इतिहास से संवाद करता है प्रेमचंद का साहित्य

Published by : HARIBANSH KUMAR Updated At : 31 Jul 2025 8:12 PM

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गया कॉलेज के हिंदी विभाग में आयोजित संगोष्ठी में वक्ताओं ने प्रेमचंद की रचनाओं को बताया ऐतिहासिक दस्तावेज

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गया कॉलेज के हिंदी विभाग में आयोजित संगोष्ठी में वक्ताओं ने प्रेमचंद की रचनाओं को बताया ऐतिहासिक दस्तावेज

विद्यार्थियों को किया गया सम्मानित

संवाददाता, गया जी.

गया कॉलेज के हिंदी विभाग द्वारा गुरुवार को महान कथाशिल्पी मुंशी प्रेमचंद की जयंती के अवसर पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया. संगोष्ठी का विषय था प्रेमचंद कालीन ऐतिहासिक संदर्भ, जिसमें प्रेमचंद के साहित्य को उनके समय के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक परिवेश के आलोक में समझने का गहन प्रयास किया गया. कार्यक्रम के मुख्य वक्ता एएम. कॉलेज, गया के इतिहास विभागाध्यक्ष प्रो (डॉ) पार्थसारथी ने प्रेमचंद के जीवनकाल (1880–1936) को इतिहास की दृष्टि से अत्यंत उथल-पुथल भरा समय बताया. उन्होंने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य केवल रचनात्मक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक दस्तावेज भी है. उनके लेखन में दो विश्व युद्धों की छाया, वैश्विक आर्थिक मंदी, गांधीवादी आंदोलनों का उभार, समाजवादी और मार्क्सवादी विचारधाराओं का असर, तथा डॉ आंबेडकर द्वारा उठाये गये जातिगत प्रश्नों की प्रतिध्वनि स्पष्ट रूप से सुनाई देती है. प्राचार्य प्रो. डॉ सतीश सिंह चंद्र ने अपने उद्बोधन में प्रेमचंद को भारतीय यथार्थ का प्रतिनिधि लेखक बताते हुए कहा कि प्रेमचंद की रचनाएं समाज की अनसुनी आवाजों को मंच देती हैं. उनके साहित्य में इतिहास बोलता है. प्रो डॉ राम उदय कुमार ने तुलसीदास और प्रेमचंद के रचनात्मक जीवन की तुलना करते हुए कहा कि व्यक्तिगत पीड़ा ने दोनों को जनमानस के विश्वसनीय स्वर में बदल दिया. वहीं डॉ श्रीधर करुणानिधि ने प्रेमचंद के साहित्य को समाज की विडंबनाओं और ऐतिहासिक बदलावों का संवेदनशील दस्तावेज कहा. कार्यक्रम का मंच संचालन गरिमापूर्ण ढंग से ट्विंकल रक्षिता ने किया. इस अवसर पर बड़ी संख्या में विद्यार्थी, शोधार्थी और प्राध्यापक उपस्थित थे. वक्ताओं और श्रोताओं ने प्रेमचंद के साहित्य को नए संदर्भों में पढ़ने और समझने की आवश्यकता पर बल दिया.

विशेष सम्मान

कार्यक्रम में प्रतिभागी वक्ताओं को उनके विशिष्ट विचारों के लिए सम्मानित किया गया. ट्विंकल रक्षिता को प्रेमचंद की स्त्री चेतना पर प्रभावशाली वक्तव्य के लिए, ज्ञानी कुमार को प्रेमचंद की दलित दृष्टि पर विश्लेषणात्मक प्रस्तुति के लिए, उत्तम कुमार को ग्रामीण समाज के यथार्थ चित्रण पर प्रस्तुति के लिए व मुस्कान को प्रेमचंद के सामाजिक आदर्शों की विवेचना के लिए.

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