क्या आम लोगों की जिंदगी सस्ती है

Updated at : 26 Oct 2018 6:16 AM (IST)
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क्या आम लोगों की जिंदगी सस्ती है

डॉ अनुज लुगुनसहायक प्रोफेसर, दक्षिण बिहार केंद्रीय विवि, गयाanujlugun@cub.ac.in झारखंड हाइकोर्ट के जस्टिस रंगन मुखोपाध्याय ने 2015 में पलामू जिले में हुए कथित माओवादी-पुलिस मुठभेड़ की जांच के आदेश सीबीआइ को देते हुए टिप्पणी की कि राज्य की पुलिस और सीआइडी जैसी जांच एजेंसियों से लोगों का विश्वास डिग रहा है. इसके लिए स्वतंत्र जांच […]

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डॉ अनुज लुगुन
सहायक प्रोफेसर, दक्षिण बिहार केंद्रीय विवि, गया
anujlugun@cub.ac.in

झारखंड हाइकोर्ट के जस्टिस रंगन मुखोपाध्याय ने 2015 में पलामू जिले में हुए कथित माओवादी-पुलिस मुठभेड़ की जांच के आदेश सीबीआइ को देते हुए टिप्पणी की कि राज्य की पुलिस और सीआइडी जैसी जांच एजेंसियों से लोगों का विश्वास डिग रहा है. इसके लिए स्वतंत्र जांच जरूरी है. पलामू जिले के सतबरवा थाना क्षेत्र के बकोरिया में नक्सली-पुलिस मुठभेड़ में बारह लोग मारे गये थे. शुरू से ही इस मुठभेड़ को लेकर सवाल उठ रहे थे. इसमें पांच नाबालिग लड़के भी मारे गये थे और मृतकों में एक पारा शिक्षक भी शामिल थे. तब इन सबको नक्सली बताया गया था. जांच में इन सबके नक्सली होने का साक्ष्य साबित नहीं हुआ.

मानवाधिकार आयोग ने भी इस घटना को संज्ञान में लिया था और सामाजिक कार्यकर्ताओं की फैक्ट फाइंडिंग टीम ने मुठभेड़ को फर्जी करार दिया था. दुखद बात तो यह थी कि शासन और बड़े अधिकारियों द्वारा इस मुठभेड़ की जांच की गति को धीमा रखे जाने की खबर भी आती रही और जिन अधिकारियों ने मुठभेड़ को सही नहीं बताया, उनका तबादला भी कर दिया गया. प्रभात खबर ने भी इस मामले को प्रमुखता से उठाया था.

बकोरिया कांड पर हाइकोर्ट की टिप्पणी के कई मायने हैं. यह प्रशासन और आम जनता के बीच के रिश्ते के संतुलन के लिए जरूरी है. यह इसलिए भी जरूरी है, ताकि विधायिका, कार्यपालिका और उसकी संस्थाओं की मनमानी और निरंकुशता पर शिकंजा कसती रहे.

आम आदमी शासन के सामने खुद को छोटा और कमजोर महसूस करता है, उसके लिए अंतिम भरोसा न्यायपालिका ही रह जाता है. ऐसे में यदि न्यायपालिका उसके अधिकारों के संदर्भ में विधायिका और कार्यपालिका से सवाल करती है, तो आम आदमी का आत्मविश्वास कायम रहता है. लोकतंत्र के होने का वास्तविक मतलब भी यही है.

लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंदर न तो सामाजिक-धार्मिक संस्थाएं किसी नागरिक के संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ फतवे जारी कर सकती हैं और न ही शासक वर्ग अपनी ताकत और दंभ का प्रदर्शन कर सकता है.

आमतौर पर संवेदनशील क्षेत्रों में होनेवाली घटनाओं का विश्लेषण सत्ता के पक्ष में ही किया जाता है. ऐसे में मानवाधिकारों का उल्लंघन स्वाभाविक हो जाता है और स्थिति भयावह हो जाती है. पूर्वोत्तर और कश्मीर में भी ऐसी स्थितियां दिखी हैं, जहां फर्जी मुठभेड़ के कई मामले दर्ज हैं.

