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रहिमन निज मन की व्यथा..

Updated at : 24 Apr 2015 5:58 AM (IST)
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रहिमन निज मन की व्यथा..

जस्टिस विक्रमादित्य प्रसाद एक बार मेरे मन की बात सुनते ही मेरी धर्मपत्नी ने ऐसा काली-कपालिनी विराट रूप दिखाया कि मेरे होश उड़ गये. अब मैं दुर्योधन जैसा दु:साहसी तो नहीं की कृष्ण के विराट रूप के दर्शन के बाद भी महाभारत के युद्ध को न्यौत आऊं और मृत्यु का वरण करूं. सो उस दिन […]

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जस्टिस विक्रमादित्य प्रसाद

एक बार मेरे मन की बात सुनते ही मेरी धर्मपत्नी ने ऐसा काली-कपालिनी विराट रूप दिखाया कि मेरे होश उड़ गये. अब मैं दुर्योधन जैसा दु:साहसी तो नहीं की कृष्ण के विराट रूप के दर्शन के बाद भी महाभारत के युद्ध को न्यौत आऊं और मृत्यु का वरण करूं. सो उस दिन के बाद से मैं उन्हें ही नहीं किसी से भी अपने मन की बात नहीं कहता.

कहीं कोई दु:ख होता है, कहीं खुशी होती है तो मन में धुक-धुकी होने लगती है तो मन बातें करने लगता है. उसकी बातें सुनना मना नहीं है लेकिन उसे दूसरे को बताना बहुत महंगा पड़ता है, जैसे मेरे साथ हुआ. रहीम कवि को भी ऐसा ही अनुभव हुआ होगा, तभी तो उन्होंने राय दी- ‘‘रहिमन मन की व्यथा, मन ही राखो गोय’’ मन की बात जब जुबान पर आती है तो कपाल का हाल भी उन्होंने ही लगे हाथों बता दिया, ‘‘रहिमन जिह्वा बावरी कही गई सरग पताल, आप तो कही भीतर गई जूतो खात कपाल’’ लेकिन मुङो लगता है कि उस महान कवि की इतनी बड़ी चेतावनी के बाद भी इन दिनों मन की बात सुनाने से लोग-बाग बाज नहीं आ रहे. मोदी जी का मन जब जीत से खिलखिला रहा था, तब उन्होंने देश भर के छात्रों से मन की बात कह डाली और सारी दुनिया को इशारों में बता दिया की 2024 तक प्रधानमंत्री की गद्दी खाली नहीं है. जब भूमि अधिग्रहण बिल राज्यसभा में लटक गया तो किसानों से अपने मन की बात कहकर उन्होंने अपना दु:ख कुछ हल्का कर लिया.

किसान तो अपने मन की बात अपने मन में गोय बैठा है, लेकिन फिलहाल उनकी व्यथा के पॉलिस से पूरा विपक्ष अपना जूता चमकाने में लगा है. ग्रहण है ही बड़ा खराब शब्द, जिस चीज को लगा वह गया काम से. मोदी जी अगर भूमि अधिग्रहण से ‘ग्रहण’ शब्द को हटा दें तो शायद विपक्षी ग्रहों की बुरी नजर से बिल का मोचन हो जाय.

इधर राहुल जी भी आत्ममंथन करने यानी मन की आवाज सुनने अज्ञातवास में चले गये. वैसे भी देश की राजनीति में आत्मा की आवाज सुनने की परंपरा पुरानी है. मैंने गूगल बाबा को छान मारा, पर वे भी यह आंकड़ा नहीं दे पाये की देश के कितने प्रतिशत लोगों के पास आत्मा है, कितने प्रतिशत आत्माओं की मृत्यु हो चुकी है और कितने प्रतिशत आत्मायें मरणासन्न हैं. फिर भी आत्मा की आवाज सुनने का फैशन तेजी पर है.

सिद्धार्थ ने मन की बात सुनी तो बुद्ध हो गये, अब देश को राहुल जी का दूसरे बुद्ध के रुप में अवतरित होने का इंतजार है. एक सज्जन ने पूछा कि क्या मन की बात सुनने के लिए अज्ञातवास जरूरी है? बताइये तो मोदी जी मन की बात कब सुन लेते हैं. मैंने कहा, उनकी लंबी-लंबी हवाई यात्राओं का निहितार्थ तो आपको समझना चाहिए. हवा में उड़ते समय मन की बात जरा साफ सुनाई पड़ती है. अब इस बीच राहुल जी का अता-पता जानने को उत्सुक हितैषियों ने यदि उन्हें खोज निकालने वालों को इनाम देने का होर्डिंग-इश्तेहार निकाला तो कुछ लोगों को नाराजगी हुई.

मेरे विचार से नाराजगी जायज नहीं है- अगर देश के नेता ऊपरी मन से जनता-जनार्दन की खोज-खबर रखते हैं तो क्या जनता को उनकी खोज-खबर रखने का अधिकार नहीं होना चाहिए, वैसे अगर कोई बुद्धत्व प्राप्त करने में लीन है तो उसकी साधना में खलल डालना ठीक नहीं. मन की बात सुनकर ही बेचारे नीतीश जी ने सिंहासन छोड़ दिया था और मांझी जी को उस पर यह सोचकर बिठा दिया की गया (बोधगया) के इस आदमी में कुछ-न-कुछ बुद्धत्व तो होगा ही, कुछ-न-कुछ वीतराग तो उसमें होगा ही, लेकिन मांझी जी जब उनकी खड़ाऊँ की पूजा छोड़ उसे पहनकर खटर-खटर चलने और अटर-पटर बकने लगे तो नीतीश जी ने अपने मन की बात फिर सुनी और अपनी खड़ाऊं छीन ली. मांझी जी ने अब अपनी पार्टी बना ली और अपने मन की कह दी- यह पार्टी ‘आप’ पार्टी की भी ‘बाप’ होगी.

सदा-सदा का टूअर-टापर आम आदमी जो पंजा बाबू, कमल बाबू, तीर बाबू, साइकिल बाबू, लालटेन बाबू जैसे कितने बापों को ङोल चुका है और अब झाड़ू बाबू को ही अपना असली बाप मानने लगा है, चीख पड़ा ‘‘बाप रे बाप, एक और बाप’’. आम आदमी की यह चीख केजरीवाल जी के डी टॉक्सीफाइड मन ने शायद अभी नहीं सुनी, क्योंकि फिलहाल वे तो अपनी पार्टी की साफ-सफाई में जुटे हैं, धकिया-धकिया कर गंदगी बाहर निकाल रहे हैं अगर झाड़ू मार-मार कर निकालते तो अभूतपूर्व धमाल होता. महिलायें और भी इंपावर्ड हो जातीं कि उनके अमोघ अस्त्र का राजनैतिक उपयोग हुआ.

आम आदमी पार्टी का ट्रेडमार्क ‘झाड़ू’ और भी सार्थक हो उठता और गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रेकार्ड में केजरीवाल जी का नाम स्वर्णाक्षरों से लिखा जाता. केजरीवाल जी अभी भी वक्त है झाड़ू का व्यावहारिक उपयोग करने का. गंदगी झाड़ू से जाती है, धकियाने से नहीं. खैर, उन्हें सफाई अभियान से जब फुर्सत मिलेगी, तब वे अपने मन की बात सुनेंगे. उनके मन की बात हम भी आकाशवाणी से सुनेंगे- प्रतीक्षा कीजिये.

लेखक झारखंड उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त जज हैं.

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