Bangladesh Election Challenges: बांग्लादेश में अगला राष्ट्रीय चुनाव 12 फरवरी, 2026 को आयोजित किया जाएगा. यह चुनाव अगस्त 2024 में हुए उस छात्र-नेतृत्व वाले आंदोलन के बाद पहला राष्ट्रीय मतदान होगा, जिसने तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया था. मुख्य चुनाव आयुक्त एएमएम नासिर उद्दीन ने टेलीविजन पर राष्ट्र को संबोधित करते हुए बताया कि देश के सभी 300 संसदीय क्षेत्रों में एक साथ मतदान होगा और इसी दिन एक राष्ट्रव्यापी जनमत संग्रह भी कराया जाएगा. यह चुनाव उस छात्र-नेतृत्व वाले आंदोलन के बाद हो रहा है जिसने शेख हसीना सरकार को सत्ता से बाहर किया. इस वजह से यह सिर्फ सत्ता चयन नहीं, बल्कि नई राजनीतिक दिशा तय करने का चुनाव माना जा रहा है. अंतरिम सरकार और चुनाव आयोग दोनों पर नजरें चुनाव को सफलतापूर्वक करा लेने पर टिकी हैं, क्योंकि लोकतांत्रिक भरोसे की बहाली इसी से जुड़ी है. 12 फरवरी को क्या होने वाला है, इसे व्यापक स्केल से समझिए-
चुनाव और जनमत संग्रह साथ-साथ एक बड़ा दांव
12 फरवरी को बांग्लादेश में पहली बार ऐसा होगा जब संसदीय चुनाव और जनमत संग्रह एक ही दिन कराए जाएंगे. यह फैसला चुनावी भागीदारी बढ़ाने के इरादे से लिया गया है. लेकिन इससे मतदान और मतगणना की जटिलता कई गुना बढ़ जाएगी. एक छोटी प्रशासनिक चूक पूरे चुनाव की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर सकती है. बांग्लादेश में करीब 12 करोड़ पंजीकृत मतदाता हैं. एक ही दिन में संसदीय चुनाव + जनमत संग्रह होगा मतलब हर वोटर से दो वोट, ऐसे में कुल अनुमानित 20-22 करोड़ वोट. तुलना से समझिए कि 2008 के चुनाव में 7 करोड़ वोट गिने गए थे और 24 घंटे लगे थे. इस बार वोट तीन गुना हैं, लेकिन समय वही.
नामांकन और समय-सारिणी की चुनौती
नामांकन, जांच और वापसी की समय-सीमा बेहद तंग रखी गई है. राजनीतिक दलों को उम्मीदवार चयन में जल्दी फैसले लेने होंगे. इससे आंतरिक कलह और बगावत की संभावना बढ़ जाती है. गलत टिकट बंटवारे का असर सीधे चुनावी हिंसा पर पड़ सकता है. चुनाव कार्यक्रम के मुताबिक उम्मीदवार 29 दिसंबर, 2025 तक नामांकन दाखिल कर सकेंगे. चुनाव प्रचार 22 जनवरी, 2026 से शुरू होकर मतदान से 48 घंटे पहले समाप्त होगा. चुनाव आयोग ने करीब 12.76 करोड़ मतदाताओं के लिए देशभर में 42,761 मतदान केंद्र और 2,44,739 बूथ तैयार किए हैं. दोहरे मतदान को ध्यान में रखते हुए वोटिंग का समय बढ़ाकर सुबह 7:30 बजे से शाम 4:30 बजे तक कर दिया गया है.
