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कई अर्थो में महत्वपूर्ण होगी ओबामा की भारत यात्रा

Updated at : 04 Jan 2015 8:45 AM (IST)
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कई अर्थो में महत्वपूर्ण होगी ओबामा की भारत यात्रा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में भारत की भूमिका को व्यापक करना एक बड़ी प्राथमिकता है. ऐसे में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की आगामी गणतंत्र दिवस के मौके पर भारत यात्र एक महत्वपूर्ण परिघटना है, जिसका असर परस्पर संबंधों के अलावा दक्षिण एशिया समेत अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक परिदृश्य पर पड़ना स्वाभाविक है. […]

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में भारत की भूमिका को व्यापक करना एक बड़ी प्राथमिकता है. ऐसे में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की आगामी गणतंत्र दिवस के मौके पर भारत यात्र एक महत्वपूर्ण परिघटना है, जिसका असर परस्पर संबंधों के अलावा दक्षिण एशिया समेत अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक परिदृश्य पर पड़ना स्वाभाविक है. प्रस्तुत है इस दौरे के विविध आयामों पर एक विश्लेषण आज के विशेष में..

गणतंत्र दिवस के मौके पर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के भारत दौरे की काफी अहमियत है. पहली बार गणतंत्र दिवस के अवसर पर अमेरिका के राष्ट्रपति भारत आ रहे हैं. भारत और अमेरिका के बीच जो 1974 से लेकर 2008 तक करीब 34 वर्षो का तनाव रहा है, उसके बाद एक नया अध्याय शुरू हो रहा है. यह अध्याय आपसी विश्वास और एक-दूसरे के साथ खड़ा होने का है. ओबामा की भारत यात्र और अमेरिका-भारत संबंध पर नजर डालने से पहले इन 34 वर्षो में अमेरिका और भारत के रिश्ते को भी देखना जरूरी है. पहला न्यूक्लियर विस्फोट के समय से ही भारत के साथ अमेरिका का रिश्ता मनमुटाव वाला रहा है. कई तरह के प्रतिबंधों के बाद बीते वर्षो में भारत और अमेरिका के रिश्तों पर जमी बर्फ पिघलनी शुरू हुई है. अमेरिका को भी लग रहा है कि भारत के हितों को वह बहुत दिनों तक नजरअंदाज नहीं कर सकता है. चूंकि ओबामा भारत आ रहे हैं, इसलिए हमें यह देखना पड़ेगा कि आखिर भारत को इससे क्या फायदा मिलेगा, वह फायदा चाहे राजनीतिक हो या सामरिक या फिर आर्थिक या वैश्विक .

ऐसा भी नहीं है कि भारत और अमेरिका के बीच मतभेद कम हैं. भारत का अमेरिका के साथ कई मुद्दों पर मतभेद है. चाहे वह पाकिस्तान का मामला हो या आतंकवाद या ईरान का. पाकिस्तान के साथ तनाव और पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद को लेकर भी अमेरिका और भारत के रिश्तों में तनाव रहा है, परंतु विश्व में जो नया ढांचा बन रहा है, उसमें भारत के लिए जरूरी है कि जितने भी शक्तिशाली देश हैं, उनसे संबंध बेहतर बनाया जाये. विकसित देशों से हमारे आपसी रिश्ते मजबूत होने चाहिए. साथ ही सामरिक ढांचे को मजबूत बनाना होगा, क्योंकि आनेवाले 10-15 वर्षो में जो सामरिक ढांचा बनेगा, उसमें चीन सबसे बड़ा जीडीपी वाला देश बनेगा. इस मामले में अमेरिका दूसरे स्थान पर और भारत तीसरे स्थान पर होगा. इसलिए भारत को अमेरिका के साथ द्विपक्षीय संबंध को बहुत ही ध्यान से आगे बढ़ाना चाहिए.

