सत्तू और शिकांजी के ठेलों से स्वच्छता नदारद, सिंथेटिक कलर का हो रहा इस्तेमाल

Updated at : 12 Apr 2024 10:41 PM (IST)
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सत्तू और शिकांजी के ठेलों से स्वच्छता नदारद, सिंथेटिक कलर का हो रहा इस्तेमाल

कई पेय पदार्थ में रंगों में मिलावट का खेल चल रहा है.

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औरंगाबाद कार्यालय. गर्मी का मौसम आते ही सड़कों पर आकर्षक रंग-बिरंगे पेय पदार्थ बिकने शुरू हो गये हैं. शहर की सड़कों पर सत्तू, शरबत, शिकंजी, गन्ने के जूस के सैकड़ों ठेले और दुकान खुल गये हैं. लेकिन, क्या कहीं ठेलों पर बिक रहे पेय पदार्थ आपको बीमारियां तो नहीं परोस रहे हैं. कई पेय पदार्थ में रंगों में मिलावट का खेल चल रहा है. लाल, गुलाबी, हरे रंग के आकर्षक शरबत लोगों को खूब लुभा रहे हैं. लेकिन ये शरबत स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है. इसकी गुणवत्ता की जांच को लेकर विभाग की तरफ से कोई कदम नहीं उठाया जा रहा है. शहर के रमेश चौक, धर्मशाला चौक, महाराजगंज रोड, सिन्हा कॉलेज मोड़, बड़ी मस्जिद, ओवरब्रिज, ब्लॉक मोड़, टिकरी मोड़ आदि जगहों पर पेय पदार्थों के कई ठेले लगे होते है. इन पर या आसपास मक्खियां भिनभिनाती रहती हैं. गंदगी के कारण यह सेहत के लिए हानिकारक हो सकता है. इसके बाद भी उक्त जगह पर लोगों की भीड़ लगी रहती है और पेय पदार्थों का आनंद उठाते रहते है. चाट, जूस व सत्तू, शरबत की दुकान पर स्वच्छता का ख्याल बिल्कुल ही नहीं रखा जाता है. गंदगी के कारण इसके सेवन से पेट से जुड़ी कई बीमारियां हो सकती है. डायरिया, डिहाइड्रेशन व कब्ज जैसी बीमारियों के होने की संभावना हमेशा बनी रहती है. सत्तू में मिलाया जा रहा अखरोट गर्मी में प्यास बुझाने या पेट की ठंडक के लिए लोग सत्तू पीते है. लेकिन इन दिनों सत्तू में मैदा के साथ अखरोट का प्रयोग हो रहा है. सत्तू को गाढ़ा करने के लिए इसका प्रयोग धड़ल्ले से हो रहा है, ताकि कम मात्रा में प्रयोग कर ज्यादा शरबत बनाया जा सके और पीने वालों को भी स्वादिष्ट लगे. सिंथेटिक कलर का नुकसान ठंडे पेय और जूस में इस्तेमाल किये जाने वाले सिंथेटिक कलर स्लो प्वाइजन के समान है. इसका स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. डॉ आसित रंजन बताते हैं कि सिंथेटिक कलर से आंत पर बुरा प्रभाव पड़ता है, जिससे पेट से जुड़ी समस्याएं होती है. इससे कैंसर तक का खतरा बना रहता है. सस्ते दामों पर बेरोकटोक बिक रहे शीतल पेय पदार्थ लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रहे है. बड़ी बात यह है कि स्वास्थ्य विभाग सबकुछ जानते हुए भी अनजान है. इसकी गुणवत्ता की जांच भी नहीं की जा रही है. ज्ञात हो कि गर्मी के मौसम को भुनाने के लिए बाजार में सस्ते पेय पदार्थ बनाने वाली कंपनियां भी डेरा जमा लेती हैं. ये कंपनियां प्रसिद्ध कंपनियों की बोतल में नकली पेय पदार्थ बेचती हैं. इनमें से अधिकतर के पास लाइसेंस तक नहीं है. वहीं, एक बात ओर सामने आ रही है कि अनेक गांवों में भी निम्न स्तर के पेय पदार्थ बनाने का गोरखधंधा चल रहा है. नकली कोल्ड ड्रिक्स से रहें सावधान बाजारों में नकली कोल्ड ड्रिक्स बेचने वालों की भीड़ सी लग गयी है. सस्ते कोल्ड ड्रिक्स में कई तरह के रसायन मिलाये जाते हैं, जो लोगों की सेहत को नुकसान पहुंचाते हैं. एक दुकानदार ने बताया कि शीतल पेय बनाने वाले एक ड्रम में 15 किलोग्राम चीनी के साथ उतना ही पानी मिलाते है. इसके बाद उसमें 600 ग्राम कंपाउंड कलर व साइट्रिक एसिड मिला दिया जाता है. मिठास बढ़ाने के लिए घोल में सेक्रीन मिलायी जाती है. खतरनाक रसायनों द्वारा बनाये गये घोल को 250 एमएल की बोतल में 60-60 एमएल भर दिया जाता है. यानी कि पैसे कमाने की जद्दोजहद में ऐसे लोग खतरनाक बीमारियां परोसने से भी बाज नहीं आ रहे है. घटिया आइसक्रीम की धड़ल्ले से हो रही सप्लाई औरंगाबाद जिला मुख्यालय के साथ-साथ प्रखंड मुख्यालयों एवं ग्रामीण क्षेत्रों के बाजारों में घटिया आईसक्रीम बेचने वालों की बाढ़ सी आ गयी है. पांच रुपये से 50 रुपये तक के आईसक्रीम उपलब्ध है.बड़े-बड़े ब्रांडों के स्टीकर का भी उपयोग करने से ये बाज नहीं आते.कई जगहों पर आईसक्रीम की फैक्ट्रियां भी चल रही है. इन फैक्ट्रियों में नकली व घटिया आईसक्रीम इस कदर तैयार की जा रही है कि करीब पांच दर्जन से अधिक लोग इन्हें गांवों में पहुंचाने के लिए सप्लाई कारोबार से जुड़े है. फैक्ट्रियों के मालिकों द्वारा ज्यादा से ज्यादा आईसक्रीम सप्लाई करने के एवज में अच्छा खासा कमीशन भी दिया जाता है. दूसरी ओर घटिया आईसक्रीम खरीदकर उनके सेवन से बच्चे बीमार भी हो रहे है. स्वास्थ्य विभाग स्थिति से वाकिफ होने के बाद भी इन पर कोई कार्रवाई नहीं कर रही है. क्या कहते हैं पदाधिकारी समय-समय पर फुटपाथी के साथ-साथ अन्य दुकानों की जांच की जाती रही है. अभियान चलाकर पुन: जांच करायी जा रही है. हमेशा ऐसे चीजों पर ध्यान रखा जाता है. संज्ञान में आते ही कार्रवाई की जायेगी. रमेश कुमार, फुड इंस्पेक्टर

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