World Environment Day : पर्यावरण रक्षा की संतुलित और न्यायसंगत राह

वैज्ञानिकों ने आगे कहा कि वायुमंडल, समुद्र, मिट्टी, वन और जीवन के विभिन्न रूपों, सभी पर तबाह हो रहे पर्यावरण का बहुत दबाव पड़ रहा है और वर्ष 2100 तक पृथ्वी के विभिन्न जीवन रूपों में से एक तिहाई लुप्त हो सकते हैं.
-भारत डोगरा-
(वरिष्ठ पत्रकार/टिप्पणीकार)
पर्यावरण दिवस एक अनुकूल समय है कि पर्यावरण संकट की गंभीरता के साथ इसके समाधान की समझ बनायी जाये. स्टॉकहोम रेजिलियंस सेंटर के वैज्ञानिकों के अनुसंधान ने हाल के समय में धरती के सबसे बड़े संकटों की ओर ध्यान केंद्रित करने का प्रयास किया है जो बहुत चर्चित रहा है. इसमें धरती पर जीवन की सुरक्षा के लिए नौ विशिष्ट सीमा-रेखाओं की पहचान की गई है जिनका अतिक्रमण मनुष्य की क्रियाओं को नहीं करना चाहिए. गहरी चिंता की बात है कि इन नौ में से तीन सीमाओं का अतिक्रमण होना आरंभ हो चुका है. यह तीन सीमाएं है – जलवायु बदलाव, जैव-विविधता का ह्रास व भूमंडलीय नाइट्रोजन चक्र में बदलाव.
इसके अतिरिक्त चार अन्य सीमाएं ऐसी हैं जिसका अतिक्रमण होने की संभावना निकट भविष्य में है. यह चार क्षेत्र हैं – भूमंडलीय फासफोरस चक्र, भूमंडलीय जल उपयोग, समुद्रों का अम्लीकरण व भूमंडलीय स्तर पर भूमि उपयोग में बदलाव. अध्ययन में बताया गया है कि यह सब सीमा-रेखाएं एक दूसरे से पूरी तरह अलग निश्चित तौर पर नहीं हैं व एक संदर्भ में जो भी समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं वे दूसरे संदर्भों को भी प्रभावित करती हैं व उनसे प्रभावित होती हैं. इस तरह वास्तविक जीवन में इन सब कारकों के मिले-जुले असर से बहुत खतरनाक परिणाम सामने आ सकते हैं. अभी इन समस्याओं को नियंत्रित करने की उचित स्थितियां विश्व स्तर पर मौजूद नहीं हैं पर इस ओर ध्यान देना बहुत जरूरी है.
वर्ष 1992 में विश्व के 1575 वैज्ञानिकों ने (जिनमें उस समय जीवित नोबल पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिकों में से लगभग आधे वैज्ञानिक भी सम्मिलित थे) एक बयान जारी किया, जिसमें उन्होंने कहा, “हम मानवता को इस बारे में चेतावनी देना चाहते हैं कि भविष्य में क्या हो सकता है? पृथ्वी और उसके जीवन की व्यवस्था जिस तरह हो रही है उसमें एक व्यापक बदलाव की जरूरत है अन्यथा बहुत दुख-दर्द बढ़ेंगे और हम सबका घर यह पृथ्वी इतनी बुरी तरह तहस-नहस हो जायेगी कि फिर उसे बचाया नहीं जा सकेगा.
इन वैज्ञानिकों ने आगे कहा कि वायुमंडल, समुद्र, मिट्टी, वन और जीवन के विभिन्न रूपों, सभी पर तबाह हो रहे पर्यावरण का बहुत दबाव पड़ रहा है और वर्ष 2100 तक पृथ्वी के विभिन्न जीवन रूपों में से एक तिहाई लुप्त हो सकते हैं. मनुष्य की वर्तमान जीवन-पद्धति के अनेक तौर-तरीके भविष्य में सुरक्षित जीवन की संभावनाओं को नष्ट कर रहे हैं और इस जीती-जागती दुनिया को इतना बदल सकते हैं कि जिस रूप में जीवन को हमने जाना है, उसका अस्तित्व ही कठिन हो जाये. इन प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों ने जोर देकर कहा कि प्रकृति की इस तबाही को रोकने के लिए बुनियादी बदलाव जरूरी है.
