DU: शिक्षा संस्थान का मकसद चरित्र और मूल्य निर्माण होना चाहिए

Published by : Vinay Tiwari Updated At : 28 Feb 2026 7:37 PM

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उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने डीयू के 102 वें दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत-2047 के लक्ष्य काे हासिल करने के लिए युवाओं की भागीदारी जरूरी है. भारतीय ज्ञान परंपरा, पारदर्शी समाज, अनुशासन तथा नैतिक मूल्य राष्ट्र निर्माण की आधारशिला होते हैं. ऐसे में शिक्षा संस्थान की भूमिका समाज और व्यक्ति निर्माण में सबसे अहम है.

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DU: विश्वविद्यालय सिर्फ इंफ्रास्ट्रक्चर से नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण और छात्रों में मूल्यों का निर्माण करने का काम करते है. इस काम में दिल्ली विश्वविद्यालय(डीयू) की भूमिका अहम है. वर्ष 1922 में सिर्फ तीन कॉलेज से डीयू की यात्रा शुरू हुई और मौजूदा समय में 90 से अधिक काॅलेज, कई संकाय और हजारों शिक्षकों-शोधार्थियों के साथ वैश्विक स्तर पर एक पहचान बना चुका है. डीयू की निरंतर बेहतर होती राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग इसकी शैक्षणिक उत्कृष्टता का प्रमाण है. शनिवार को उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने डीयू के 102 वें दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए यह बात कही. इस दौरान उन्होंने 120408 छात्रों को डिजिटल डिग्री प्रदान की और 10 प्रतिभाशाली छात्रों को मेडल दिया. साथ ही बुक ऑफ हाइलाइट्स नाम से एक पुस्तक को जारी किया. 

डीयू के दीक्षांत समारोह में कुल 120408 छात्रों और 734 शोधार्थियों को पीएचडी की डिग्री प्रदान की गयी. इस दौरान कुल 132 गोल्ड एवं सिल्वर मेडल और अन्य पुरस्कार दिए गए. जिसमें अंडर ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट के छात्रों को 112 गोल्ड मेडल एवं एक सिल्वर मेडल दिया गया. उपराष्ट्रपति ने अगले पांच साल में डीयू के वैश्विक रैंकिंग के और बेहतर होने की उम्मीद जाहिर की और कहा कि डिग्री तो सिर्फ सर्टिफिकेट हैं, लेकिन सच्ची शिक्षा तो इंसानियत, चरित्र और जिम्मेदारी से आती है. शिक्षा जीवन का अंतिम पड़ाव नहीं बल्कि निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है. ज्ञान अर्जन एक सतत प्रक्रिया है और कोई भी शक्ति उच्च शिक्षा की प्रगति को रोक नहीं सकती है.

विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने में युवाओं की भूमिका अहम


उपराष्ट्रपति ने कहा कि आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत-2047 के लक्ष्य काे हासिल करने के लिए युवाओं की भागीदारी जरूरी है.  भारतीय ज्ञान परंपरा, पारदर्शी समाज, अनुशासन तथा नैतिक मूल्य राष्ट्र निर्माण की आधारशिला होते हैं. मौजूदा समय में जम्मू-कश्मीर सहित देश के दूरस्थ क्षेत्रों के छात्र शिक्षा के जरिये नया मुकाम हासिल कर रहे हैं. यह भारत के उज्ज्वल भविष्य का संकेत है. डिग्री केवल उपलब्धि नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व निभाने की नयी शुरुआत होती है. ऐसे में छात्रों को ज्ञान, संवेदनशीलता और सेवा भाव के साथ राष्ट्र निर्माण में योगदान देने का काम करना चाहिए. इस मौके पर डीयू कुलपति प्रोफेसर योगेश सिंह ने कहा कि दिल्ली विश्वविद्यालय ने द्वितीय विश्व युद्ध और कोविड-19 महामारी जैसी चुनौतियों के बावजूद अपनी शैक्षणिक परंपरा को बनाए रखते हुए हर साल दीक्षांत समारोह का आयोजन किया है, जो विश्वविद्यालय की अकादमिक प्रतिबद्धता का प्रतीक है.

डीयू का ध्येय वाक्य ‘निष्ठा धृति: सत्यम्’ और राष्ट्र प्रथम को जीवन का मार्गदर्शक सिद्धांत बनाने का संदेश देता है. देश की प्रगति और सामाजिक समरसता की जिम्मेदारी नागरिकों की होती है और देश हमारा है और इसकी चिंता भी हमें ही करनी होगी. ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए जिससे समाजिक भाईचारा, सौहार्द और राष्ट्रीय एकता को नुकसान हो. इस दौरान डीन ऑफ कॉलेज प्रोफेसर बलराम पाणी, दक्षिणी परिसर की निदेशक प्रोफेसर रजनी अब्बी, एसओएल की निदेशक प्रोफेसर पायल मागो, रजिस्ट्रार डॉक्टर विकास गुप्ता और परीक्षा नियंत्रक प्रोफेसर गुरप्रीत सिंह टुटेजा सहित सभी डीन, विभागाध्यक्ष, शिक्षक, अधिकारी, कर्मचारी और हजारों छात्र मौजूद रहे. 

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