अहमदिया मुसलमानों को पाकिस्तानी नहीं मानते मुसलमान, खत्म करना चाहते हैं उनका अस्तित्व
अहमदिया मुसलमान
Ahmadiyya Muslim : अहमदिया मुसलमान संप्रदाय मुसलमानों का एक ऐसा वर्ग है, जिसके अस्तित्व को पाकिस्तान स्वीकार नहीं करता है, जबकि पूरे विश्व में अहमदिया मुसलमानों की सबसे ज्यादा संख्या 40-50 लाख यही हैं. पाकिस्तानी यह मानते हैं कि अहमदिया मुसलमान नहीं हैं. पाकिस्तानी मुसलमानों की नजर में अहमदिया नीच हैं और पाकिस्तान उन्हें ना तो मुसलमान कहलाने का हक देता है और ना ही उन्हें किसी भी तरह के धार्मिक कार्य करने देता है. उन्हें अपनी पहचान छिपाने पड़ती है, अन्यथा उनके साथ भेदभाव किया जाता है.
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Ahmadiyya Muslim : अहमदिया मुसलमान, मुस्लिम समाज का एक वर्ग है, जिनकी कुछ मान्याएं शिया और सुन्नी मुसलमान से अलग होती है. यही वजह है कि पाकिस्तान में इन अहमदिया मुसलमानों को मुसलमान नहीं माना जाता है और उन्हें समाज में हिकारत की नजर से देखा जाता है. यही वजह है कि पाकिस्तान में अहमदिया मुसलमान अपनी पहचान छिपाकर रहते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि अहमदिया मुसलमानों का जन्म पाकिस्तान में ही हुआ था और एक तरह से यह उनकी जन्मस्थली है. प्यू रिसर्च के अनुसार पाकिस्तान की मात्र 7% आबादी ही अहमदिया मुसलमानों को मुसलमान मानती है, आखिर क्या है इसकी वजह?
कौन हैं अहमदिया मुसलमान?
मुसलमानों में कुछ अलग-अलग वर्ग या संप्रदाय हैं, जैसे शिया- सुन्नी और सूफी. अहमदिया मुसलमान भी मुसलमानों का एक संप्रदाय है. इस संप्रदाय की शुरुआत पाकिस्तान के पंजाब प्रांत से हुई थी. रबवाह को इनका मुख्यालय माना जाता था, लेकिन अब वह इग्लैंड स्थानांतरित हो गया है. अहमदिया मुसलमान संप्रदाय का उदय 1889 में हुआ था. मिर्जा गुलाम अहमद ने इस संप्रदाया की नींव रखी थी. ऐसी मान्यता है कि मिर्जा गुलाम अहमद ने मुसलमानों के बीच काफी सुधार इस पंथ के जरिए किए थे. अहमदिया मुसलमान पाकिस्तान के अलावा भारत में भी हैं, क्योंकि बंटवारे के बाद इस संप्रदाय के कुछ लोग भारत भी आए थे और कुछ इंग्लैंड चले गए थे.
मुसलमान और अहमदिया मुसलमान में क्या है अंतर
मुसलमान और एक अहमदिया मुसलमान में बड़ा फर्क यह है कि मुसलमान पैगंबर मुहम्मद साहब को अपना अंतिम पैगंबर मानते हैं, जबकि अहमदिया मुसलमान मिर्जा गुलाम अहमद को अपना अंतिम पैगंबर मानता है. बस इसी बात को लेकर अहमदिया मुसलमानों के साथ भेदभाव होता है. पाकिस्तान में अहमदिया मुसलमानों को सरकारी तौर पर गैर मुसलमान माना जाता है. हालांकि अहमदिया मुसलमान भी उन सभी बातों का पालन करते हैं, जो एक आम मुसलमान करता है. अहमदिया मुसलमान इस्लाम के 5 मूल स्तंभों को भी पूरी तरह मानता है, जिसमें नमाज, जकात, रोजा और हज जैसे सिद्धांत शामिल हैं. बावजूद इसके अहमदिया मुसलमानों को पाकिस्तान में गैर मुस्लिम घोषित किया गया है.
पाकिस्तान में अहमदिया मुसलमान को कब कहा गया ‘गैर मुसलमान’

पाकिस्तान में एक छोटी सी घटना के बाद अहमदिया मुसलमानों के प्रति बहुसंख्यक सुन्नी मुसलमानों का गुस्सा फूट गया था और मामला इतना बढ़ा की संविधान में संशोधन कर यह बात कही गई कि जो लोग पैगंबर मुहम्मद साहब को अपना अंतिम पैगंबर नहीं मानते हैं वे गैर मुसलमान हैं. यह बात है 1974 की. इस संशोधन के बाद से अहमदिया मुसलमान पाकिस्तान में गैर मुसलमान हो गए. हालांकि 1984 में जब जनरल जिया उल हक ने अहमदिया मुसलमानों के लिए बिल लाया और उन्हें गैर मुसलमान बताते हुए उनके धार्मिक कार्यों पर रोक लगाई तो अहमदिया मुसलमानों की दशा पाकिस्तान में और भी खराब हो गई. इस बिल के बाद पाकिस्तान में अहमदिया मुसलमान अपने मस्जिद को मस्जिद नहीं कह पाते हैं और ना ही वे अजान दे पाते हैं और ना ही कोई अन्य धार्मिक कार्य कर पाते हैं. अहमदिया मुसलमानों के हज करने पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया, जिसका मानवाधिकार संगठनों ने विरोध किया, लेकिन सच्चाई यह है कि अहमदिया मुसलमान पाकिस्तान में सामााजिक और धार्मिक रूप से पिछड़े हैं.
भारत में अहमदिया मुसलमानों की स्थिति
भारत में अहमदिया मुसलमानों की स्थिति वैसी ही है जैसी किसी अन्य धर्म के मानने वालों की है. हमारा देश धर्म के आधार पर नागरिकों के बीच धार्मिक भेदभाव नहीं करता है, इसलिए अहमदिया मुसलमान भारत में सम्मान से जीते हैं. उन्हें अपने सभी धार्मिक कार्यों को करने की आजादी है और उन्हें अपनी पहचान छिपाने की कोई जरूरत नहीं पड़ती है. कुछ धार्मिक संगठन उनका विरोध करते हैं, लेकिन देश का कानून उन्हें रोकता है. हां, सामाजिक जीवन में कुछ चुनौतियां हो सकती हैं, लेकिन उनके अपने इबादतगाह, मस्जिद आदि मौजूद हैं, जिसकी वजह से उन्हें कोई दिक्कत नहीं होती है.
अहमदिया मुसलमानों की नजर में इस्लाम
अहमदिया मुसलमान कट्टरपंथ का विरोध करता है. इस पंथ के जनक मिर्जा गुलाम अहमद ने धर्म प्रचार के लिए शांति के मार्ग को चुना. गुलाम अहमद ने शांतिपूर्ण जिहाद की बात की. वे यह मानते थे कि हिंसा से कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है, इसलिए उन्होंने शांति की बात की. अहमदिया मुसलमानों ने स्त्री शिक्षा पर भी जोर दिया और लड़कियों की शिक्षा पर फोकस किया गया. अहमदिया मुसलमान भी पर्दा प्रथा को स्वीकार करते हैं, लेकिन वे इसे महिलाओं की शिक्षा में बाधा कहीं से नहीं मानते हैं.
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By Rajneesh Anand
रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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