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2000 से 2012 तक सेना और पुलिस द्वारा पूर्वोत्तर में की गयी 1528 गैर-न्यायिक हत्याओं के मामलों की जांच का निर्देश भी दिया था. तब सुप्रीम कोर्ट ने सरकार और सीबीआइ को कड़ी फटकार लगायी थी.

सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ ने राजस्थान की अरावली पहाड़ियों में हो रहे अवैध खनन के मामले में कड़ी फटकार लगाते हुए कहा है कि अरावली में हो रहे खनन से राजस्थान को करीब पांच हजार करोड़ रुपये की रॉयल्टी मिलती है, लेकिन वह दिल्ली में रहनेवाले लाखों लोगों की जिंदगी को खतरे में नहीं डाल सकती है. अरावली पहाड़ी में बड़े पैमाने पर अवैध खनन के मामले आये हैं. इसमें से अब तक 31 पहाड़ियां गायब हो चुकी हैं.

पहाड़ियों के खत्म होने का सीधा असर आम जीवन पर पड़ने लगा है. माना जा रहा है कि दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण का एक महत्वपूर्ण कारण यह भी है. पीठ के जस्टिस लोकुर ने कहा है कि यदि ‘देश में पहाड़ियां गायब होंगी तो फिर क्या होगा? क्या लोग ‘हनुमान’ हो गये हैं जो पहाड़ियां ले जा रहे हैं?’ खनन ताकतवर और पैसे वालों का पेशा है.

इनकी मजबूत राजनीतिक पकड़ होती है, और वे व्यवस्था में सेंधमारी कर मुनाफा कमाते हैं. अवैध खनन के क्षेत्र की बात तो अलग, जहां खनन की सरकारी अनुमति होती हैं, वहां भी प्रदूषण के मानकों का पालन नहीं किया जाता है, और बड़े पैमाने पर नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन किया जाता है. देश के आदिवासी क्षेत्र इसके उदाहरण हैं. स्थानीय समुदाय उसके खिलाफ आवाज उठाते हैं, लेकिन वह आवाज ताकतवर लोगों की दबिश से बाहर नहीं निकल पाती है. ऐसे में न्यायपालिका ही एकमात्र सहारा रह जाती है.

लोकतांत्रिक व्यवस्था में जरूरी है आम जनता का भरोसा. यह भरोसा तभी कायम रह सकता है, जब शासन और उसकी नीतियां आम जन की पक्षधर हों.

लेकिन अक्सर ताकतवर लोग अपनी महत्वाकांक्षा और दंभ का इस तरह प्रदर्शन करते हैं कि आम जन नीतिगत मामलों से दूर हो जाते हैं. संवैधानिक संस्थाएं ताकतवर लोगों का प्रतिबिंब बन जाती हैं, और समाज का मिथ इस तरह तैयार कर दिया जाता है कि सामान्य जिंदगी अपनी गरिमा खो देती है. एक रेलगाड़ी साठ से ज्यादा लोगों को रौंद देती है और जिम्मेदार लोग अचानक गायब हो जाते हैं.

क्या आम लोगों की जिंदगी इतनी सस्ती है? अगर सब कुछ सत्ता में बैठे लोगों के हिसाब से चलता रहेगा, तो क्या आनेवाले समय में आम जिंदगियों को इस समाज से निकाल बाहर कर दिया जायेगा? इसलिए जरूरी है न्यायपालिका की सतर्कता. न्यायपालिका का पक्ष आम जन के लिए बहुत मायने रखता है.

बांग्ला के मशहूर कवि नवारुण भट्टाचार्य कहते हैं- ‘यह मृत्यु उपत्यका नहीं है मेरा देश/ यह जल्लादों का उल्लास-मंच नहीं है मेरा देश/ यह विस्तीर्ण श्मशान नहीं है मेरा देश/ यह रक्त रंजित कसाईघर नहीं है मेरा देश’. किसी भी समाज में यह तभी संभव है, जब उसकी व्यवस्था प्रभुवर्ग के बजाय आम जन की पक्षधर हो.

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