चुनावी कार्यक्रम के तहत उम्मीदवारों के नामांकन दाखिल करने की आखिरी तारीख 29 दिसंबर तय की गई है, जबकि दाखिल नामांकन पत्रों की जांच की प्रक्रिया 30 दिसंबर 2025 से शुरू होकर 4 जनवरी 2026 तक चलेगी. रिटर्निंग ऑफिसर के फैसलों के खिलाफ चुनाव आयोग में अपील करने की अंतिम तारीख 11 जनवरी रखी गई है और इन अपीलों पर आयोग 12 से 18 जनवरी के बीच सुनवाई कर निपटारा करेगा. इसके बाद उम्मीदवार 20 जनवरी तक अपनी उम्मीदवारी वापस ले सकेंगे, जबकि 21 जनवरी को चुनाव चिन्हों का आवंटन करते हुए उम्मीदवारों की अंतिम सूची सार्वजनिक की जाएगी. पर्यावरण संरक्षण के तहत चुनाव प्रचार पोस्टरों पर भी प्रतिबंध लगाया गया है.
एक ही दिन दो वोट की बड़ी परीक्षा, मतगणना में देरी का खतरा
मतदाताओं को एक साथ दो अलग-अलग मतपत्रों पर वोट डालना होगा. इससे मतदान प्रक्रिया स्वाभाविक रूप से धीमी होगी. लंबी कतारें और समय का दबाव अव्यवस्था पैदा कर सकता है. विशेषकर बुजुर्ग और ग्रामीण मतदाताओं के लिए यह मुश्किल होगी. विशेषज्ञों के अनुसार लगभग 20 करोड़ वोटों की गिनती करनी होगी. पहले के अनुभव बताते हैं कि देरी से हिंसा भड़कने का खतरा रहता है. राजनीतिक दल नतीजों का धैर्य से इंतजार नहीं करते. यही वजह है कि गिनती इस चुनाव की कमजोर कड़ी बन सकती है.
मतदान केंद्रों का गणित और समय का दबाव
प्रत्येक मतदाता को औसतन 50 सेकंड से भी कम समय मिलेगा. उसी समय में उसे दो मतपत्र भरने होंगे. अगर मतदान धीमा हुआ, तो कई मतदाता वोट डाले बिना लौट सकते हैं. यह मतदान प्रतिशत और वैधता दोनों को प्रभावित कर सकता है.
सिस्टम कितना दबाव में होगा? कुल मतदान केंद्र= 42,761 कुल बूथ= 2,44,739 प्रति केंद्र औसतन वोटर = 2,800-3,000. एक वोटर को संसद वोट + रेफरेंडम वोट डालने हैं, जिसमें औसतन 50-55 सेकंड लगेंगे. ऐसे में अगर हर वोटर 10 सेकंड भी ज्यादा लेता है, तो कतारें 1-1.5 घंटे लंबी होंगी.
वोटिंग टाइम बढ़ाया गया, लेकिन क्या काफी है? सामान्य मतदान समय है 8 घंटे, लेकिन इस बार 9 घंटे (7:30 AM – 4:30 PM तक मतदान होंगे). गणित कहता है कि एक बूथ को हर घंटे 55-65 वोट डालवाने होंगे. यानी दो मतपत्रों के साथ यह मैक्सिमम कैपेसिटी पर काम है. ग्रामीण इलाकों में यह आंकड़ा कैसे काम करेगा, यह देखने वाली बात होगी.
मतगणना: सबसे बड़ा टिकिंग टाइम बम यही बन सकता है. अनुमानित मतपत्र 20 करोड़+ होंगे. हर केंद्र पर दो अलग-अलग गिनती होगी. कई इलाकों में बिजली नहीं है या कमजोर सप्लाई है. ऐसे एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि शुरुआती नतीजे 24-36 घंटे बाद आ सकते हैं और फाइनल रिजल्ट 2-3 दिन में आ सकता है. हालांकि ध्यान देने वाली बात है कि चुनावों के बाद मतगणना की तारीखों का ऐलान अभी भी नहीं किया गया है. यह भी हैरान करने वाली बात है कि चुनावों की घोषणा कर दी गई है, लेकिन उसकी गिनती कब होगी, यह अब तक कम से कम सार्वजनिक रूप से तो नहीं बताया गया है.
