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लघु उद्योगों के विकास के लिए स्किल ट्रेनिंग है जरूरी

By Prabhat Khabar Print Desk
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प्रीतम बनर्जी, अर्थशास्त्री

भारत में लघु एवं मध्यम उद्योग के विकास की भरपूर संभावनाएं हैं. इस सेक्टर के सामने मुख्य रूप से तीन दिक्कतें रही हैं. पहली, लघु उद्योग के लिए क्रेडिट यानी लोन की अड़चन. हालांकि, अब सरकार ने कुछ सहूलियतें दी हैं. कोशिश है कि बैंक या नॉन बैंकिंग फाइनेंशियल से आसानी से कर्ज उपलब्ध कराया जा सके. दूसरी, बहुत सारा पेपरवर्क, जिसे अब डिजिटल माध्यमों से थोड़ा आसान बनाया जा रहा है. अब जीएसटी की फाइलिंग ऑनलाइन की जा रही है. आयात-निर्यात से जुड़े आंकड़े डिजिटली दर्ज किये जा रहे हैं. उद्योग या व्यक्तिगत चल रहे लोन और इएमआइ आदि की जानकारी पैन कार्ड से मिल सकती है. कहने का मतलब है कि किसी फर्म या कंपनी के प्रोडक्शन, टैक्स, क्रेडिट आदि की जानकारी अब डिजिटली उपलब्ध है.

किसी उद्योग की ऐसी जानकारी से आकलन आसान हो जाता है. बैंक किसी उद्योग को प्रदर्शन के आधार पर कम ब्याज पर भी लोन दे सकते हैं. पहले सभी को बहुत ऊंची ब्याज दर पर लोन मिलता था. मेरा मानना है कि इन जानकारियों के आधार पर एक प्रभावी सिस्टम बनाया तथा उसे राष्ट्रीय स्तर लागू किया जाये. बैंकों को निर्देश दिये जायें कि दी गयी रेटिंग के आधार पर लोन देने की व्यवस्था तैयार हो. अच्छी रेटिंग वाले लघु क्षेत्र के उद्यमों को कम ब्याज दर पर ऋण दिया जाये. इस तरह क्रेडिट की समस्या का हल किया जा सकता है.

उत्पादन प्रक्रिया को देखें, तो इसे भी तीन हिस्सों में बांट सकते हैं. जैसे कोई उद्यमी नयी कंपनी खड़ी करता है, तो पहली जरूरत है कि पर्याप्त धन की व्यवस्था हो. अपनी बचत के अलावा उसे ऋण की भी जरूरत होगी. अगर ब्याज दर अधिक होगी, तो इससे अतिरिक्त दबाव बनता है. दूसरी दुविधा उत्पादन की बाजार तक पहुंच बनाने की है. अभी स्थानीय उत्पादों को चीन के सस्ते उत्पादों के साथ प्रतिस्पर्धा करनी होती है. चीनी कंपनियों को वहां की सरकार कई तरह की सब्सिडी देती है.

हमारे यहां छोटी कंपनियों को जमीन, बिजली समेत कई अन्य लागतें खुद ही उठानी पड़ती हैं. हालांकि, चीनी उत्पादों को रोकने के लिए कई विकल्प हैं. दूसरा, देसी उत्पादों को खरीदने के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए. राष्ट्रहित में इस मार्केटिंग कैंपेन को तेज करने की जरूरत है. अलग-अलग क्षेत्रों के प्रसिद्ध लोग इसमें बड़ी भूमिका निभा सकते हैं. तीसरी महत्वपूर्ण बात है कि शहरी क्षेत्रों में लोग ऑनलाइन खरीदारी करते हैं.

ऐसे में एमजॉन, फ्लिपकार्ट से भी ऐसे उद्यमों को जोड़ने की जरूरत है, ताकि भारत में निर्मित उत्पादों को वे ज्यादा बेचें. इसके अलावा हमें स्किल ट्रेनिंग और तकनीक विकास के क्षेत्र में भी काम करना होगा. तकनीक के अंतर की वजह से कई बार उत्पाद बाजार में स्थान बनाने में सफल नहीं हो पाते. आधुनिक मशीनों से गुणवत्ता और उत्पादन दोनों बेहतर हुआ है. इसके लिए पढ़ाई के साथ ट्रेनिंग पर फोकस किये जाने की जरूरत है. आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को हासिल करने में लघु उद्योगों की सबसे अहम भूमिका होगी. निर्यात और विनिर्माण लघु उद्योगों में ही होता है.

बड़े उद्योगों को भी देखें, तो उसमें बहुत सारा इनपुट छोटे उद्योगों से आता है. कई बड़ी कंपनियां छोटे उद्यमियों से अपना कच्चा माल लेती हैं. मलेशिया, थाईलैंड जैसे देशों में छोटे उद्यमों का तेजी से विकास हुआ, जिससे उनका निर्यात बढ़ा. उसका सबसे बड़ा कारण था कि उनका बेसिक एजुकेशन काफी मजबूत है. हमारे यहां नयी शिक्षा नीति अब आयी है, यह इस समस्या की दवा है. हमारी प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा व्यवस्था काफी कमजोर रही है. अगर किसी कारीगर की शिक्षा अच्छी होगी, तो वह मैनुअल पढ़कर किसी मशीन को चला सकता है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति के आने के बाद अब बदलाव आयेगा.

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