शशि थरूर राष्ट्रीय हित के मुद्दे पर सरकार के साथ, कांग्रेस में बेचैनी; ये है पूरी कहानी

Edited by Rajneesh Anand
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शशि थरूर

Shashi Tharoor : आतंकवाद के खिलाफ नो टॉलरेंस नीति को विश्व के सामने रखने और भारत के पक्ष को स्पष्ट करने के लिए भारत सरकार ने कूटनीतिक चाल चली है, इसमें विपक्ष को भी शामिल किया गया है. 7 प्रतिनिधिमंडल में से तीन का नेतृत्व विपक्ष के नेता करेंगे, जिसमें शशि थरूर के नाम की खूब चर्चा हो रही है. वजह यह है कि सरकार ने पार्टियों से इस प्रतिनिधिमंडल के लिए नाम मांगा था. कांग्रेस पार्टी ने शशि थरूर का नाम अपनी ओर से जारी लिस्ट में नहीं रखा था, लेकिन सरकार ने शशि थरूर को नेतृत्व की जिम्मेदारी दी है, जिसके बाद से कयासों का बाजार गर्म है.

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Shashi Tharoor : जब बात राष्ट्रीय हित की हो और मेरी सेवाओं की आवश्यकता हो तो मैं हमेशा उपलब्ध रहूंगा. उक्त बातें कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद शशि थरूर ने कही है. शशि थरूर ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट लिखा है, जिसमें उन्होंने लिखा है कि हाल की घटनाओं पर हमारे देश का दृष्टिकोण प्रस्तुत करने के लिए पांच प्रमुख राजधानियों में एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करने के लिए भारत सरकार के निमंत्रण से मैं सम्मानित महसूस कर रहा हूं.शशि थरूर ने यह पोस्ट तब किया जब उन्हें विदेश जाने वाले सात प्रतिनिधिमंडलों में से एक का नेतृत्व करने की जिम्मेदारी मिली है.

आतंकवाद के खिलाफ भारत का कूटनीतिक अभियान

पहलगाम में 26 लोगों की हत्या, ऑपरेशन सिंदूर और उसके बाद भारत और पाकिस्तान के बीच जो कुछ हुआ, उसपर भारत का दृष्टिकोण विश्व के सामने रखने और आतंकवाद के खिलाफ नो टॉलरेंस की नीति को स्पष्ट करने के लिए भारत सरकार प्रमुख साझेदार देशों में प्रतिनिधिमंडल भेज रही है. इस कूटनीतिक प्रयास का उद्देश्य है भारत की स्थिति पूर्ण रूप से स्पष्ट करना. भारत के इस कूटनीतिक प्रयास के बारे में बात करते वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई कहते हैं कि यह स्वागत योग्य प्रयास है. ऐसा नहीं है कि इस प्रतिनिधिमंडल के जाने से कोई बड़ा बदलाव इन देशों के नजरिए में होगा, लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि इस तरह के प्रयासों से यह स्पष्ट हो जाएगा कि भारत किसी देश का विरोधी नहीं है, बल्कि हम सिर्फ और सिर्फ आतंकवाद का विरोध कर रहे हैं और उसपर हमारी जीरो टॉलरेंस की नीति है.
सूचना के अनुसार अमेरिका जाने वाले डेलिगेशन का नेतृत्व कांग्रेस सांसद शशि थरूर करेंगे.उनके अलावा बीजेपी सांसद रविशंकर प्रसाद, बैजयंत पांडा, जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के सांसद संजय झा, द्रमुक की कनिमोई, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) की सांसद सुप्रिया सुले और शिवसेना के श्रीकांत शिंदे सात अलग-अलग प्रतिनिधिमंडलों का नेतृत्व करेंगे. इनमें से चार नेता सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन से हैं, जबकि तीन विपक्षी इंडिया गठबंधन से हैं.

