथ चक्रवर्ती ने कहा, ‘पार्टी की संरचना सत्ता तक लगातार पहुंच पर निर्भर थी. जैसे ही वह कड़ी कमजोर होती है, विखंडन शुरू होना तय हो जाता है.’ 71 वर्षीय ममता बनर्जी आज भी तृणमूल की सबसे बड़ी नेता हैं, लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं. सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलनों के दौर में वह सड़कों पर उतरकर संघर्ष कर रही थीं, जबकि अब उनके सामने 15 वर्षों की सत्ता का बोझ है जिसमें नियुक्ति घोटाले, भ्रष्टाचार के आरोप, प्रशासनिक थकान, गुटबाजी और स्थानीय नेताओं के प्रति जनता की नाराजगी शामिल हैं.
टूट गया अजेय होने के आभामंडल
चुनावी नतीजों ने 2011 से तृणमूल के चारों ओर बने अजेय होने के आभामंडल को भी तोड़ दिया है. पार्टी नेताओं को डर है कि आने वाले महीनों में नगरपालिकाओं और पंचायतों में दल-बदल शुरू हो सकता है. विडंबना यह है कि जो पार्टी कभी विरोधियों में टूट करवाकर स्थानीय निकायों पर कब्जा करती थी, अब उसी रणनीति के अपने खिलाफ इस्तेमाल होने की आशंका जता रही है.
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By Ashish Jha
डिजिटल पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 वर्षों का अनुभव. लगातार कुछ अलग और बेहतर करने के साथ हर दिन कुछ न कुछ सीखने की कोशिश. वर्तमान में बंगाल में कार्यरत. बंगाल की सामाजिक-राजनीतिक नब्ज को टटोलने के लिए प्रयासरत. देश-विदेश की घटनाओं और किस्से-कहानियों में विशेष रुचि. डिजिटल मीडिया के नए ट्रेंड्स, टूल्स और नैरेटिव स्टाइल्स को सीखने की चाहत.
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