सुप्रीम कोर्ट ने कांचा इलैया की किताब पर बैन लगाने से किया इनकार, पढ़ें क्या है मामला...?
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 16 Oct 2017 4:29 PM
नयी दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने प्रो कांचा इलैया की किताब पर बैन लगाने से इनकार कर दिया है. मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की पीठ ने बैन लगाने वाली याचिका पर सुनवार्इ करने के दौरान कहा कि हम यहां किताबों पर प्रतिबंध लगाने के लिए नहीं बैठे हैं. पीठ ने कहा कि किसी किताब को […]
नयी दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने प्रो कांचा इलैया की किताब पर बैन लगाने से इनकार कर दिया है. मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की पीठ ने बैन लगाने वाली याचिका पर सुनवार्इ करने के दौरान कहा कि हम यहां किताबों पर प्रतिबंध लगाने के लिए नहीं बैठे हैं. पीठ ने कहा कि किसी किताब को केवल इसलिए बैन नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह विवादित है. लेखक और चिंतक कांचा इलैया बीते एक महीने से अपनी किताब ‘पोस्ट-हिंदू इंडिया’ के अनुवादित अंश ‘सामाजिका स्मगलर्लु कोमाटोल्लू’ पर हुए विवाद में घिरे हैं. आर्य वैश्य समुदाय की ओर से समुदाय को ‘सोशल स्मगलर’ कहने पर काफी आपत्ति जतायी गयी थी.
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इस किताब को बैन करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दायर की गयी थी. बीते 13 अक्टूबर को इस याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने लेखक के अभिव्यक्ति के अधिकार का हवाला देते हुए इस याचिका को ख़ारिज कर दिया था. मीडिया में आ रही खबरों के अनुसार, कोर्ट ने कहा कि किताबों पर प्रतिबंध लगाना उसकी क्षमताओं में नहीं आता, क्योंकि ये लेखक के उसके आस-पास समाज के बारे में विचार हैं, जिसे व्यक्त करने के लिए वे स्वतंत्र हैं. कोर्ट से किसी मुक्त अभिव्यक्ति को रोकने के लिए नहीं कहा जा सकता. सुप्रीम कोर्ट ने अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार को हमेशा सबसे ऊपर रखा है.
मीडिा में आ रही खबरों के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली एक बेंच ने किताब पर प्रतिबंध की मांग करने वाले वकील से कहा कि वे किसी किताब को केवल इसलिए बैन नहीं कर सकते, क्योंकि वह विवादित है. कोर्ट ने लेखक की रचनात्मक स्वतंत्रता की पैरवी करते हुए कहा कि इस तरह के प्रतिबंध लगाना उनकी बोलने और अभिव्यक्त करने की आजादी को घटाना होगा. हालांकि, कोर्ट ने कहा कि वह केवल लेखकों को थोड़ा संयमित होकर लिखने की सलाह दे सकते हैं.
बताया जा रहा है कि पोस्ट-हिंदू इंडिया नाम की यह किताब 2009 में आयी थी. इस किताब में विभिन्न जातियों के बारे में लेखों की एक श्रृंखला थी, जिसका हाल ही में तेलुगू अनुवाद हुआ. इस किताब के एक लेख में आर्य-वैश्य समुदाय को ‘सोशल स्मगलर’ (सामाजिक तस्कर) कहा गया है. इसके बाद इलैया के खिलाफ इस समुदाय ने तीखा विरोध शुरू किया और उन्हें जान से मारने की धमकी मिली. साथ ही, उन पर हमले की कोशिश भी की गयी.
प्रो इलैया की इस किताब पर बैन लगाने की यह जनहित याचिका आर्य वैश्य एसोसिएशन के नेता और वकील रामनजनेयुलू की आेर से दायर की गयी थी, जिनका कहना था कि ये किताब पूरे आर्य वैश्य समुदाय को बदनाम करने की कोशिश है. इसलिए इसे बैन करना चाहिए.
कोर्ट ने याचिकाकर्ता को फटकार लगाते हुए कहा कि इलैया की किताब को बैन करने का उसका निवेदन ‘महत्वाकांक्षी’ ज़्यादा लग रहा है. मीडिया में आ रही खबरों के के अनुसार, कोर्ट ने कहा कि जब कोई लेखक किताब लिखता है, तो ये उसकी अभिव्यक्ति का अधिकार है. हमें नहीं लगता कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत इस कोर्ट का किसी किताब या फिर किताबों पर प्रतिबंध लगाना उचित होगा.
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