‘ऑपरेशन दोस्त’ को भुला तुर्किए, फिर कर रहा है भूकंप का सामना, क्या होगी भारत की नीति

Edited by Rajneesh Anand
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एहसान फरामोश तुर्किए का भारत में विरोध

Turkey Earthquake : तुर्किए में 2023 में एक भयंकर विनाशकारी भूकंप आया था, उस वक्त भारत ने ‘ऑपरेशन दोस्त’ चलाकर तुर्किए की मदद की थी और यह सोचा था कि उसने अपना एक मित्र बनाया है, लेकिन हुआ इसके विपरीत क्योंकि तुर्किए ने महज दो साल बाद ही भारत की पीठ में छुरा घोंप दिया और भारत के दुश्मन देश पाकिस्तान के साथ खड़ा हो गया है. हालांकि भारत और तुर्किए के संबंध मध्यकालीन युग में भी नजर आते हैं और आधुनिक युग में तो दोनों देशों के संबंध तनावपूर्ण नहीं रहे थे. तुर्किए यूरोप और एशिया के बीच एक पुल है और नाटो का एकमात्र मुस्लिम देश है.

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Turkey Earthquake : तुर्किए में 15 मई को भूकंप के झटके महसूस किए गए हैं, इसकी तीव्रता रिक्टर स्केल पर 5.1 रही. अभी तक किसी भी तरह के जान-माल की हानि की सूचना नहीं है. लेकिन इस भूकंप ने तुर्किए में आए 2023 के उस विनाशकारी भूकंप की याद दिला दी थी, जब भारत ने ऑपरेशन दोस्त के तहत तुर्किए को तत्काल सहायता भेजी थी. इस सहायता के तहत NDRF की टीमें, मेडिकल स्टाफ, डॉग स्क्वॉड, ड्रोन और राहत सामग्री भेजी दी. वर्तमान स्थिति में ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत और तुर्किए के संबंध बदल गए हैं, जो तुर्किए 2023 में हमारा दोस्त था, वह अचानक से हमारे दुश्मन के साथ खड़ा गया है और इस लिहाज से वह हमारे दुश्मनों की पंक्ति में खड़ा हो गया है.

2023 के भूकंप में भारत ने तुर्किए के लिए चलाया था ऑपरेशन दोस्त

2023 में तुर्किए में विनाशकारी भूकंप आया था, जिसकी तीव्रता रिक्टर स्केल पर 7.8 थी. यह भूकंप 6 फरवरी को दक्षिण-पूर्वी तुर्किए में आया था. इस भूकंप के कुछ ही देर बाद एक और भूकंप यहां आया, जिसकी तीव्रता 7.5 थी. इस भयंकर भूकंप में तुर्किए में 53 हजार से अधिक लोगों की मौत हुई थी और एक लाख से अधिक लोग घायल हुए थे. घर और अपार्टमेंट की भी उतनी ही मात्रा में क्षति हुई थी, जिसकी वजह से 30 लाख से अधिक लोग बेघर हुए थे. उस कठिन परिस्थिति में भारत ने तुर्किए के लिए ‘ऑपरेशन दोस्त’ चलाया था और तत्काल मानवीय सहायता पहुंचाई थी. भारत ने एनडीआरएफ की टीम भेजी थी, जिसमें 100 से अधिक सदस्य थे और उनमें खोजी दस्ता भी शामिल था. डॉग स्क्वॉड और ड्रोन की भी सहायता दी गई थी, ताकि पीड़ितों को आसानी से तलाशा जा सके और उनतक सहायता पहुंचाई जाए. भारत ने त्वरित सहायता के रूप में तुर्किए को 7 करोड़ की राशि दी थी. इसके अलावा वहां जरूरी राहत सामग्री, इलाज के लिए अस्पताल और आवश्यक चीजें भी मुहैया कराई गईं थीं. भारत ने तुर्किए को यह सहायता मानवता के नाते दिया था, जिसके बाद दोनों देशों के संबंध गहरे हुए थे और भारत को यह लगा था कि उसने तुर्किए को अपना दोस्त बना लिया है, लेकिन भारत-पाकिस्तान के बीच हालिया तनाव के दौरान तुर्किए ने पाकिस्तान का साथ देना बेहतर समझा क्योंकि वह एक इस्लामिक राष्ट्र है और उसने अहसान फरामोशी की और भारत की पीठ पर छुरा घोंपा.

Operation Dost
‘ऑपरेशन-दोस्त-को-भुला-तुर्किए

तुर्किए ने पाकिस्तान की मदद क्यों की

तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब इरदुगान की नीतियां पाकिस्तान के पक्ष में दिखती हैं. उन्होंने जिस तरह भारत-पाकिस्तान तनाव के बीच पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को अपना प्रिय भाई बताया और जिस तरह उन्होंने ड्रोन और अन्य सैन्य उपकरण पाकिस्तान को उपलब्ध कराए, वह यह साबित करते हैं कि तुर्किए का झुकाव पाकिस्तान की ओर है. बेशक तुर्किए एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र होने का दावा करता है, लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि तुर्किए की 99% आबादी मुसलमानों की है और इसी वजह से उनका झुकाव पाकिस्तान की ओर है. धार्मिक भाईचारे को निभाने के लिए तुर्किए ने ‘ऑपरेशन दोस्त’ को भुला दिया, जो उसकी मतलबपरस्ती ही कही जाएगी.

भारत में तुर्किए का बहिष्कार

तुर्किए ने ऑपरेशन सिंदूर के बाद जिस तरह पाकिस्तान का साथ दिया, उससे भारत में उसके खिलाफ माहौल बना हुआ है. निश्चित तौर पर इस स्थिति में भारत भी ‘ऑपरेशन दोस्त’ को भूलने की कोशिश कर रहा है और उसके साथ व्यापारिक और अन्य संबंध तोड़े जा रहे हैं. भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तुर्किए का विरोध किया है और BRICS की उसकी सदस्यता का विरोध किया है. इसके अलावा भारत ने सुरक्षा के लिहाज से Celebi एविशन सर्विस की सेवा को समाप्त कर दिया है. तुर्किए के साथ शैक्षणिक सहयोग को भी समाप्त कर दिया गया है और जेएनयू और जामिया मिलिया इस्लामिया ने तुर्किए से संबंद्ध सभी विश्वविद्यालयों से समझौता तोड़ दिया है. पर्यटन के क्षेत्र में भी तुर्किए का विरोध हो रहा है और भारतीय वहां अपने टूर को कैंसिल कर रहे हैं. वहां से आयात की जाने वाली चीजों जिसमें मार्बल, ड्राई फ्रूट्‌स, कालीन, फर्नीचर, सेब आदि का विरोध हो रहा है.

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लेखक के बारे में

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रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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