नगालैंड की ‘स्नेक वुमन’
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 16 Jul 2013 1:31 PM
नगालैंड की रहनेवाली स्नेक वुमन के नाम से मशहूर चुन राशुनलिउ जी कैमे ने अपने वास्तविक नाम के अलावा, अपने अनूठे काम की बदौलत अलग-अलग भाषाओं में अपने नामों से पूरे उत्तर पूर्व भारत में अपनी अलग पहचान बना ली है. मुश्किलों में ढूंढ़ा रास्ता बचपन से ही प्रतिभाशाली इस नगा महिला ने 1995 में […]
नगालैंड की रहनेवाली स्नेक वुमन के नाम से मशहूर चुन राशुनलिउ जी कैमे ने अपने वास्तविक नाम के अलावा, अपने अनूठे काम की बदौलत अलग-अलग भाषाओं में अपने नामों से पूरे उत्तर पूर्व भारत में अपनी अलग पहचान बना ली है.
मुश्किलों में ढूंढ़ा रास्ता
बचपन से ही प्रतिभाशाली इस नगा महिला ने 1995 में नगालैंड एमबीबीएस एग्जाम टॉप किया, लेकिन नगा आदिवासी समुदाय की होने की वजह से उसे मेडिकल की सीट नहीं मिली. उसके बाद 2005 में उसने नगालैंड सिविल सर्विसेज एग्जाम क्वालिफाई किया, एक बार फिर उसे इसी आधार पर खारिज कर दिया गया. इस महिला ने फिर भी हार नहीं मानी और उसने दिखा दिया कि एक दरवाजा बंद होते ही अपने लिए मंजिल का दूसरा दरवाजा कैसे तलाश लिया जाता है.
मिली एक अलग पहचान
जब नगालैंड की रहनेवाली चुन उर्फ राशुनलिउ जी कैमे ने पिछले साल अगस्त महीने में कनाडा में आयोजित, वर्ल्ड कांग्रेस ऑफ हर्पेटोलॉजी (जल और स्थल दोनों पर पाये जानेवाले जीव और सरीसृपों की पढ़ाई) में भाग लिया तो पूरे इलाके में उनकी एक अलग पहचान बन गयी. यह एक ऐसा मौका था, जो दिन भर के धूप, बरसात की परवाह न करते हुए दलदलों में नयी तरह के जीवों को पाने के लिए खुदाई करनेवालों अच्छे-अच्छे फील्ड बायोलॉजिस्ट्स को भी बड़ी मुश्किल से मिलता है.
पहली कामयाबी आयी हाथ
बॉटनी में अपनी मास्टर्स की डिग्री पूरी कर दिल्ली विश्वविद्यालय के संट स्टीफेंस कॉलेज में बायोलॉजी व एनवायरमेंट साइंस असिस्टेंट प्रोफेसर के तौर पर ज्वाइन किया. शिक्षण कार्य के अलावा, चुन ने मणिपुर में अपना पहला जीव खोज अभियान शुरू किया.
दरअसल, चुन जल और स्थल, दोनों जगहों पर पाये जाने वाले उन जीवों को ढूंढ़ती हैं, जो अब तक दुनिया और जीव विज्ञान की नजरों से दूर थे. यह काम इतना आसान भी नहीं था. चुन बताती हैं कि इसके लिए घंटों बिना खाये-पिये जंगलों की खाक छाननी पड़ती है. जिन चिकीलिडे सेसीलियंस (ऐसे जल-स्थलीय जीव जिनके हाथ-पैर नहीं होते) की खोज के लिए उन्हें यू-टय़ूब, नेशनल ज्योग्रफिक सहित दुनियाभर में पहचान मिली, वे जमीन पर कभी-कभार ही दिखाई देते हैं.
वे जमीन से दस-बारह इंच नीचे रहते हैं. अब आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं कि उन्हें ढूंढ़ना कितना मुश्किल होगा. और तो और, उन्हें और उनकी टीम को उत्तर-पूर्व के घने जंगलों में रात-दिन बारिश में घूमना होता था.
जहां एक ओर उन्हें जंगली जानवरों का डर रहता था, वहीं हथियारबंद सैन्य बलों का भी खतरा रहता था, जिन्हें टॉर्च की एक छोटी सी रोशनी देखते ही गोली मारने का आदेश है. चुन आगे बताती हैं कि इसके लिए मुङो सैन्यबलों के बड़े अफसरों से गुजारिश करनी पड़ी कि वे ऐसे किसी शख्स पर गोली न चलायें, जिनके सिर पर टॉर्च लगी हो.
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