पेशावर हमला : वह हमारी हीरो थीं, तालिबान ने जिंदा जला दिया
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 18 Dec 2014 8:47 AM
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वह हमारी हीरो थीं. वह न होतीं तो हम आज जिंदा नहीं होते. हैवानों ने उन्हें जिंदा जला डाला. पेशावर के आर्मी स्कूल से बच कर निकले इरफानुल्लाह उस लम्हे को याद कर सिहर उठते हैं. वह इरफानुल्लाह की टीचर आफशा अहमद थीं, जिनकी उम्र महज 24 साल थी. पेशावर के लेडी रीडिंग अस्पताल में […]
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वह हमारी हीरो थीं. वह न होतीं तो हम आज जिंदा नहीं होते. हैवानों ने उन्हें जिंदा जला डाला. पेशावर के आर्मी स्कूल से बच कर निकले इरफानुल्लाह उस लम्हे को याद कर सिहर उठते हैं. वह इरफानुल्लाह की टीचर आफशा अहमद थीं, जिनकी उम्र महज 24 साल थी.
पेशावर के लेडी रीडिंग अस्पताल में भरती इरफानुल्लाह ने बताया कि अगर आफशा न रही होतीं, तो वह भी मर चुके होते. वह आतंकियों और बच्चों के बीच में दीवार की तरह खड़ी हो गयीं थीं.
टीचर को अंदाजा हो गया था : 15 साल के इरफानुल्लाह ने बताया कि आतंकी जब हमारे क्लासरूम में घुसे, हम अपनी टीचर के साथ बैठे थे. जब तक हम जान पाते कि क्या हो रहा, वह खड़ी हो गयीं और आतंकियों को रोकने की कोशिश की. उन्हें अंदाजा हो गया था कि क्या होनेवाला है? आंसुओं में डूबे इरफानुल्लाह ने बताया कि आफशा आतंकियों के सामने डट कर खड़ी थीं.
उन्होंने तालिबान को चुनौती देते हुए कहा कि वह अपने बच्चों को मरने नहीं देंगी. उन्होंनें कहा, ‘पहले तुम सब मु गोली मारो, मैं अपने बच्चों की लाशें नहीं देख सकती. इरफानुल्लाह के मुताबिक ये उनकी आखिरी शब्द थे. तालिबानियों ने उनके शरीर पर कोई चीज फेंक दी और अगले ही पल वह आग की लपटों में घिर गयीं.
इरफानुल्लाह ने बताया कि हम बस यही देख पाये कि तालिबान ने उन्हें जिंदा जला डाला. वह आग की लपटों से घिरी हुईं थी फिर भी चिल्ला-चिल्ला कर हमें भाग जाने के लिए कह रही थीं. वह बहुत ही बहादुर थीं. उसे दुख है कि वह अपने टीचर को नहीं बचा पाया. उसने कहा कि वह हमारी हीरों थीं. वह सुपरवुमैन थी. अब हमें कौन पढ़ायेगा.?
नौवीं कक्षा में मात्र एक छात्र बचा
मैं सोमवार रात को एक शादी में गया था, सुबह अलार्म समय से बजा नहीं, देर से उठा, तो स्कूल नहीं गया. बाद में स्कूल में आतंकी हमला सुना. ये लफ्ज पेशावर के आर्मी पब्लिक स्कूल के एक छात्र दाऊद इब्राहिम के हैं, जिसकी खराब अलार्म घड़ी ने उसे बचा लिया. दाऊद अंडर-16 जूडो टीम में है और अपनी क्लास का अकेला बच्चा है, जो इस आतंकी हमले से बच गया है. दाऊद 15 साल का है और नवीं कक्षा का छात्र है.
शायद! यह मौत की छुअन थी
एक छात्र ने बताया कि बड़े काले जूतों वाला शख्स बच्चों को मार रहा था. मैंने अपनी टाइ को मोड़ कर अपने मुंह में दबा लिया, ताकि चीख न निकल जाये. मैं वहीं अपनी सांसे रोक कर और आंखें बंद कर लेट गया. वह हर शव को गोली मार रहा था. मैं भी अपनी आंखें बंद कर गोली लगने का इंतजार कर रहा था, मगर वह आया मु अपनी बंदूक से हिला-डुला कर चला गया. शायद यह मौत की छुअन थी. वह आतंकी फिर वहां से चला गया.
वहां जाओ, उन्हें मारो..
मैं हमले के वक्त स्कूल ऑडिटोरियम में कैरियर गाइडेंस सत्र में अपने सहपाठी के साथ था. तभी अचानक सुरक्षा बलों की वेशभूषा में चार आतंकी गोलियां बरसाते हुए घुसे. हम आनन-फानन में सीटों के नीचे छिपने की कोशिश करने लगे. इतने में ही एक आतंकी चिल्लाया-‘सीटों और बेंचों के नीचे कई छात्र छिपे हैं. वहां जाओ और उन्हें मारो. अचानक मेरे दोनों पैरों में गोली लग गयी. मु भयानक दर्द हो रहा था.
एक बच्चे को मारी नौ गोलियां
पेशावर के आर्मी स्कूल में तालिबान आत्मघाती हमलावरों ने बेहद करीब से छात्रों पर अंधाधुंध गोलियां चलायी. खून में लथपथ एक बच्चे ने बताया कि मेरे सहपाठी को आतंकियों ने नौ गोलियां मारी. हरेक कमरे में अंधाधुंध फायरिंग की, ग्रेनेड फेंके. इसके बाद एक हमलवार ने एक कमरा में जाकर खुद को उड़ा लिया. उस कक्षा में 60 से अधिक छात्र थे. इसमें अधिकांश की मौत हो गयी, जबकि कई मौत और जिंदगी से जूझ रहे हैं.
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