दहेज देने और उत्पीड़न के ठोस साक्ष्य से ही सख्त सजा संभव, पढ़ें सीमा जोशी का आलेख
Author : Prabhat Khabar Digital Desk Published by : Pritish Sahay Updated At : 25 May 2026 5:55 AM
Dowry And Harassment Case
Dowry And Harassment Case: दहेज‑आधारित हिंसा तब तक रहेगी, जब तक उसके खिलाफ समय‑संबंधित और दस्तावेजीकृत साक्ष्य नहीं होंगे. जब तक दहेज लेन-देन को दर्ज, मॉनिटर और जवाबदेही क्षेत्र में नहीं लाया जायेगा, तब तक कानूनी‑सख्ती भ्रम बनी रहेगी.
सीमा जोशी, एडवोकेट, दिल्ली हाई कोर्ट
Dowry And Harassment Case: ग्रेटर नोएडा और भोपाल की हालिया दहेज मृत्यु घटनाएं दोहरा रही हैं कि देश के दहेज‑विरोधी कानून कागज पर कितने भी कड़े क्यों न हों, जमीनी स्तर पर उनका निवारक असर दुर्लभ और अस्थायी लगता है. दोनों मामलों में नवविवाहिताएं विवाह के कुछ ही महीनों के भीतर संदिग्ध परिस्थितियों में मरीं, और दहेज‑उत्पीड़न के गंभीर आरोप मृत्यु के बाद सामने आए. इसका अर्थ यह नहीं कि कानून नहीं हैं, बल्कि अर्थ यह है कि कानून के पाठ और न्यायालय की प्रक्रिया के बीच गहरी खाई बनी हुई है, जिसके कारण दहेज हत्या अक्सर ऐसी घटना बनकर रह जाती है, जहां सख्त सजा मिलती तो है, पर दहेज हत्याओं को रोका नहीं जा पा रहा.
दहेज‑मृत्यु के लिए अब बीएनएस में धारा 80 बन गयी, जिसके तहत विवाह के लगभग सात वर्ष के भीतर दहेज‑आधारित उत्पीड़न के कारण हुई मृत्यु पर न्यूनतम सात वर्ष एवं अधिकतम आजीवन कारावास का प्रावधान है. साथ ही, बीएनएस के तहत धारा 85 दहेज‑आधारित क्रूरता व उत्पीड़न को दंडनीय बनाती है, जबकि दहेज निषेध अधिनियम, 1961 दहेज देने और लेने पर प्रतिबंध लगाता है. न्यायालय कई बार स्पष्ट कर चुके हैं कि दहेज मृत्यु के लिए अभियोजन को उत्पीड़न और मृत्यु के बीच निकट और सजीव संबंध साबित करना होता है.
इस संदर्भ में सतबीर सिंह बनाम राज्य विंद्य (हरियाणा, 2021) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ‘मृत्यु से कुछ समय पहले का’ आशय समय‑संबंधित, स्पष्ट और लगातार उत्पीड़न से है. इस निर्णय ने उन मामलों को कमजोर बनाया, जहां शिकायत देर से आयी या दस्तावेज उपलब्ध नहीं थे और अभियोजन केवल मृत्यु के बाद के बयानों पर निर्भर था. इसी तर्ज पर कंस राज बनाम स्टेट ऑफ पंजाब (2000) में सुप्रीम कोर्ट ने दहेज‑मृत्यु में सामान्य आरोप से बचने की जरूरत बतायी और कहा कि उत्पीड़न का साक्ष्य विशिष्ट, तारीख‑वाला और ठोस होना चाहिए, न कि केवल भावनात्मक वर्णन पर आधारित.
