जय जगन्नाथ! पुरी में स्थापित परम ब्रह्म का नहीं बनाया जा सकता नकल, दीघा मंदिर का इसलिए हो रहा विरोध

Edited by Rajneesh Anand
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दीघा जगन्नाथ मंदिर

Jagannath Puri : हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार जगन्नाथ पुरी में परम ब्रह्म का निवास है. माना जाता है कि पुरी मंदिर के विग्रह में भगवान कृष्ण का हृदय वास करता है. इस वजह से इस मंदिर का महत्व बहुत ज्यादा है और यह चारों धामों में से एक है. अब जबकि इस परम ब्रह्म को कहीं और स्थापित किए जाने की बात हो रही है, तो पुरी मंदिर के सेवकों में गुस्सा है और वह साफ नजर भी आ रहा है.

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Jagannath Puri : जगन्नाथ पुरी यानी पावन धरती. हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार यह मोक्ष की धरती है. भगवान विष्णु इस धरती पर साक्षात निवास करते हैं इसलिए ऐसी मान्यता है कि हिंदू धर्म मानने वालों को यहां अपने जीवनकाल में एक बार जरूर आना चाहिए. जगन्नाथ पुरी के तर्ज पर देश में कई जगह पर जगन्नाथ मंदिर का निर्माण कराया गया है, जहां की पूजा पद्धति भी जगन्नाथ पुरी की तरह ही है, लेकिन अक्षय तृतीया के दिन बंगाल के मेदिनीपुर जिले के दीघा में जगन्नाथ धाम मंदिर का उद्घाटन किया गया है, जिसे लेकर जगन्नाथ पुरी के लोगों को कुछ आपत्तियां हैं. 

दीघा में बनाया गया है जगन्नाथ धाम

बंगाल के मेदिनीपुर जिले में स्थित है दीघा. दीघा अपने समु्द्री तट के लिए काफी प्रसिद्ध है. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने यहां एक भव्य जगन्नाथ मंदिर बनवाया है. जिसे जगन्नाथ धाम का नाम दिया गया है. यह मंदिर दरअसल जगन्नाथ पुरी की नकल है. इस मंदिर का निर्माण कार्य 2022 में शुरू हुआ था और 30 अप्रैल 2025 को मंदिर का उद्‌घाटन किया गया. इस मंदिर को लेकर विवाद इसलिए शुरू हो गया है क्योंकि इसे धाम कहा जा रहा है और यहां की पूजा पद्धति को बिलकुल उसी तरह का रखा गया है, जैसा जगन्नाथ पुरी में है.

मंदिर से जुड़ी खास बातेंपुरी जगन्नाथ मंदिरदीघा जगन्नाथ मंदिर
स्थानपुरी, ओडिशादीघा, मेदिनीपुर, पश्चिम बंगाल
स्थापना काल12वीं शताब्दी2025 (निर्माण 2022 में शुरू हुआ)
मूर्ति की सामग्रीनीम की लकड़ी पत्थर की मूर्तियां
शैलीकलिंग शैली (मूल)कलिंग शैली की नकल
धार्मिक मान्यताचार धामों में से एक – (बद्रीनाथ, द्वारका, पुरी, रामेश्वरम)“धाम” शब्द का उपयोग विवादास्पद; पारंपरिक मान्यता नहीं
अनुष्ठान और पूजा विधिविशेष और पारंपरिक नियमों के तहत, केवल प्रशिक्षित सेवकपुरी के समान अनुष्ठानों पर विवाद, सेवकों को भाग न लेने की चेतावनी
गैर-हिंदू प्रवेशअनुमति नहीं हैगैर-हिंदुओं और विदेशियों को प्रवेश की अनुमति
पर्यटन पर प्रभावबंगाल से बड़ी संख्या में पर्यटक आते हैं, आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्णदीघा में नया आकर्षण, लेकिन पुरी जैसी सुविधा और महत्व अभी नहीं

