क्या किसी रेप सर्वाइवर को हमेशा सहमा हुआ, रोता हुआ, बिखरा हुआ और टूटा हुआ ही दिखना चाहिए? क्या उसकी मुस्कान, उसका सामान्य व्यवहार या जिंदगी में आगे बढ़ने की कोशिश इस बात का सबूत हो सकती है कि उसके साथ कुछ हुआ ही नहीं?यौन हिंसा के मामलों में समाज अक्सर पीड़ितों से एक तय तरह के व्यवहार की उम्मीद करता है. माना जाता है कि एक सर्वाइवर को हमेशा दुखी, डरा हुआ या टूटे हुए रूप में दिखना चाहिए.लेकिन क्या किसी रेप सर्वाइवर की ये जिम्मेदारी है कि वह समाज की तय की हुई पीड़ित की छवि के अनुसार व्यवहार करे? वह कितना रोए, कितने समय तक दुख में रहे या कब अपनी जिंदगी को दोबारा सामान्य करने की कोशिश करे? क्या इसका कोई पैमाना हो सकता है? यह सवाल हाल ही में बॉम्बे हाई कोर्ट की गोवा पीठ के एक अहम फैसले के बाद फिर चर्चा में है.तरुण तेजपाल केस में परफेक्ट विक्टिम की बात क्यों उठी?मामला 2013 का है. तरुण तेजपाल पर उनकी एक जूनियर महिला सहकर्मी ने गोवा के एक होटल की लिफ्ट में यौन हमले का आरोप लगाया था.महिला ने घटना के बाद अपने कुछ सहयोगियों को इसकी जानकारी दी और बाद में औपचारिक शिकायत की.2021 में गोवा की सेशन कोर्ट ने तेजपाल को सभी आरोपों से बरी कर दिया था. इस फैसले में पीड़िता के घटना के बाद के व्यवहार और उसके व्यक्तिगत जीवन से जुड़े कई पहलुओं को भी महत्व दिया गया.मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट की गोवा पीठ ने अब इस फैसले को पलटते हुए तेजपाल को दोषी ठहराया और 10 साल की कठोर कैद की सजा सुनाई.लेकिन इस फैसले का एक महत्वपूर्ण हिस्सा सिर्फ सजा नहीं है. हाई कोर्ट ने उस सोच पर भी सवाल उठाया जिसमें किसी यौन हिंसा की पीड़ित के व्यवहार को एक तय मापदंड से परखा जाता है.क्या होता है परफेक्ट विक्टिम मिथयौन अपराधों के मामलों में अक्सर पीड़िता के व्यवहार को लेकर समाज में कुछ तय धारणाएं बनी हुई हैं. कई लोग मानते हैं कि अगर किसी व्यक्ति के साथ गंभीर यौन हिंसा हुई है, तो उसकी प्रतिक्रिया भी एक खास तरह की होनी चाहिए. यही सोच परफेक्ट विक्टिम मिथ यानी कि आदर्श पीड़िता की धारणा को जन्म देती है. इस धारणा के मुताबिक एक परफेक्ट विक्टिम कोहमेशा दुखी और परेशान दिखना चाहिए.घटना के तुरंत बाद विरोध करना चाहिए.हर समय डर या सदमे में रहना चाहिए.काम और सामाजिक जीवन से दूर हो जाना चाहिए.लेकिन विशेषज्ञों और अदालतों ने कई बार यह स्पष्ट किया है कि वास्तविक जीवन में ऐसा कोई तय पैटर्न नहीं होता.हालांकि जानकारों का मानना है कि हर व्यक्ति अपने साथ हुए आघात को अलग तरीके से महसूस करता है और उससे निपटने का उसका तरीका भी अलग होता है. कोई व्यक्ति तुरंत मदद मांग सकता है, कोई लंबे समय तक चुप रह सकता है और कोई व्यक्ति बाहर से सामान्य दिखते हुए भी अंदर से गहरे मानसिक संघर्ष से गुजर रहा हो सकता है. यानी सामान्य दिखना और अंदर से सामान्य होना एक ही बात नहीं है.