स्वयंवर में भगवान शिव का धनुष भंग कर श्रीराम ने किया सीता का वरण
Published by : Prabhat Khabar News Desk Updated At : 01 Oct 2024 10:04 PM
किला मैदान में चल रहे 21 दिवसीय विजयादशमी महोत्सव के सातवें दिन मंगलवार को रामलीला में सीता स्वयंवर प धनुष यज्ञ प्रसंग का मंचन किया गया
बक्सर. किला मैदान में चल रहे 21 दिवसीय विजयादशमी महोत्सव के सातवें दिन मंगलवार को रामलीला में सीता स्वयंवर प धनुष यज्ञ प्रसंग का मंचन किया गया. जिसमें श्रीराम धनुष भंग कर सीता को वरण कर लिए. ”सीता स्वयंवर व धनुष यज्ञ” प्रसंग में दिखाया गया कि राजा जनक भगवान शिव से धनुष लेकर महल में आते हैं और प्रति दिन उसकी पूजा करते हैं. उसी बिच एक दिन राजा जनक किसी कार्य वश महलों से बाहर होते हैं, उस दिन महारानी धनुष की पूजा करना भूल जाती है. यह देखकर सीता जी अपने एक हाथ से धनुष को उठाकर वहां गोबर का चौका लगाती है और उसका पूजन करती है. यह बात राजा जनक सुनते हैं तो उसी समय स्वयंवर की घोषणा करते हुए कहते हैं कि जो राजा इस धनुष का खंडन करेगा उसी से सीता का विवाह होगा.
सभा में विश्वामित्र के संग श्रीराम और लक्ष्मण भी आते हैं. जनक जी उनको उच्चासान पर बिठाते हैं. सभागार देश- देशांतर से आए हुए राजाओं से भर जाता है. तभी बाणासुर व रावण के बीच तल्ख संवाद होता है और दोनों वहां से चले जाते हैं. तब धनुष यज्ञ की घोषणा होती है. एक-एक कर सभी राजा धनुष उठाने का प्रयास करते हैं और असफल हो जाते हैं. सभी राजाओं को धनुष उठाने में विफल होते देख जनक जी को क्रोधित होते हैं ओर पृथ्वी को वीरों से खाली बता देते हैं. राजा जनक के इस कड़वे वचन को सुन लक्ष्मण जी खड़े होकर जनक जी के ऐसे वचन बोलने का विरोध करते हैं. तब गुरु विश्वामित्र की आज्ञा पाकर श्रीराम खड़े होते हैं और धनुष का खंडन करते हैं. धनुष के खंडन होने पर जानकी जी श्रीराम के गले में वरमाला पहनाती हैं और दर्शक जय सियाराम का उद्घोष करने लगते हैं.
कृष्णलीला में हुआ राजा भतृहरि के चरित्र का मंचन : दिन में कृष्णलीला के दौरान “राजा भतृहरि चरित्र ” का मंचन किया गया. जिसमें दिखाया गया कि प्राचीन उज्जैन में राजा भृतहरि नामक एक बड़े प्रतापी राजा होते हैं. वह अपनी तीसरी पत्नी पिंगला पर मोहित हैं और वे उस पर अत्यंत विश्वास करते हैं. राजा पत्नी मोह में अपने कर्तव्यों को भी भूल जाते हैं. इधर उज्जैन में एक तपस्वी संत गुरु गोरखनाथ का आगमन होता है. गुरु गोरखनाथ का राज दरबार में पहुंचने पर भर्तृहरि उनका उचित आदर-सत्कार करते हैं. इससे प्रसन्न होकर गुरु गोरखनाथ राजा को एक फल देते हैं और कहते हैं कि फल खाने से वह सदैव जवान बने रहेंगे. राजा वह फल अपनी तीसरी रानी पिंगला को दे देते है. रानी पिंगला भर्तृहरि पर नहीं बल्कि उसके राज्य के कोतवाल पर मोहित थी. यह बात राजा नहीं जानते थे. सो रानी वह फल कोतवाल को दे देती है. कोतवाल उस फल को अपनी प्रेयसी वेश्या को सौंपता है तथा वेश्या वह चमत्कारी फल राजा को दे देती है. राजा वह फल देखकर हतप्रभ रह जाते हैं. राजा को सच्चाई पता लगने पर उनके मन में वैराग्य उत्पन्न हो जाता है और तपस्या को चले जाते हैं.
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