जगन्नाथ पुरी के सेवकों ने दर्ज कराई है आपत्ति

 Jagannath Temple Puri
जगन्नाथ-पुरी

दीघा में भगवान जगन्नाथ का मंदिर बनाए जाने से पुरी के सेवकों को आपत्ति नहीं है. उन्हें इस बात पर आपत्ति है कि इस मंदिर को जगन्नाथ धाम कहा जा रहा है. मंदिर में तमाम पूजा पद्धतियां उसी तरह की हैं, जैसी पुरी में है, जैसे यहां प्रतिदिन ध्वज लगाया जा रहा है. मंदिर के शिखर पर नीलचक्र का प्रतिरूप भी लगाया है, जिसे लेकर पुरी में बड़े पैमाने पर विरोध हो रहा है क्योंकि नीलचक्र को भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र का प्रतिरूप माना जाता है. नीलचक्र को काफी पवित्र माना जाता है, जिस प्रकार बंगाल सरकार ने नीलचक्र का मंदिर के प्रचार में उपयोग किया है, उसपर पुरी से घोर आपत्ति दर्ज कराई जा रही है.

पुरी के सेवकों को किस बात पर है आपत्ति

जगन्नाथ पुरी के सेवक(पुजारी) संतोष मिश्रा ने प्रभात खबर के साथ खास बातचीत में बताया कि हमें मंदिर के निर्माण पर कोई आपत्ति नहीं है. भगवान जगन्नाथ का मंदिर तो कई जगह पर है. रांची में भी भगवान जगन्नाथ का मंदिर है, लेकिन दीघा के मंदिर को धाम कहा जा रहा है, जो गलत है. धाम चार ही हैं-पुरी, द्वारिका, बद्रीनाथ और रामेश्वम. दीघा में धाम नहीं हो सकता है. एक नीलचक्र के नीचे दो भगवान नहीं हो सकते हैं. साथ ही पुरी में भगवान का ब्रह्म स्वरूप है, जिसे कहीं और स्थापित नहीं किया जा सकता है. बस इतनी सी ही बात है. मंदिर का कोई विरोध नहीं है, लेकिन जगन्नाथ पुरी को कहीं और स्थापित नहीं किया जा सकता है. यह लोगों में भ्रम फैलाने की बात है. ऐसा करने से धार्मिक शुचिता भी भंग होती है. यही वजह है कि पुरी के सेवकों ने भगवान का भोग लगाने वाले समुदाय सुआर महासुआर निजोग को दीघा जाने से रोका है. साथ ही पुरी में भगवान का वस्त्र तैयार करने वाले सेवकों को भी वहां जाने से रोका गया है. पुरी के कुछ सेवक दीघा गए थे, लेकिन उन्होंने पूजा-पद्धति में भाग नहीं लिया. उनके जाने की वजह यह थी कि बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी उनकी यजमान हैं.

इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के अनुसार सुआर महासुआर निजोग के अध्यक्ष पद्मनाव महासुआर ने बताया कि वे दीघा में मंदिर के उद्घाटन का स्वागत करते हैं और चाहते हैं कि भक्तगण वहां जाएं, लेकिन नए मंदिर में मूल मंदिर के पारंपरिक अनुष्ठानों की नकल नहीं की जानी चाहिए. यह गलत होगा.

दीघा मंदिर के विरोध का क्या है आर्थिक कारण

दीघा मंदिर के निर्माण पर किसी को आपत्ति नहीं है, लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि पुरी आने वाले श्रद्धालुओं में से 14 प्रतिशत यानी लगभग 15 लाख बंगाली होते हैं. अब जबकि दीघा में भी मंदिर बन गया है और यह दावा किया जा रहा है कि वहां सबकुछ पुरी मंदिर की तर्ज पर होगा, तो श्रद्धालु पुरी जाना कम कर सकते है, इससे पुरी मंदिर की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ सकता है. 

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लेखक के बारे में

By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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