वर्ष 1992 की चेतावनी के 25 वर्ष पूरा होने पर एक बार फिर विश्व के बहुत जाने-माने वैज्ञानिकों ने वर्ष 2017 में एक नयी अपील जारी की. इस अपील पर पहले से भी अधिक ध्यान आकर्षित हुआ. इस पर 180 देशों के 13,524 वैज्ञानिकों व अन्य प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने हस्ताक्षर किया. इस बयान में कहा गया कि जिन गंभीर समस्याओं की ओर वर्ष 1992 में ध्यान दिलाया गया था उनमें से अधिकांश समस्याएं पहले से अधिक विकट हो रही हैं या उनको सुलझाने के प्रयास में कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं है. केवल ओजोन परत संबंधी समस्या में कुछ महत्वपूर्ण उल्लेखनीय सफलता मिली है. अस्तित्व को संकट में डालने वाली अन्य समस्याएं पहले की तरह गंभीर स्थिति में मौजूद हैं या फिर उनकी स्थिति और विकट हुई है.
इसके साथ यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि इससे भी अधिक गंभीर समस्याएं कुछ परमाणु बमों के गिराने से उत्पन्न हो सकती है. हिरोशिमा में केवल एक परमाणु बम ने कितनी तबाही की थी, यह जानने के बाद यह तथ्य वास्तव में भयानक प्रतीत होता है कि आज विश्व में तरह-तरह की निशस्त्रीकरण की वार्ताओं व सम्मेलनों के बावजूद लगभग 13000 से अधिक परमाणु बम मौजूद हैं. मानवीय विकास रिपोर्ट के अनुसार इस समय केवल अणु हथियारों के भंडार की विनाशक शक्ति बीसवीं शताब्दी के तीन सबसे बड़े युद्धों के कुल विस्फोटकों की शक्ति से सात सौ गुणा अधिक है. दरअसल हजारों की बात तो रहने दें, यदि कुछ सौ परमाणु हथियारों का भी उपयोग कभी हो गया तो करोड़ों लोग तो तुरंत मारे जायेंगे व करोड़ों अन्य लोग तिल-तिल कर बाद में मरते रहेंगे. इसके बाद दूर-दूर तक ऐसे पर्यावरणीय व मौसमी बदलाव आयेंगे जिनमें अधिकांश बचे हुए मनुष्यों व जीवों के लिए भी अस्तित्व बचाये रखना लगभग असंभव होगा. अतः यह बहुत जरूरी है कि परमाणु बम व अन्य महाविनाशक हथियारों को समाप्त किया जाए व पूरा विश्व निशस्त्रीकरण व अमन-शांति की राह को अपनाए.
पर्यावरण संकट को नियंत्रित करने के लिए जीवन-शैली में बदलाव जरूरी है व इसके साथ जीवन-मूल्यों में बदलाव जरूरी है. उपभोक्तावाद का विरोध जरूरी है, विलासिता व नशे का विरोध जरूरी है. पर्यावरण के संकट को नियंत्रण करने के उपायों में जनसाधारण की भागेदारी प्राप्त करने का सबसे असरदार उपाय यह है कि विश्व स्तर पर ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन में पर्याप्त कमी उचित समय-अवधि में लाये जाने की ऐसी योजना बनायी जाये जो सभी लोगों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने से जुड़ी हो व फिर इस योजना को कार्यान्वित करने की दिशा में तेजी से बढ़ा जाये. यदि इस तरह की योजना बना कर कार्य होगा तो ग्रीनहाऊस गैस उत्सर्जन में कमी के जरूरी लक्ष्य के साथ-साथ करोड़ों अभावग्रस्त लोगों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने का लक्ष्य अनिवार्य तौर पर जुड़ जायेगा व इस तरह ऐसी योजना के लिए करोड़ों लोगों का उत्साहवर्धक समर्थन प्राप्त हो सकेगा. इस तरह स्पष्ट है कि पर्यावरण रक्षा, अमन-शांति, न्याय संगत विकास व समता तथा सादगी की राह यह सब आपसी तौर पर जुड़े हैं व इन सब को एक साथ अपनाने से पर्यावरण संकट का संतुलित समाधान मिल सकेगा.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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