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मुरहो महादलित टोला का बच्चा भी जानता है भाई साहब को

Updated at : 12 Oct 2014 3:52 AM (IST)
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मुरहो महादलित टोला का बच्चा भी जानता है भाई साहब को

रूपेश कुमार मधेपुरा : सत्यार्थी जी को नोबल पुरस्कार मिलने की खबर सदर प्रखंड स्थित मुरहो गांव के महादलित टोला के बच्चे-बच्चे को है. मुरहो गांव के ही 11 बंधुआ मजदूरों को कैलाश सत्यार्थी ने इलाहाबाद से मुक्त कराया था. मुक्त कराये गये बच्चों में एक कालू तो बाद में अमेरिका में आयोजित सेमिनार में […]

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रूपेश कुमार

मधेपुरा : सत्यार्थी जी को नोबल पुरस्कार मिलने की खबर सदर प्रखंड स्थित मुरहो गांव के महादलित टोला के बच्चे-बच्चे को है. मुरहो गांव के ही 11 बंधुआ मजदूरों को कैलाश सत्यार्थी ने इलाहाबाद से मुक्त कराया था. मुक्त कराये गये बच्चों में एक कालू तो बाद में अमेरिका में आयोजित सेमिनार में शामिल हुए.
मुरहो में हैं उमेश कोइराला उर्फ उमेश ऋषिदेव़ उमेश मधेपुरा के पूर्व सांसद किराय मुसहर के पौत्र हैं. टीन की छत और दरवाजे पर एक मचाऩ घर के एक तरफ बोर्ड टंगा है, जिस पर लिखा है ‘ बचपन बचाओ आंदोलन जिला समन्वयक’. उमेश ने बताया कि भाई साहब मुरहो आये थे कालू की मृत्यु के बाद, लेकिन वे मधेपुरा से दर्जनों बार गुजर चुके हैं. पूरे कोसी क्षेत्र सहित भागलपुर में भी उनकी काफी सक्रियता रही थी. शांति का नोबल पुरस्कार पाने वाले कैलाश सत्यार्थी की चर्चा पूरे विश्व में हो रही है़ पूरे विश्व में उन्होंने हजारों बाल मजदूरों को मुक्त कराया़ इनमें कोसी के भी सैकड़ों बच्चे शामिल हैं. इनमें से ही एक था मधेपुरा जिले के मुरहो गांव का कालू़ मुरहो के महादलित टोला में कैलाश सत्यार्थी को ‘भाई साहब’ कह कर पुकारा जाता है.
उमेश कहते हैं कि भाई साहब जब मुरहो के महादलित टोला आने वाले थे तो उनके लिए एक मंच बनाया गया था. आठ दिसंबर 2011 की बात है. भाई साहब यहां पहुंचे तो मंच देख हंस कर कहा ‘ उमेश हमें तो कालू के यहां जाना है न. सीधे वहीं ले चलो. कालू के आंगन में कुर्सियों का इंतजाम किया गया था लेकिन भाई साहब तो सीधे पीढ़िया पर बैठ गये. जयनारायण ने बताया कि भाई साहब ने करीब दो घंटे तक उनका हाल लिया और सबको शिक्षा और अधिकार के प्रति जागरूक किया़ कालू के नवजात बच्चे का नाम सत्यम रखा.
उन्होंने थोडा बड़ा होने पर इसके पढाई-लिखाई के लिए बाहर ले जाने की बात कही़ उमेश ने बताया कि करीब हर महीने भाई साहब सत्यम का हालचाल पूछना नहीं भूलते हैं. उमेश ने एक अन्य वाकया का जिक्र किया. उन्होंने बताया कि एक बार भाई साहब पूर्णिया से सहरसा के लिए कारवां ले कर निकल रहे थे. उनके साथ करीब एक हजार कार्यकर्ता थे. वहीं से उन्होंने फोन किया कि चांदनी चौक पर लिट्टी खाना है़ उमेश ने आनन-फानन में लिट्टी का इंतजाम कराया़ यहां पहुंच कर भाई साहब ने लिट्टी चाव से खायी और भुगतान भी किया़.
बिजल और हरिवल्लव तो कहते हुए हंस पड़े कि भाई साहब मैथिली भी बोल लेते हैं. वे गर्व से कहते हैं कि 144 देश घूम कर आये हैं भाई साहब, उन्हें 144 बोली आती है. मुरहो महादलित टोला के ये युवक अधिकार और शिक्षा के बारे में न केवल जागरूक हैं बल्कि विचारशील भी हैं. यह भाई साहब की सोहबत का नतीजा है.

‘नोबल पुरस्कार’ यहां तो फाइलों में अटका है
मधेपुरा:बंधुआ और बाल मजदूरों को मुक्त कराने के अभियान को विश्व बिरादरी ने अहम कार्य माना और कैलाश सत्यार्थी को नोबल पुरस्कार से नवाजा, लेकिन हजारों बंधुआ मजदूरों का पुनर्वास तो सरकारी फाइलों में अटका हुआ है. मुरहो महादलित टोला के युवकों से बात करते हुए मन रह-रह कर उनकी दिशाहीन जिंदगी के बारे में सोचने लगता था. जयनारायण ऋषिदेव, बिजल और हरिवल्लव बाल बंधुआ मजदूर थे. मुक्त कराये गय़े नियमानुसार सरकार की ओर से जमीन और इंदिरा आवास भी मिलना था.
ये लोग आज भी भटक रहे हैं रोजी-रोटी के लिए. इनलोगों ने बताया कि मनरेगा के काम मिलने में इतनी लेनी-देनी है कि इससे अच्छा दिल्ली और पंजाब में मजदूरी करना है़ धान कटनी में फिर से निकलने का मन बना रहे हैं. पुनर्वास के लिए तीन बार जनता दरबार में डीएम साहब से गुहार लगा चुके हैं.
बचपन बचाओ आंदोलन के जिला समन्वयक उमेश ऋषिदेव ने बताया कि अधिकारी सुनते ही नहीं हैं. संस्था के प्रदेश समन्वयक घूरन महतो बताते हैं कि सरकारी नियम है कि बंधुआ मजदूरों का पुनर्वास कराया जाना है,लेकिन अधिकारी सुनते ही नहीं हैं. कालू के छोटे भाई तुरंती ऋषिदेव के चेहरे पर भी निराशा है़ एक तरफ भाई साहब और कालू का स्टारडम और दूसरी तरफ दो जून रोटी के लिए संघर्ष करती जिंदगी.
जिस संस्था ने बाल मजदूरों के लिए महती कार्य कर दुनिया में नाम और इज्जत कमायी, वहीं दूसरी ओर उसके जिन फूलों को खिल कर दुनिया को महकाना था, उनके चेहरे मुरझाए हैं और वे एक-एक दिन कर सब जिंदगी काट रहे हैं. ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ के इस पहलू पर भी विचार की जरूरत है, ताकि इन बचपन को एक सही दिशा भी मिल सके.
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