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मेरी प्यारी रांची तब और अब : दरिद्र होते हुए भी उनके पास सरलता, प्रेम और विश्वास था

Updated at : 29 Apr 2015 5:12 AM (IST)
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मेरी प्यारी रांची तब और अब : दरिद्र होते हुए भी उनके पास सरलता, प्रेम और विश्वास था

स्वामी शशांकानंद बाद में खादी ग्रामोद्योग रांची से मुङो और भी विशेष ज्ञान मिला तथा लगभग तीन वर्ष प्रशिक्षणार्थियों को मैं स्वयं प्रशिक्षण देता रहा. श्री गनौरीराम वीएलडब्ल्यू ने शस्यविज्ञान में मुङो बहुत कुछ सिखाया. अवकाश प्राप्त डायरेक्टर (एग्रिकल्चर) डॉ प्रसाद का आभारी हूं, जो सब समय एक्सटेंशन प्रोग्राम में साथ-साथ रह कर मेरा ज्ञानवर्धन […]

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स्वामी शशांकानंद

बाद में खादी ग्रामोद्योग रांची से मुङो और भी विशेष ज्ञान मिला तथा लगभग तीन वर्ष प्रशिक्षणार्थियों को मैं स्वयं प्रशिक्षण देता रहा. श्री गनौरीराम वीएलडब्ल्यू ने शस्यविज्ञान में मुङो बहुत कुछ सिखाया. अवकाश प्राप्त डायरेक्टर (एग्रिकल्चर) डॉ प्रसाद का आभारी हूं, जो सब समय एक्सटेंशन प्रोग्राम में साथ-साथ रह कर मेरा ज्ञानवर्धन करते रहे. संगीत शिक्षक श्री दुख हरन नायक से संगीत विद्या में नये दिव्यायन के भजन भी सीखे.

तत्कालीन सचिव महाराज की गांव के उत्थान के प्रति सोच, उत्साह और अद्भुत ऊर्जा मेरे लिए प्रेरणा का स्नेत बना. पूज्य स्वामी वागीशनंदजी महाराज (पहले सह-सचिव, बाद में सचिव) के सरल स्वभाव से मुङो भक्तों और वेतन भुक्त कार्यकर्ताओं को अपना कैसे बना सकते हैं, सीखने को मिला.

गांवों की तत्कालीन परिस्थिति : वर्षा पर निर्भर खेती और खाद का भी अधिक ज्ञान नहीं. आलस्य, बेपरवाही और हड़िया का आकर्षण. गांवों-गांवों में जाकर हाट में माइक लगा कर प्रचार करना, नये ढंग की खेती के बारे में चर्चा, रात्रि पाठशाला तथा प्रशिक्षण के बाद उन्हें बैंक से जोड़ कर ऋण की व्यवस्था, फसल कटाई, बिक्री कराना सब कार्य आहूति के रूप में देते हुए यज्ञ चलता रहा.

शिक्षा का स्तर बहुत ही भिन्न था. निरक्षरता व्याप्त थी. प्रशिक्षण के लिए युवकों को पकड़-पकड़ कर लाता, वे भाग जाते तो फिर उन्हें गांव से पुन: ले जाता. बैंक से ऋण पर पोल्ट्री खुलवाता, तो मुर्गी खा-पीकर कहता मर गयी. फसल लगाता, तो खेत की तैयारी से लेकर बोवाई, निराई, गुड़ाई, सिंचाई तथा कटाई एवं बिक्री करके बैंक का पैसा लौटाने तक का कार्य दिव्यायन के विस्तार कार्य करनेवाली संस्था, ‘रामकृष्ण सेवा समिति’ की सक्रिय उपस्थिति में होता था.

साक्षरता लाने के लिए रात्रि पाठशालाएं, बच्चों के लिए प्रतिदिन दूध और अंडे की व्यवस्था तथा उनकी स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता, शारीरिक, वस्त्र तथा वास स्थान की सफाई संबंधी कार्यक्रम स्थानीय प्राक प्रशिक्षणार्थियों द्वारा संपन्न होता था. प्रशिक्षणार्थियों में कोई बिरले ही दसवीं पास आते थे. अधिकांश क्लास चार या पांच. संक्षिप्त में कहें तो जैसी गरज हमारी है, गांववासी हमें धन्य कर दे रहे हैं सेवा लेकर. अटपटी लगने पर भी बात तो ठीक ही थी.

