बच्चों को डिजिटल खतरों से बचाने की बने नीति, पढ़ें प्रवीण कौशल का आलेख

Author : Prabhat Khabar Digital Desk Published by : Pritish Sahay Updated At : 22 May 2026 3:02 PM

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सोशल मीडिया, प्रतीकात्मक फोटो

Social Media: सोशल मीडिया न तो पूरी तरह से वरदान है और न ही पूरी तरह से अभिशाप. इसका प्रभाव इसके उपयोग और नियमन के तरीके पर निर्भर करता है. भारत जैसे देश के लिए समाधान पूर्ण प्रतिबंध में नहीं, बल्कि एक विवेकपूर्ण संतुलन में है.

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प्रवीण कौशल, एआइ डाटा सेंटर मृकाल के निदेशक

Social Media: सोशल मीडिया हमारे दैनिक जीवन का अनिवार्य हिस्सा बन चुका है, खासकर बच्चों और युवाओं के लिए इसका महत्व और भी अधिक है. शिक्षा से लेकर मनोरंजन तक और आपसी संचार से लेकर अपनी रचनात्मकता दिखाने तक सोशल मीडिया का प्रभाव हर क्षेत्र में महसूस किया जा रहा है. हालांकि, इसके व्यापक प्रसार के साथ युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों ने दुनिया भर में गंभीर बहस को जन्म दिया है. अनेक देश सोशल मीडिया के विनियमन की दिशा में कदम उठा रहे हैं.

ऑस्ट्रेलिया ने 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है. ऐसे ही कड़े उपायों पर ब्रिटेन, नॉर्वे और फ्रांस जैसे देश भी विचार कर रहे हैं. अमेरिका में 13 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए पहले से ही माता-पिता की सहमति अनिवार्य है, जबकि चीन ने नाबालिगों के इंटरनेट उपयोग के लिए सख्त समय-सीमा और कर्फ्यू जैसे नियम लागू किये हैं. भारत में ऐसा कोई कानून मौजूद नहीं है, पर यहां भी इस विषय पर चर्चा तेज हो रही है.

सोशल मीडिया के नियमन के पीछे सबसे बड़ा तर्क छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाला नकारात्मक प्रभाव है. शोध स्पष्ट करते हैं कि सोशल मीडिया का अत्यधिक और बाध्यकारी उपयोग चिंता, अवसाद, कम आत्मसम्मान और एकाग्रता में कमी का कारण बन सकता है. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर मिलने वाले ‘लाइक्स’, कमेंट्स और नोटिफिकेशन ‘रिवॉर्ड मैकेनिज्म’ की तरह काम करते हैं, जो युवाओं में लत पैदा कर देते हैं.

हाल ही में चर्चा में आया शब्द ‘ब्रेन रॉट’ इसी चिंता को उजागर करता है कि अत्यधिक डिजिटल उपभोग से संज्ञानात्मक दक्षता कम हो सकती है. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर बच्चे अक्सर ऐसी सामग्री के संपर्क में आ जाते हैं, जो उनके लिए उपयुक्त नहीं होती. ऑनलाइन ट्रोलिंग की वजह से कुछ मेधावी छात्र भी गंभीर भावनात्मक तनाव का शिकार हुए हैं, जिससे उनमें सामाजिक दूरी और पछतावे जैसी भावनाएं पैदा हुई हैं.

अत्यधिक स्क्रीन टाइम का प्रभाव केवल मन तक सीमित नहीं है, यह शारीरिक स्वास्थ्य को भी नुकसान पहुंचा रहा है. घंटों तक स्क्रीन स्क्रॉल करने की आदत के कारण बच्चों में शारीरिक गतिविधियों की कमी हो रही है, जिससे मोटापा, मधुमेह और हृदय संबंधी समस्याओं का जोखिम बढ़ रहा है. सामाजिक रूप से भी इसके परिणाम चिंताजनक हैं. बच्चे वास्तविक दुनिया में लोगों से संवाद करने के बजाय स्क्रीन पर अधिक समय बिता रहे हैं, जिससे उनके कम्युनिकेशन स्किल और इक्यू के विकास में बाधा आ रही है. सोशल मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंध के व्यावहारिक क्रियान्वयन में कई बाधाएं हैं, जैसे लागू करने की कठिनाई. बच्चे गलत जानकारी देकर या अपने माता-पिता के खातों का उपयोग कर इन प्रतिबंधों को आसानी से बाइपास कर सकते हैं.

ऐसे ही, आयु सत्यापन के लिए संवेदनशील व्यक्तिगत डाटा की जरूरत होगी, जिससे डाटा सुरक्षा का खतरा बढ़ सकता है. जबकि डिजिटल प्रतिबंध से छात्र मूल्यवान शैक्षिक संसाधनों और अवसरों से वंचित हो सकते हैं. तमाम चिंताओं के बावजूद, सोशल मीडिया के फायदों को नकारा नहीं जा सकता. ये प्लेटफॉर्म शैक्षिक सामग्री तक आसान पहुंच प्रदान करते हैं और विविध विचारों एवं दृष्टिकोणों से युवाओं का परिचय कराते हैं. यह रचनात्मकता, आत्म-अभिव्यक्ति और नये कौशल सीखने के लिए एक बेहतरीन मंच है. विशेष रूप से ग्रामीण और वंचित क्षेत्रों के छात्रों के लिए सोशल मीडिया सीखने और विकास का एक महत्वपूर्ण साधन साबित हो सकता है. इसीलिए असल बहस इस बात पर है कि इसका उपयोग कैसे किया जाए.

पूर्ण प्रतिबंध के बजाय विशेषज्ञों ने एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाने का सुझाव दिया है, जिसमें पांच मुख्य स्तंभ शामिल हैं- प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी : सोशल मीडिया कंपनियों को अपनी सामग्री की निगरानी और उपयोगकर्ता सुरक्षा के लिए अधिक जवाबदेह होना चाहिए. अभिभावकों की भागीदारी-माता-पिता को अपने बच्चों की डिजिटल गतिविधियों की सक्रिय निगरानी और मार्गदर्शन करना चाहिए. डिजिटल साक्षरता- स्कूलों को अपने पाठ्यक्रम में जिम्मेदार ऑनलाइन व्यवहार और साइबर सुरक्षा को शामिल करना चाहिए. समय का नियमन-स्क्रीन टाइम को सीमित करना और ऑफलाइन खेलों व गतिविधियों को प्रोत्साहित करना अनिवार्य है.

व्यावहारिक हस्तक्षेप-घरों में ‘नो गैजेट डे’ या भोजन के समय स्क्रीन से दूरी जैसे सरल नियम लागू करने चाहिए. सोशल मीडिया न तो पूरी तरह से वरदान है और न ही पूरी तरह से अभिशाप. इसका प्रभाव इसके उपयोग और नियमन के तरीके पर निर्भर करता है. भारत जैसे देश के लिए समाधान पूर्ण प्रतिबंध में नहीं, बल्कि एक विवेकपूर्ण संतुलन में है. हमें ऐसी नीतियां विकसित करनी होंगी, जो बच्चों को डिजिटल खतरों से बचाएं और साथ ही उन्हें भविष्य के अवसरों से भी जोड़े रखें. यह केवल तकनीक का विषय नहीं है, बल्कि हमारी अगली पीढ़ी के भविष्य को सुरक्षित करने का सवाल है, जिसके लिए सरकार, माता-पिता, शिक्षकों और प्लेटफॉर्म्स को मिलकर काम करना होगा. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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