शशि थरूर के सोशल मीडिया पोस्ट पर मचा बवाल

Shashi Tharoor
शशि-थरूर

विदेश जाने वाले डेलिगेशन में जब शशि थरूर का नाम सबसे ऊपर नजर आया, तो शशि थरूर ने पीआईबी के इस सूचना को सोशल मीडिया पर पोस्ट किया. उसके बाद से कयासों का बाजार गर्म है, कोई यह कह रहा है कि क्या शशि थरूर बीजेपी ज्वाइन करेंगे, जिसकी संभावना पिछले कुछ दिनों से जताई जा रही है, तो कोई ये कह रहा है कि यह विशुद्ध रूप से राजनीति है. इस संबंध में रशीद किदवई कहते हैं कि शशि थरूर संयुक्त राष्ट्र के बैकग्राउंड से आते हैं, विदेशी मामलों के जानकार हैं, उनके डेलिगेशन में होने से भारत का पक्ष अच्छी तरह रखा जा सकेगा. यह राष्ट्रीय हित की बात है और इसलिए इसे शशि थरूर के कांग्रेस छोड़ देने से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए. 1994 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव ने विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी को भारत के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करने के लिए संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग के समक्ष भेजा था. इस निर्णय का उद्देश्य पाकिस्तान द्वारा कश्मीर मुद्दे पर भारत के खिलाफ प्रस्ताव लाने के प्रयासों का कूटनीतिक रूप से विरोध करना था. इस प्रतिनिधिमंडल में कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद भी शामिल थे. वाजपेयी जी नेतृत्व में भारतीय दल ने पाकिस्तान द्वारा प्रस्तावित निंदा प्रस्ताव को सफलतापूर्वक विफल किया. यह घटना भारतीय कूटनीति की एक महत्वपूर्ण सफलता मानी जाती है, जिसमें सत्तारूढ़ और विपक्षी दलों ने एकजुट होकर राष्ट्रीय हित में कार्य किया. इसलिए यह कोई पहली घटना नहीं है जब विपक्ष को प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व सौंपा गया है. यह बात दीगर है कि इस मसले पर राजनीति हो रही है और निश्चित तौर पर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही अपने-अपने नजरिए से इसका फायदा उठा रही है.

शशि थरूर को लेकर क्यों चर्चाओं का बाजार है गर्म

शशि थरूर काफी समय से कांग्रेस में बेचैनी महसूस कर रहे हैं. उन्होंने अपनी बेचैनी कई बार सोशल मीडिया में व्यक्त भी कर दी है. उन्होंने एक-दो बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ भी की है. हाल ही में जब पहलगाम की घटना हुई तो विपक्ष इंटेलिजेंस की विफलता पर सवाल उठा रहा था, उस वक्त भी शशि थरूर ने कहा था कि इंटेलिजेंस फेल हो सकता है, इजरायल जैसे देश में भी फेल्योर होते हैं. केरल की राजनीति को लेकर भी शशि थरूर के मन में संतुष्टि नहीं है और इसके बारे में वो संकेत भी दे चुके हैं.

कांग्रेस पार्टी ने नहीं भेजा था शशि थरूर का नाम

सरकार ने विपक्षी पार्टियों से प्रतिनिधिमंडल के लिए नेताओं के नाम मांगे थे. कांग्रेस पार्टी ने आनंद शर्मा,गौरव गोगोई, राजा बराबर और डॉ सैयद नासिर हुसैन का नाम भेजा था, जिसे सरकार ने शामिल नहीं किया. इससे कांग्रेस पार्टी नाराज है और कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इसे बेईमानी बताया है. उन्होंने कहा कि पार्टी पहलगाम की घटना के बाद से सरकार के साथ खड़ी है, लेकिन डेलिगेशन के नाम सामने आने के बाद वे चौंक गए हैं. इस मसले पर रशीद किदवई कहते हैं कि सरकार ने नाम मांगे थे, तो उन्हें कुछ नामों पर विचार करना चाहिए था, लेकिन अगर सरकार ने विचार नहीं किया और शशि थरूर को मौका दिया है, तो इसे सहर्ष स्वीकार करना चाहिए, मसला देश हित का है. इस मसले पर शशि थरूर की आलोचना नहीं होनी चाहिए.

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लेखक के बारे में

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रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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