एक दूसरी बात यह है कि भारत की बहुत सी अपनी जरूरतें हैं. अपनी जरूरतों के हिसाब से भी संबंधों की अहमियत होती है. देश में नौजवानों की एक बड़ी फौज है, जिसे शिक्षा, तकनीक और अच्छा स्वास्थ्य चाहिए. देश की अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए निवेश की जरूरत है. क्योंकि अपनी तरक्की के लिए भारत जो टेक्नोलॉजी, जो इन्वेस्टमेंट और एजुकेशन के जो अवसर चाहता है, वह केवल अमेरिका से मिल सकता है. बाकी जितने भी देश हैं, चाहे वह यूरोपियन देश हों या फिर रूस, फ्रांस, जर्मनी, जापान या चीन, इन देशों की रूपरेखा वैसी है ही नहीं, जैसी अमेरिका की है. इसलिए यदि आप सामरिक या राजनीतिक दृष्टिकोण से देखें, तो भारत के लिए अमेरिका के साथ संबंध बनाना हमारे फायदे में होगा. यदि इसे सही प्रकार से संभाल पायें, तो यह भारत के लिए अच्छी बात होगी.

अमेरिका के साथ बेहतर संबंध का राजनीतिक असर पूरे क्षेत्रीय माहौल पर पड़ेगा. दक्षिण एशिया में भारत की अहमियत बढ़ेगी. इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2005 में जब भारत ने अमेरिका के साथ समझौता किया था, तो चीन के रवैये में हल्का सा बदलाव आ गया था. चीन ने कई मुद्दों पर लचीला रुख अपनाने का संकेत भी दिया था. इसलिए यदि भारत और अमेरिका के रिश्ते मजबूत होते हैं, तो उसका असर पाकिस्तान बांग्लादेश, श्रीलंका जैसे भारत के पड़ोसी देशों पर भी पड़ेगा. चीन को भी इसी श्रेणी में रखा जा सकता है, क्योंकि अमेरिका के साथ आपसी समझदारी और द्विपक्षीय संबंधों में प्रगाढ़ता से इसका असर पूरे क्षेत्रीय माहौल पर पड़ेगा.

नरेंद्र मोदी सरकार से इस दिशा में काफी उम्मीद है. सरकार उस दिशा में काम भी कर रही है. अमेरिका दौरे के समय अमेरिका में जिस तरह से भारत का महत्व दिखा, उससे साफ जाहिर होता है कि अमेरिका भी इस संबंध को लेकर काफी उत्सुक है. हालांकि इस सबसे अलग जब हम विजन की बात करते हैं, तो भारत अपनी क्षमता के ऊपर आश्रित है. हमें अपनी क्षमता को केवल अमेरिका या ओबामा के साथ नहीं जोड़ना चाहिए.

संबंधों के साथ ही हमें खुद को मजबूत बनाना होगा. अपनी ताकत को बढ़ाना होगा. हमारी आर्थिक, सैनिक और राजनतिक जरूरतें क्या हैं, इस पर हमें आगे बढ़ना होगा. चाहे वह आर्थिक हो या सामरिक या फिर राजनैतिक, जब संपूर्ण रूप से ‘कंप्रिहेंसिव पॉवर’ यानी समुचित क्षमता की बात होती है, तो भारत को उस पर ध्यान देना होगा. भारत को अपनी समुचित क्षमता को बढ़ाने के लिए अमेरिका एक मार्ग है. जरूरत इस बात की है कि उस मार्ग का सही अवलोकन किया जाये और उस मार्ग पर चल कर अपने लक्ष्य की प्राप्ति की दिशा में आगे बढ़ा जाये.

अंजनी कुमार सिंह से बातचीत पर आधारित

सी उदय भास्कर

रक्षा विशेषज्ञ

बड़ी आशाएं हैं ओबामा के भारत दौरे से

इस महीने की 26 तारीख को गणतंत्र दिवस समारोह में पहली बार कोई अमेरिकी राष्ट्रपति बतौर मुख्य अतिथि शामिल होंगे. यह भी पहली बार होगा कि कोई अमेरिकी राष्ट्रपति अपने कार्यकाल के दौरान दो दफा भारत आया हो.

गणतंत्र दिवस के आयोजन में हाल के वर्षों में अक्सर ऐसे देशों के प्रमुख आये हैं, जिनसे भारत का रक्षा या सैन्य साजो-सामान के लेन-देन के समझौते हैं. वर्ष 2007 में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन मुख्य अतिथि थे, तो 2008 में फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी आमंत्रित थे. भारत ने रूस से एक एअरक्राफ्ट कैरियर और कई सुखोई लड़ाकू विमानखरीदा है तथा दोनों देश ब्रह्मोस समेत मिसाइलों और जहाजों के विकास के साझा कार्यक्रम चला रहे हैं. फ्रांसीसी कंपनियों ने मिराज विमानों और स्कॉर्पेन पनडुब्बियों की आपूर्ति की है. 126 फ्रांसीसी राफेल विमानों की खरीद को लेकर अंतिम बातचीत चल रही है.

