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जिनपिंग के स्वागत को तैयार ''महाबलीपुरम’, चीन से है गहरा नाता, जानिए इस एतिहासिक शहर के बारे में

Updated at : 09 Oct 2019 11:33 AM (IST)
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जिनपिंग के स्वागत को तैयार ''महाबलीपुरम’, चीन से है गहरा नाता, जानिए इस एतिहासिक शहर के बारे में

नयी दिल्ली: चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग 11 अक्टूबर को भारत को दौरे पर आ रहे हैं. यहां वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ आर्थिक, कूटनीतिक और सामरिक मसले पर अहम द्विपक्षीय वार्ता करेंगे. दोनों नेताओं के बीच द्विपक्षीय वार्ता के लिए स्थान के तौर पर तमिलनाडू स्थित महाबलीपुरम का चयन किया गया है. राजधानी […]

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नयी दिल्ली: चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग 11 अक्टूबर को भारत को दौरे पर आ रहे हैं. यहां वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ आर्थिक, कूटनीतिक और सामरिक मसले पर अहम द्विपक्षीय वार्ता करेंगे. दोनों नेताओं के बीच द्विपक्षीय वार्ता के लिए स्थान के तौर पर तमिलनाडू स्थित महाबलीपुरम का चयन किया गया है.

राजधानी दिल्ली से दूर महाबलीपुरम को दोनों शीर्ष नेताओं की बीच वार्ता के लिए चुना जाना जरूर ये उत्सुकता जगाता है कि आखिर इसी शहर का चयन क्यों किया गया. एक बात साफ है कि जरूर महाबलीपुरम का महत्व चीन और भारत के एतिहासिक संबंधों के संदर्भ में रहा होगा. तो आइए जानते हैं कि महाबलीपुरम शहर के बारे में…

जानें महाबलीपुरम का गौरवशाली इतिहास
तमिलनाडू में स्थित महाबलीपुरम शहर बंंगाली की खाड़ी के किनारे बसी इसकी राजधानी चेन्नई से तकरीबन 60 किलोमीटर दूर है. इस नगर की स्थापना धार्मिक उद्देश्यों से सातवीं सदी में पल्लव वंश के ‘राजा नरसिंह देव बर्मन’ ने करवाया था. चूंकि नरसिंह देव को ‘मामल्ल’ भी कहा जाता था इसलिए महाबलीपुरम को मामल्लपुरम के नाम से भी जाना जाता है. इस नगर का एक अन्य प्राचीन नाम बाणपुर भी मिलता है.

महाबलीपुरम का चीन से है गहरा नाता
भारतीय पुरातात्विक विभाग को यहां शोध के दौरान चीन, फारस और रोम के प्राचीन सिक्के बड़ी संख्या में मिले हैं. इससे अंदाजा लगाया गया कि महाबलीपुरम नगर प्राचीन काल में प्रसिद्ध व्यापारिक बंदरगाह रहा होगा. इसके जरिए भारत का व्यापारिक संपर्क चीन सहित पश्चिमी और दक्षिण पूर्व एशिया के विभिन्न देशों से रहा होगा. महाबलीपुरम का चीन के साथ व्यापारिक संपर्कों का साक्ष्य बहुतायात में मिलता है.

महाबलीपुरम शहर का निर्माण पल्लव वंश के शासक राजा नरसिंह बर्मन देव ने करवाया था. इसी वंश के तीसरे शासक राजा बोधिधर्म ने चीन के शासकों के साथ एक समझौता किया था. इस समझौते के मुताबिक पल्लव शासक ने चीन की सीमाओं की सुरक्षा का आश्वासन दिया था.

कहा जाता है कि सातवीं शताब्दी तक चीन के शासकों और पल्लव वंश के बीच गाढ़ी मित्रता कायम हुयी. कालातंर में पल्लव शासक बोधिधर्म ने बौद्ध धर्म अपना लिया और चीन की यात्रा पर गए. वहां किए गए उनके सामाजिक कार्यों की वजह से उन्हें चीन में आज भी काफी सम्मानित स्थान हासिल है.

राजा नरसिंहदेव वर्मन ने कराया निर्माण
सातवीं और आठवीं दी में पल्लव राजाओं ने यहां काफी बड़ी संख्या में मन्दिर और स्मारक बनवाए. यहां मिले अधिकांश मंदिर शैव परंपरा पर आधारित हैं. मंदिर और स्मारकों की बात की जाए तो यहां चट्टान से निर्मित अर्जुन की तपस्या और गंगावतरण जैसी मूर्तियां दिलचस्प हैं. समुद्र तट में काफी संख्या में शैव मंदिर बने हैं. चट्टानों का काट कर काफी संख्या में यहां गुफा मंदिर भी बनाए गए हैं. एतिहासिक साक्ष्यों से पता चलता है कि यहां के लोग बड़ी संख्या में श्याम, कंबोडिया, मलाया और इंडोनेशिया में जाकर बसे थे और उपनिवेशों की स्थापना की.


महाभारत पर आधारित शिल्पों का निर्माण
महाबलीपुरम के निकट एक पहाड़ी के ऊपर दीपस्तम्भ बनाया गया था. ये सुरक्षित समुद्री यात्राओं के लिए बनवाया गया था. यहीं पर पांच रथ और एकाश्म मंदिर भी है. कहा जाता है कि ये उन सात मंदिरों का अवशेष है जिसकी वजह से इस नगर को सप्तपगोडा भी कहा जाता है. शिल्पकला की बात की जाए तो यहां ज्यादातर द्रविड़ शैली में शैव मंदिरों का निर्माण हुआ है.

इसके अलावा महाबलीपुरम में महाभारत काल के विभिन्न प्रसंगो से जुड़ी कलाकृतियों का निर्माण किया गया है.

अगर कोई महाबलीपुरम का दौरा करना चाहता है तो यहां कई सारे साधन हैं. हवाई मार्ग से जाने के लिए निकटतम एयरपोर्ट चेन्नई एयरपोर्ट है. निकटतम रेलवे स्टेशन भी चेन्नई है. यहां उतरने के बाद बस या टैक्सी की मदद से महाबलीपुरम जा सकते हैं. यहां ठहरने के लिए काफी संख्या में होटल, रिजॉर्ट और गेस्ट हाउस हैं.

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