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खेल-खेल में जीवन का पाठ

Updated at : 04 Nov 2015 4:34 AM (IST)
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खेल-खेल में जीवन का पाठ

झुग्गियों के बच्चों के लिए ‘पिक्चरवाला फाउंडेशन’ लंदन से बिजनेस स्टडीज में पोस्टग्रैजुएशन कर भारत लौटीं श्रेया सोनी ने दिल्ली की झुग्गियों में रहनेवाले बच्चों के लिए ‘पिक्चरवाला फाउंडेशन’ की शुरुआत की है. यह गैर-लाभकारी संस्था फिल्म, नाटक, कला, संगीत, खेल और कार्यशालाओं के जरिये बच्चों को जीवन कौशल का पाठ पढ़ाती है. इंगलैंड के […]

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झुग्गियों के बच्चों के लिए ‘पिक्चरवाला फाउंडेशन’
लंदन से बिजनेस स्टडीज में पोस्टग्रैजुएशन कर भारत लौटीं श्रेया सोनी ने दिल्ली की झुग्गियों में रहनेवाले बच्चों के लिए ‘पिक्चरवाला फाउंडेशन’ की शुरुआत की है. यह गैर-लाभकारी संस्था फिल्म, नाटक, कला, संगीत, खेल और कार्यशालाओं के जरिये बच्चों को जीवन कौशल का पाठ पढ़ाती है.
इंगलैंड के वारविक बिजनेस स्कूल से पोस्टग्रैजुएशन करने के बाद श्रेया सोनी अपने गृहनगर दिल्ली लौट आयीं. लंदन स्थित अर्न्स्ट एंड यंग के यूरोपियन मुख्यालय में मैनेजमेंट कंसल्टैंट की नौकरी छोड़कर वह यहां अपने करियर को नयी दिशा देने में जुट गयीं.
इस बीच हर दिन अपने घर से काम पर जाने के रास्ते में जब कभी श्रेया की कार ट्रैफिक सिग्नल पर ठहरती, तो कुछ बच्चे उनकी गाड़ी की खिड़की पर आकर पैसे, या खाने को मांगते थे.
श्रेया उन्हें बिस्किट या ब्रेड के पैकेट या कुछ पुराने कपड़े दे देतीं. वह बताती हैं कि चूंकि शुरू से हमारे परिवार में नियम है कि हम ऐसे बच्चों को पैसे के बजाय खाने का सामान या कपड़े दें. इसलिए ये चीजें हमेशा मेरी कार में रहती हैं.
श्रेया आगे बताती हैं कि इस तरह कुछ महीनों में श्रेया का उन बच्चों से एक नाता-सा जुड़ गया. फिर क्या था! धीरे-धीरे मैं उनके साथ समय बिताने लगीं. उन गरीब बच्चों के बारे जानना, उनकी कहानियां सुनना और अनुभव सुनाना, उनके साथ टिफिन शेयर करना अच्छा लगने लगा. बच्चे भी बड़े खुश थे कि दुनिया में कोई ऐसा भी है, जिन्हें उनमें दिलचस्पी है. श्रेया ने उन बच्चों से हिंदी में 30 तक की गिनती सीखी.
बदले में उन्हें अंगरेजी वर्णमाला के अक्षर सिखलाये. श्रेया कहती हैं, मुझे हिंदी में गिनती सिखा कर उन बच्चों में मैंने पाया कि उन्हें खुद पर गर्व महसूस हो रहा था, क्योंकि उन्हेें लगा कि कुछ ऐसा भी है, जो वे मुझ जैसे लोगों से ज्यादा जानते हैं.
वह बताती हैं कि एक दिन मैं फिल्म देखने घर से निकली़, तो रास्ते में ये बच्चे मिले. बच्चों ने फिल्म देखने की इच्छा व्यक्त की. मैं चाहती तो उन्हें किसी सिनेमाहॉल में ले जाकर कोई फिल्म दिखा सकती थीं. लेकिन मैं उनके माहौल से बाहर लाकर उन्हें चौंकाना नहीं चाहती थी. ऐसे में एक प्रयोग के तहत बच्चों को उनकी बस्ती में एक फिल्म दिखाने की सोची. यह फिल्म देखने के बाद बच्चों को यह बताना था कि उन्होंने इससे क्या-क्या बातें सीखीं.
‘और फिल्म ‘इकबाल’ से शुरू हुआ सफर, जो 2013 में ‘पिक्चरवाला फाउंडेशन’ की शुरुआत के रूप में परिणत हुआ़ आज यह गैर-लाभकारी संस्था, झुग्गी-बस्तियों में रहनेवाले बच्चों के बीच कौशल विकास का काम करती है. इसका जरिया है फिल्म, नाटक, कला, संगीत, खेल व कार्यशालाओं का आयोजन. मकसद होता है बच्चों के बीच खेल-खेल में इनसे जुड़ाव पैदा कर सीखने की ललक पैदा करना.
दिल्ली की झुग्गियों में रहनेवाले बच्चे दिन भर में दो घंटे का समय निकालकर 75-75 के समूह में ‘पिक्चरवाला फाउंडेशन’ की कार्यशालाओं और अन्य आयोजनों में भाग लेकर उनसे नयी-नयी बातें और जीवन-कौशल के नये पाठ सीखते हैं. हर आयोजन के बाद उनसे पूछा जाता है कि उन्होंने क्या सीखा. सबसे अच्छा करनेवाले बच्चे को पुरस्कृत भी किया जाता है.
श्रेया बताती हैं कि चूंकि इन झुग्गियों में रहनेवाला हर बच्चा अपने परिवार की कमाई में हाथ बंटाता है, ऐसे में उनके घरवालों को ‘पिक्चरवाला फाउंडेशन’ के आयोजनों में अपने बच्चों को भेजने के लिए राजी करने में उन्हें बड़ी मशक्कत करनी पड़ी.
लेकिन फायदे के बारे में बार-बार समझाने के बाद कुछ लोग सहमत हुए. इस तरह ‘पिक्चरवाला फाउंडेशन’ की पहली फिल्म स्क्रीनिंग के मौके पर 35-40 बच्चों ने भाग लिया. आज जब भी श्रेया बच्चों को अपने आयोजनों में बुलाने के लिए इन झुग्गियों के बीच से गुजरती हैं, तो उन्हें लोग पिक्चरवाला के ही नाम से लोग बुलाते हैं.
वह बताती हैं कि संस्था के आयोजनों का खर्च प्राय: वह अकेले ही उठाती हैं, हालांकि समय-समय पर बुक माइ शो, बुक अ स्माइल, स्टिक और दिल्ली पुलिस जैसे संगठन सहयोग करते हैं. इसके अलावा, कई लोग निजी तौर पर भी उनके आयोजनों में रुपये-पैसों के अलावा सशरीर योगदान देते हैं.
बहरहाल, श्रेया इन सबके बीच अपने काम के साथ सामंजस्य स्थापित कर वंचित तबके के बच्चों को खेल-खेल में जीवन कौशल सिखाने की कोशिश में लगी हुई हैं. वह कहती हैं, मैं चाहती हूं कि देश के हर शहर और कस्बे की झुग्गी-बस्ती के लिए अलग-अलग ‘पिक्चरवाला फाउंडेशन’ क्लब हों. ताकि वंचित तबके का हर बच्चा पढ़-लिख न पाने के बावजूद अपना जीवन जीने के लिए जरूरी हुनर में सक्षम हो.
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