भारतीय वायुसेना लॉकहीड के सी-130जे और बोइंग सी-17 जहाजों को यातायात के लिए इस्तेमाल कर रही है और भारतीय नौसेना अरब सागर में निगरानी के लिए पी-8आइ का उपयोग कर रही है. बहुत ही जल्दी अपाचे और सीहॉक हेलीकॉप्टर भी आनेवाले हैं. अब अमेरिका भारत के रक्षा सामानों का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है.

द्विपक्षीय व्यापार

मैं पिछली बार राष्ट्रपति ओबामा के साथ भारत आये वाणिज्यिक प्रतिनिधिमंडल का सदस्य था. उस समय तक उन्होंने किसी अन्य देश से अधिक समय भारत में बिताया था. हालांकि परमाणु ऊर्जा से जुड़ी बड़ी व्यापारिक पहलें आगे नहीं बढ़ सकी हैं, लेकिन व्यापार में तेज बढ़ोतरी हुई है और अब यह 100 बिलियन डॉलर के करीब पहुंच रहा है. मैंने द्विपक्षीय व्यापार में कई वर्षों तक लगातार वृद्धि की संभावना व्यक्त की है और भारत अगले एक दशक में अमेरिका के छह सबसे बड़े व्यापारिक सहयोगियों में शामिल हो सकता है.

आज आइबीएम और एचपी में बड़ी संख्या में भारतीय नौकरी कर रहे हैं, दर्जनों बड़ी अमेरिकी कंपनियों के देश के बाहर स्थित बड़े शोध केंद्र भारत में ही हैं, बोइंग, जीइ, एक्सॉन मोबिल जैसी कंपनियां अरबों रुपये मूल्य की वस्तुएं भारत में बेच रहे हैं. अमेरिका की नामी कंपनियों, जैसे- न्यूयॉर्क के पियरे होटल, हॉलीवुड के ड्रीमवर्क्‍स स्टूडियोज, मिनोसेटा स्थित लोहे के खदान, अपालाशिया के तेल शोधक कारखाने आदि में भारतीय निवेशकों ने धन लगाया है. भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिक हार्वर्ड बिजनेस स्कूल और पेप्सीको जैसी सुप्रसिद्ध अमेरिकी संस्थाओं की अगुवाई कर रहे हैं. फिर भी, दोनों देशों की परस्पर सहयोग की अधिकतर संभावनाएं अभी साकार नहीं हुई हैं.

वैश्विक कूटनीति

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विश्व में भारत की भूमिका को विस्तार देने की जल्दी में हैं. मोदी अन्य देशों के साथ-साथ जापान, ऑस्ट्रेलिया और इजरायल की ओर हाथ बढ़ा चुके हैं. वे शीघ्र ही जर्मनी और ब्रिटेन की यात्र पर भी जानेवाले हैं. लेकिन दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के साथ संबंध बढ़ाना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है.

निश्चित रूप से राष्ट्रपति ओबामा की यात्र व्यापारिक होने के साथ राजनीतिक भी है. अमेरिका को एशिया में चीन के बढ़ते दबदबे को संतुलित करने के लिए दोस्ताना देशों की जरूरत है. इस लिहाज से ताइवान और जापान नाकाफी हैं, और अफगानिस्तान में दशक भर के अमेरिकी दखल के समय खरबों डॉलर की सहायता लेनेवाले पाकिस्तान पर अब अमेरिका का अधिक भरोसा नहीं है. भारत और अमेरिका कई सांस्कृतिक मूल्यों को साझा करते हैं- लोकतंत्र, मुक्त बाजार, बहु-जातीय समाज और विविधता के प्रति सहिष्णुता. राष्ट्रपति निक्सन और उनके विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर द्वारा पैदा की गयी लंबे अरसे तक चलनेवाली तल्खियां राष्ट्रपति क्लिंटन और जॉर्ज डब्ल्यू बुश द्वारा भारत के प्रति प्रदर्शित बेहतर भावना से खत्म हो चुकी हैं.

(हफिंगटन पोस्ट से साभार)

गुंजन बागला

मैनेजमेंट कंसल्टेंट

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