ये भी पढ़ें : क्या किसी की पर्सनल डिटेल्स लीक करना क्राइम है? जानिए क्या होती है डॉक्सिंगहर विक्टिम की रिस्पॉन्स अलग क्यों होती है?किसी भी बड़े सदमे के बाद हर इंसान एक जैसा व्यवहार नहीं करता. रेप या यौन हिंसा जैसी घटना के बाद भी ऐसा ही होता है. मनोविज्ञान में इसे ट्रॉमा रिस्पॉन्स (Trauma Response) कहा जाता है. यानी, दिमाग और शरीर सदमे से निपटने के लिए अलग-अलग तरीके अपनाते हैं.फ्रीज रिस्पॉन्स (Freeze Response)कई बार डर इतना ज्यादा होता है कि व्यक्ति कुछ भी नहीं कर पाता. वह चुप हो जाता है, विरोध नहीं कर पाता या घटना के बारे में तुरंत किसी को नहीं बता पाता. इसका मतलब यह नहीं है कि उसके साथ कुछ हुआ ही नहीं. यह डर और सदमे की एक सामान्य मानसिक प्रतिक्रिया हो सकती है.फॉन रिस्पॉन्स (Fawn Response)कुछ लोग खुद को सुरक्षित रखने के लिए सामने वाले से बहस या टकराव नहीं करते. वे सामान्य व्यवहार करने की कोशिश करते हैं ताकि हालात और खराब न हों. ऐसा करना भी कई बार डर और खुद को बचाने की कोशिश का हिस्सा होता है.सामान्य दिखना भी सामान्य हैकई सर्वाइवर घटना के बाद भी ऑफिस जाते हैं, पढ़ाई करते हैं, दोस्तों से मिलते हैं या अपनी रोज़मर्रा की जिंदगी जारी रखते हैं. इसका मतलब यह नहीं कि वे दर्द में नहीं हैं. कई लोगों के लिए सामान्य दिनचर्या बनाए रखना ही उस सदमे से बाहर निकलने का तरीका होता है. यही वजह है कि सिर्फ इस आधार पर किसी की बात पर शक नहीं किया जा सकता कि वह पीड़ित जैसा व्यवहार नहीं कर रहा.किसी सर्वाइवर के चेहरे के भाव, उसकी मुस्कान, उसके कपड़े, उसके काम पर लौटने या सामान्य दिखने से यह तय नहीं किया जा सकता कि उसके साथ क्या हुआ था. ट्रॉमा का कोई एक चेहरा नहीं होता और न ही हर पीड़ित की प्रतिक्रिया एक जैसी होती है.यही सवाल तेजपाल केस में भी सामने आयातरुण तेजपाल मामले में भी सर्वाइवर के घटना के बाद के व्यवहार को लेकर सवाल उठाए गए थे.ट्रायल कोर्ट ने उसके व्यवहार, उसके सामान्य दिखने, तस्वीरों में नजर आने, सामाजिक परिस्थितियों में मौजूद रहने और अन्य व्यक्तिगत पहलुओं को देखा था.उसके घटना के बाद के व्यवहार को इस नजरिए से भी देखा गया कि क्या वह उस तरह व्यवहार कर रही थी जैसा एक यौन हिंसा की पीड़िता से अपेक्षित माना जाता है.यही वह दृष्टिकोण था जिस पर हाई कोर्ट ने आपत्ति जताई.हाई कोर्ट ने कहा कि किसी महिला के सामान्य दिखने, काम करने, लोगों से मिलने या अपनी जिंदगी जारी रखने की कोशिश को इस आधार पर उसके खिलाफ नहीं पढ़ा जा सकता कि वह सच्ची पीड़िता जैसी नहीं दिख रही थी.ये भी पढ़ें : क्या भारत में गाली देने पर हो सकती है जेल? नोएडा में दर्ज केस के बहाने समझिए पूरा कानूनहाई कोर्ट ने निचली अदालत की सोच में क्या गलत पाया?बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा कि रेप या यौन उत्पीड़न की शिकार महिला को सिर्फ उसके व्यवहार से नहीं परखा जा सकता. अगर कोई महिला घटना के बाद सामान्य दिख रही है, काम पर जा रही है या लोगों से मिल रही है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि उसके साथ कुछ हुआ ही नहीं.हर पीड़िता का दर्द अलग होता हैकोर्ट ने कहा कि हर इंसान सदमे को अलग-अलग तरीके से झेलता है. कोई बहुत रोता है, कोई चुप हो जाता है और कोई जल्दी सामान्य जिंदगी जीने की कोशिश करता है. इसलिए किसी एक तरह के व्यवहार की उम्मीद नहीं की जा सकती.फैसला भावनाओं से नहीं, सबूतों से होगाकोर्ट ने साफ कहा कि किसी मामले का फैसला इस आधार पर नहीं हो सकता कि पीड़िता कैसी दिख रही थी या कैसे व्यवहार कर रही थी. अदालत को सिर्फ गवाही, सबूत और मामले के तथ्यों को देखकर फैसला करना चाहिए.महिला के निजी जीवन से उसकी बात गलत साबित नहीं होतीकोर्ट ने यह भी कहा कि किसी महिला के पुराने रिश्ते, उसकी जीवनशैली या उसका निजी जीवन यह तय नहीं करते कि वह सच बोल रही है या झूठ. इन बातों के आधार पर उसकी शिकायत को कमजोर नहीं किया जा सकता.हाई कोर्ट ने किन सबूतों को अहम माना?हाई कोर्ट ने सर्वाइवर की गवाही के साथ-साथ मामले में मौजूद दूसरे सबूतों और गवाहों को भी देखा.सर्वाइवर की गवाहीहाई कोर्ट ने कहा कि लंबी और कठिन जिरह के बावजूद सर्वाइवर अपनी बात पर कायम रही.घटना के बाद की जानकारीसर्वाइवर ने घटना के बाद अपने कुछ सहयोगियों को इसकी जानकारी दी थी. हाई कोर्ट ने इन गवाहियों को भी महत्वपूर्ण माना.दूसरे गवाहकोर्ट के अनुसार कई गवाहों ने उसकी बातों की पुष्टि की. उसकी मां और बाद में उसके पति बने व्यक्ति सहित कुल सात गवाहों की गवाही को हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण माना.CCTV फुटेजहोटल की CCTV रिकॉर्डिंग लिफ्ट के अंदर की नहीं थी, लेकिन इससे यह पता चलता था कि तेजपाल और महिला संबंधित समय पर लिफ्ट में गए और बाहर आए.माफी वाले ईमेलतेजपाल की ओर से भेजे गए दो माफी वाले ईमेल भी मामले में महत्वपूर्ण रहे. ट्रायल कोर्ट ने इन ईमेल को दबाव में लिखे जाने की बात मानी थी, लेकिन हाई कोर्ट ने कहा कि उन्हें जबरन लिखवाए जाने का पर्याप्त सबूत नहीं था.तो इस फैसले का मतलब क्या है?तरुण तेजपाल केस में हाई कोर्ट की Perfect Victim पर टिप्पणी एक बड़ा सवाल उठाती है, क्या न्याय पाने के लिए किसी सर्वाइवर को समाज की बनाई ‘आदर्श पीड़िता’ की छवि में फिट होना जरूरी है?हाई कोर्ट का जवाब साफ है कि नहीं, किसी महिला का सामान्य दिखना, मुस्कुराना, काम पर लौटना या लोगों से मिलना यह साबित नहीं करता कि उसके साथ यौन हिंसा नहीं हुई.इस मामले में फैसला गवाही, सबूत और मामले के तथ्यों के आधार पर होना चाहिए.क्योंकि हर सर्वाइवर का trauma अलग होता है और सच्ची पीड़िता दिखने का कोई एक तय चेहरा नहीं होता.पढ़िए देश दुनिया और बिहार झारखंड की ओरिजिनल खबर