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प्रकृति के साथ छेड़छाड़ हो बंद

Updated at : 28 Apr 2015 7:24 AM (IST)
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प्रकृति के साथ छेड़छाड़ हो बंद

नेपाल के भूकंप से सबक सीखने की जरूरत सुशील कुमार भूवैज्ञानिक नेपाल में आये भूकंप से हुए नुकसान का अभी पूर्ण आकलन नहीं किया जा सकता है. लेकिन रिक्टर पैमाने पर इसकी तीव्रता को देखते हुए कहा जा सकता है कि यह काफी गंभीर था. वैसे भूकंप आने की प्रक्रिया स्वाभाविक है. जमीन के भीतर […]

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नेपाल के भूकंप से सबक सीखने की जरूरत
सुशील कुमार
भूवैज्ञानिक
नेपाल में आये भूकंप से हुए नुकसान का अभी पूर्ण आकलन नहीं किया जा सकता है. लेकिन रिक्टर पैमाने पर इसकी तीव्रता को देखते हुए कहा जा सकता है कि यह काफी गंभीर था. वैसे भूकंप आने की प्रक्रिया स्वाभाविक है. जमीन के भीतर से ऊर्जा के निकलने की यह स्वाभाविक प्रक्रिया है.
पहले भी भूकंप आते रहे हैं, लेकिन अब जागरूकता के कारण इसको ज्यादा प्रचार-प्रसार मिलता है. बड़े पैमाने पर भूकंप आने के बाद इसके झटके लगभग एक महीने तक महसूस किये जा सकते हैं. यह सही है कि प्रकृति के साथ छेड़-छाड़ के कारण प्राकृतिक आपदाओं में वृद्धि हुई है. लेकिन मेरा मानना है कि यह एक कारण हो सकता है. प्राकृतिक आपदाओं के आने के अन्य दूसरे कारण भी हैं.
एक बात सही है कि अब पहले के मुकाबले नुकसान ज्यादा हो रहा है. गौर करनेवाली बात यह है कि हिमायली क्षेत्र काफी संवदेनशील है. यहां पेड़ों की कटाई या कंक्रीट के निर्माण के खतरे अन्य क्षेत्रों के मुकाबले काफी अधिक हैं. हिमालयी क्षेत्रों की संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए विकास कम करने की जरूरत है.
केदारनाथ में आयी त्रसदी ने इसे पुष्ट किया है. हिमालयी क्षेत्रों में विकास परंपरागत तरीके से किया जाना चाहिए. पहले पहाड़ी इलाकों में परंपरागत तरीके से मकानों का निर्माण होता था, अब कंक्रीट का अधिक इस्तेमाल होने लगा है. कंक्रीट के इस्तेमाल से भूकंप आने की हालत में अधिक नुकसान का खतरा रहता है. वैसे भी हिमालय के क्षेत्र भूकंप के लिहाज के काफी संवेदनशील माने जाते हैं. दूसरा पेड़ों की बढ़ती कटाई से भूस्खलन का खतरा अधिक रहता है.
देखा गया है कि विकास के नाम पर नदियों पर बांध और पन बिजली परियोजनाओं की संख्या काफी बढ़ी है. इसके निर्माण में बड़े पैमाने पर डायनामाइट का प्रयोग किया जाता है. डायनामाइट के प्रयोग से पहाड़ों को नुकसान पहुंचता है. प्रकृति के संतुलन से छेड़-छाड़ करने के कारण बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि देखने में आ रही है. निश्चित तौर पर प्राकृतिक आपदाओं के लिए विकास की मौजूदा गतिविधियां जिम्मेवार हैं. लेकिन बढ़ती जागरूकता के कारण ये समस्याएं गंभीर दिखती हैं. मेरा मानना है कि हिमालयी क्षेत्रों में विकास के लिए एक अलग नीति बनाने की जरूरत है, क्योंकि यह इलाका प्रकृति के लिहाज से काफी संवेदनशील है. सरकारों ने भी इस ओर ध्यान दिया है.
देखा जाये तो भूकंप के मामले में नेपाल पहले से ही संवेदनशीन है, क्योंकि नेपाल दो टेक्टॉनिक्स प्लेट्स के बीच में स्थित है. जिसमें एक प्लेट एवरेस्ट की है कि जबकि दूसरी हिमालय पर्वत श्रृंखला की है.
नेपाल में भूकंप के झटके कई बार पहले भी आ चुके हैं, लेकिन इस बार आया भूकंप सबसे भयावह है. इससे नेपाल में जान-माल का भारी नुकसान भी हुआ है. ये भूकंप नेपाल के इतिहास का दूसरा सबसे बड़ा भूकंप है. भूकंप की तीव्रता है 7.9 थी और ये हिरोशिमा पर किये गये परमाणु हमले से भी ज्यादा तबाही फैलाने वाला था. ये भूकंप 20 थर्मोन्यूक्लीयर हाईड्रोजन बम के बराबर था. विकास के नाम पर हिमालयी क्षेत्र में जिस तरह की मनमानी की गयी, नेपाल का भूकंप शायद उसी का नतीजा है. ये प्रकृति की तरफ से इस बात की चेतावनी भी है कि बहुत हो चुका अब धरती और पर्यावरण को और अधिक नुकसान न पहुंचाया जाये.
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