फुलेल सिंह बनाम स्टेट ऑफ हरियाणा (2023) में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जब मृत्युकालीन बयान की विश्वसनीयता संदिग्ध हो और दहेज‑उत्पीड़न के अन्य स्वतंत्र सबूत न हों, तब न्यायालय सख्त सजा की राय व्यक्त करते हुए भी, साक्ष्य‑अभाव के चलते आरोपियों को बरी करने में संकोच नहीं करेंगे. यही बात निवारक प्रभाव को कमजोर करती है, क्योंकि दहेज‑आधारित हिंसा तब तक रहेगी, जब तक उसके खिलाफ समय‑संबंधित और दस्तावेजीकृत साक्ष्य नहीं होंगे. दहेज निषेध अधिनियम दहेज देने और लेने, दोनों को दंडनीय बनाता है, पर व्यवहार में अभियोजन अक्सर पति एवं उसके परिवार को निशाना बनाता है, जबकि देने वाले पक्ष को पीड़ित या निर्दोष मान लिया जाता है.
इससे दहेज‑प्रथा के सामाजिक‑आर्थिक चक्र पर प्रहार नहीं हो पाता-केवल दंड पक्ष पर होता है. इस पृष्ठभूमि में अर्णेश कुमार बनाम स्टेट ऑफ बिहार जैसे निर्णय ने अहम भूमिका निभायी. सुप्रीम कोर्ट ने दोषारोपण और गिरफ्तारी के दुरुपयोग के खतरे को दिखाते हुए 498ए जैसे प्रावधानों के प्रयोग पर रोक लगायी और संतुलित जांच और आरक्षण‑प्राधिकार के प्रयोग पर सख्त दिशा‑निर्देश दिये. इससे जहां गलत या बदला‑लेने की नीयत से दर्ज की गयी शिकायतों पर अंकुश लगा, वहीं पुलिस और अधिकारी दहेज‑मामलों में इतने सावधान हो गये कि शीघ्र हस्तक्षेप और प्रारंभिक साक्ष्य संरक्षण भी दुर्लभ हो गया.
साक्ष्य अधिनियम की धारा 113बी और बीएनएस की धारा 80 के तहत दहेज‑उत्पीड़न के आरोप में आरोपी पर उल्टा बोझ लगता है कि वह खुद अपनी निर्दोषता साबित करे, पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यह उल्टा बोझ केवल तभी लागू होता है, जब प्रथम‑व्यक्ति अभियोजन ने उत्पीड़न और मृत्यु के बीच एक प्राथमिक और विश्वसनीय जुड़ाव साबित कर दिया हो. इसी का अनुभव 2026 में एक दहेज‑मृत्यु मामले (बहु‑आरोपी) में हुआ, जहां सुप्रीम कोर्ट ने पति के परिवार वाले की दोषसिद्धि हटाते हुए कहा कि सामान्य आरोप और अस्पष्ट दावे से धारा 113बी के अनुमान को जोड़ना यथार्थ के अनुरूप नहीं. कोर्ट ने दोहराया कि उसे उत्पीड़न का निकट‑समय और ठोस चित्र चाहिए, ऐसा चित्र, जो मैसेज‑क्लिप, बैंक‑लेनदेन या चिकित्सा‑रिकॉर्ड जैसे स्वतंत्र दस्तावेजों से मिलकर बनता हो.
यह निर्णय स्पष्ट संकेत है : जब तक दहेज लेन‑देन और उत्पीड़न का आर्थिक‑डिजिटल नक्शा नहीं बनेगा, तब तक निवारक प्रभाव दुर्लभ रहेगा, भले ही सजा की भाषा कितनी भी कड़ी हो. ग्रेटर नोएडा और भोपाल की घटनाएं अकेले दर्द भरे समाचार‑शीर्षक नहीं, ये एक चेतावनी हैं कि जब तक दहेज‑लेन-देन को दर्ज, मॉनिटर और जवाबदेही‑क्षेत्र में नहीं लाया जाएगा, तब तक कानूनी‑सख्ती भ्रम‑मात्र बनी रहेगी. इसीलिए आगे का रास्ता यह है कि राष्ट्रीय और राज्य‑स्तर पर ऐसे निवारण‑केंद्रित अधिनियम बनें, जो दहेज लेन- देन को दस्तावेजीकृत करें, शीघ्र हस्तक्षेप की प्रक्रिया तय करें, और दुरुपयोग‑रोधी उपाय भी शामिल रखें. तभी दहेज‑कड़ाई कागजी‑भ्रम से निकलकर वास्तविक‑निवारक तंत्र बनेगी. (ये लेखिका के निजी विचार हैं.)
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