प्रवासी वोटिंग की नई लेकिन कठिन व्यवस्था
मोहम्मद यूनुस ने बताया कि बांग्लादेश बड़ी प्रवासी आबादी के लिए शुरू की गई डाक मतदान व्यवस्था पर करीबी नजर रखे हुए हैं. यूनुस ने बताया कि अंतरिम सरकार द्वारा देश के इतिहास में पहली बार यह प्रणाली शुरू किए जाने के बाद विदेशों में रह रहे और काम कर रहे करीब 7 लाख बांग्लादेशियों ने पोस्टल बैलेट के लिए पंजीकरण कराया है. यानी देश से बाहर रहने वाले लोगों को भी चुनावों में भाग लेने का मौका मिलेगा, इसके लिए उन्हें बांग्लादेश में आने की जरूरत नहीं होगी.
प्रवासियों के लिए डाक मतपत्र से मतदान की ऑनलाइन व्यवस्था पहली बार लागू की गई है, जिसके तहत अब तक लगभग तीन लाख लोग पंजीकरण करा चुके हैं. पहली बार बड़ी संख्या में प्रवासी पोस्टल बैलेट से वोट करेंगे. इसका प्रशासनिक अनुभव आयोग के पास सीमित है. मतपत्रों की सुरक्षा, समय पर पहुंच और गिनती चुनौती होगी. किसी भी विवाद से चुनाव पर सवाल उठ सकते हैं.
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चुनावी माहौल अभी भी अस्थिर
बांग्लादेश के इस चुनाव में पहली बार अवामी लीग भाग नहीं ले रही है. उसे प्रतिबंधित कर दिया गया है. इससे बीएनपी बनाम जमात कै खुला तनाव सामने आ रहा है. सोशल मीडिया पर ‘No AL, No Election’ (बिना अवामी लीग चुनाव नहीं) अभियान भी चल रहा है. ऐसे में इस चुनाव को निष्पक्ष मानना भी कठिन है. वोटिंग से पहले ही वैधता पर सवाल खड़े हो रहे हैं. यही चुनाव के बाद सबसे बड़ा ट्रिगर बन सकता है. अवामी लीग पर प्रतिबंध के बाद राजनीतिक ध्रुवीकरण तेज है. बीएनपी और जमात के बीच तनाव भी खुलकर सामने आ रहा है. सोशल मीडिया पर अभियान चल रहे हैं, ऐसे माहौल में निष्पक्षता बनाए रखना आसान नहीं होगा.
राजनीतिक दलों की असहिष्णुता और कानून-व्यवस्था
बांग्लादेश की राजनीति में हार स्वीकार करने की संस्कृति कमजोर है. कई दल मानते हैं कि जीत किसी भी कीमत पर होनी चाहिए. इस सोच से चुनाव के बाद तनाव बढ़ता है. चुनाव आयोग के लिए यह मानसिकता सबसे बड़ी चुनौती है. करीब एक लाख सुरक्षाकर्मी चुनाव ड्यूटी पर रहेंगे. हर उपजिले में सेना की तैनाती की योजना है. इसके बावजूद विशेषज्ञ मानते हैं कि जमीनी हालात पूरी तरह संतोषजनक नहीं. छोटी घटना भी बड़े टकराव में बदल सकती है.
यह चुनाव क्यों है सिस्टम टेस्ट
यह चुनाव तय करेगा कि क्या बांग्लादेश संविधान बदलने लायक स्थिर है? क्या संस्थाएं व्यक्ति से ऊपर हैं? क्या हार स्वीकार करने की राजनीतिक परिपक्वता है? इसलिए यह सिर्फ चुनाव नहीं, पूरा लोकतांत्रिक सिस्टम का स्ट्रेस टेस्ट है. फिलहाल बांग्लादेश तीन मुख्य पार्टियों के बीच ही चुनाव को बाध्य होगा, इसमें खालिदा जिया की मौत के बाद तारिक रहमान की नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी, जिसे सबसे बड़ा प्लेयर माना जा रहा है. दूसरी डॉ. शफीकुर रहमान की जमात ए इस्लामी पार्टी और तीसरी छात्रों की नेशनल सिटिजंस पार्टी.
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