स्वामी विवेकानंद जी का कथन है, ‘यदि पर्वत मोहम्मद के पास नहीं आ सकता, तो मोहम्मद को पर्वत के पास जाना चाहिए. ग्रामवासी में रजस उत्पन्न करना हमारा कार्य था, उन्हें अपनी स्थिति का आभास तक नहीं था, उसे जगाने का कार्य तो हमें करना था. उसके भीतर तो अनंत शक्ति और संभावनाएं हैं, उसे अनुभव कराना था. प्रशिक्षण काल में प्रतिदिन झंडा फहरा कर उनसे नारा लगवाया जाता है, ‘आलस छोड़ो मेहनत करो, सबके लिए हम सब, हम सभी एक हैं, भारत माता की जय’.

दरिद्र होते हुए भी उनके पास सरलता, प्रेम और विश्वास था. हमें उन्होंने अपने प्यार से जीता और हमने उनमें अपने ईश्वर को खोजने का प्रयत्न किया. प्रशिक्षण के बाद अपनी जागृति और बल का अनुभव करते हुए युवकों ने अपने-अपने गावों में विवेकानंद सेवा संघ बना कर विकास का दायित्व लिया. पक्की सड़कें नहीं थीं, कच्चे रास्ते, पगडंडियों से जाना पड़ता था. कभी-कभी तो जीप को खेतों में जाना पड़ता था. तैरना नहीं आता था, फिर भी साहस कर नदी पार करके गांवों का सेवा कार्य अपने में एक अनोखा अनुभव था. बोड़ेया ग्राम तो जीप को भी नदी से होकर ही जाना पड़ता था.

प्रशिक्षण के बाद प्रशिक्षणार्थियों के घर जाकर कार्य करने के लिए प्रेरित करने पर जब वे कार्य में जुट जाते कुआं खोदते, सिंचाई के साधन बनाते, खेती करते तो बहुत साहस हमें मिलता. दृश्य-श्रव्य यूनिट सिनेमा दिखाती, जिसमें ग्राम विकास की प्रेरणा तथा खेतीबाड़ी का ज्ञान मिलता था. उत्साह बढ़ने पर हमारे प्रयास से रांची में पहली बार गेहूं की खेती आरंभ हुई, तो गांववालों ने पूरे खूंटी के गुटजोड़ा गांव में गेहूं से खेत भर दिये. ठाकुरगांव सब्जी की खेती में आगे बढ़ने लगा.

बेरो जरिया ने आलू की खेती बढ़ा दी, जिसे देखने तत्कालीन त्रिपुरा के मुख्यमंत्री श्री सेनगुप्ता चले गये. दिव्यायन के कार्यो को देखने कई सांसद आये.श्री आदित्य एन शुक्ला पूर्व सह महानिदेशक आइसीएआर दिल्ली ने दिव्यायन के एक सौविनीअर में अपने लेख में उल्लेख किया कि एजुकेशन कमीशन(1964-66) की अनुशंसा पर कृषि एवं पशु-पालन, बागवानी आदि क्षेत्रों में प्रशिक्षण के लिए एग्रीकल्चर पॉलिटेक्निक खुलने चाहिए. आइसीएआर (भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद) ने कृषि विज्ञान केंद्र खोलने का निर्णय लिया और सन 1973 ई में उसकी रूपरेखा बनाने के लिए डॉ एमएस मेहता की अध्यक्षता में एक कमेटी भी बनायी.

यह कमेटी दिव्यायन का अध्ययन करने भी आयी थी और उससे काफी प्रभावित हुई. 1977 में पोंडिचेरी के बाद सात कृषि विज्ञान केंद्र खुले, जिसमें दिव्यायन भी चुना गया. दिव्यायन की चल रही गतिविधियों में यह कुछ नया नहीं लगा, केवल नाम ही बदलता नजर आया, क्योंकि कृषि विज्ञान केंद्र के अनुरूप कार्य पहले से ही चल रहे थे. (जारी)

(स्वामी शशांकानंद लगभग साढ़े तीन वर्ष 1971 से 1974 तक रामकृष्ण मिशन आश्रम मोरहाबादी में कार्यरत रहे और साढ़े 17 वर्ष 1997 से 2014 सितंबर तक आश्रम के सचिव के पद पर रहे. अब सर्व पदों एवं दायित्वों से मुक्त पठन, लेखन एवं प्रवचनादि हेतु भ्रमण करते हुए इस समय मुख्यत: देहरादून आश्रम में रह रहे हैं.)

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