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Coronavirus Effect : रोजी-रोजगार पर आफत, ऊपर से महंगाई ने मध्यवर्ग की तोड़ी कमर, कहीं से मदद भी नहीं

Updated at : 09 Sep 2020 6:02 AM (IST)
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Coronavirus Effect : रोजी-रोजगार पर आफत, ऊपर से महंगाई ने मध्यवर्ग की तोड़ी कमर, कहीं से मदद भी नहीं

झारखंड में करीब 59 लाख परिवार खाद्य सुरक्षा अधिनियम के दायरे में आते हैं. इनको सरकार से खाद्य सुरक्षा के नाम पर अनाज मिलता है. सरकार मानती है कि इनकी वार्षिक आय 72 हजार से कम है.

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रांची : झारखंड में करीब 59 लाख परिवार खाद्य सुरक्षा अधिनियम के दायरे में आते हैं. इनको सरकार से खाद्य सुरक्षा के नाम पर अनाज मिलता है. सरकार मानती है कि इनकी वार्षिक आय 72 हजार से कम है. इसमें करीब 87 फीसदी आबादी ग्रामीण है. करीब दो करोड़ आबादी इस दायरे में आती है. इसके अतिरिक्त राज्य की करीब एक से डेढ़ करोड़ आबादी मध्यम और उच्च दर्जे में आती है. इसमें सबसे बड़ी आबादी मध्यम दर्जेवालों की है. कोविड-19 के समय इस आबादी के बारे में किसी ने नहीं सोचा. इसमें बड़ी आबादी की आजीविका गैर सरकारी काम, अपना कारोबार या सार्वजनिक उपक्रमों पर निर्भर है.

कोविड-19 के दौरान यह आबादी बेहाल है और उसे हर तरफ से अपने ही हाल पर छोड़ दिया गया है. कई लोगों का रोजगार चला गया. जो काम कर रहे हैं, उनके वेतन में कटौती कर दी गयी. नियमित मिलनेवाली वृद्धि बंद कर दी गयी.

सब कुछ सामान्य रहने के कारण मध्यम दर्जे के लोगों ने अपना खर्च भी बढ़ा लिया था. बैंक का कर्ज, रहने की जीवन शैली, बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के कारण बचत भी कम या नहीं ही थी. करीब छह माह के लॉकडाउन के शुरुआती कुछ महीनों में ही बचत के पैसे खत्म हो गये. घर में बैठ जाने के कारण आमदनी बंद हो गयी. लॉकडाउन के दौरान खान-पान, बैंक का लोन, स्कूल की फीस, दवा का खर्च बचत के पैसों से चला, लेकिन अब वह सहारा भी नहीं है. इससे मध्यम और उच्च मध्यम वर्ग की कमर टूट गयी.

  • मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए दो शाम की रोटी का जुगाड़ भी मुश्किल

  • 25-30 फीसदी तक बढ़ गया खाने-पीने का बजट

खाद्य सामग्री की बढ़ी कीमतों से हर वर्ग परेशान है. लॉकडाउन के शुरुआती दिनों से अब तक लगभग 5-6 माह में खाद्य सामग्री 25 से लेकर 30 प्रतिशत तक महंगी हो गयी हैं. आटा, अरहर दाल, चीनी, मसूर दाल, चना, बेसन, चना सत्तू सहित हर चीजें महंगी हुई हैं. सरसों तेल की कीमत में जबरदस्त इजाफा हुआ है. सरसों तेल 20 से 30 रुपये प्रति लीटर तक महंगा हो गया है. लूज चाय पत्ती की कीमत भी 60 रुपये प्रति किलो तक बढ़ गयी हैं. खाद्य सामग्री के साथ-साथ पैक्ड आइटम भी एमआरपी यानी मैक्सिमम रिटेल प्राइस पर मिल रहे हैं. पहले लोगों को इस पर छूट मिलती थी.

पेट्रोल की कीमत बढ़ी : लॉकडाउन के शुरुआती दिनों से अब तक लगभग 5.5 माह में ही पेट्रोल 12.80 रुपये और डीजल 13.92 रुपये प्रति लीटर महंगा हो गया है. इस कारण हर वर्ग काफी प्रभावित है. कीमतें बढ़ने से परिवहन किराया और ट्रांसपोर्ट कॉस्ट बढ़ गया है, जिससे कई जरूरी चीजें महंगी हो गयी हैं. पेट्रोल 68.72 रुपये प्रति लीटर से बढ़ कर वर्तमान में 81.52 रुपये और डीजल 63.56 रुपये से बढ़ कर 77.48 रुपये प्रति लीटर हो गया है.

  • 59 लाख परिवारों को राज्य में मिल रहा मुफ्त अनाज

  • 01 करोड़ मध्यम वर्गीय लोगों पर किसी का ध्यान नहीं

  • करोड़ मध्यम वर्गीय लोगों पर किसी का ध्यान नहीं

बस भाड़ा नहीं लगा पर फीस से राहत नहीं : कोविड के दौरान स्कूल तो बंद रहे, लेकिन अभिभावकों को फीस में कोई राहत नहीं मिली. बस नहीं चलने कारण स्कूलों ने ट्यूशन फीस नियमित रूप से लिया. कोविड-19 के दौरान ही नया सेशन आ जाने या मैट्रिक-इंटर का रिजल्ट आने से मध्यम वर्ग को एडमिशन व अन्य खर्च के लिए एकमुश्त राशि देनी पड़ी. बच्चों की पढ़ाई के लिए ऊंची कीमत पर पुस्तकें लेनी पड़ी. 11 और स्नातक में एडमिशन में 30 से लेकर एक लाख रुपये तक देने पड़े. ऑनलाइन पढ़ाई के नाम पर हर माह मोबाइल रिचार्ज का खर्च बढ़ गया. नया मोबाइल भी खरीदना पड़ा. किसी तरह इन खर्चों को पुराने के लिए मध्यम वर्ग के बचत का पैसा खर्च करना पड़ा है.

दवाओं की कीमत भी बढ़ी संक्रमित हुए तो जान पर संकट : कोरोना के दौरान रूटीन के दवाओं की कीमत भी बढ़ गयी है. कोरोना से बचाव के लिए जरूरी विटामिन सी की कीमत दो से तीन गुना बढ़ गयी है. काढ़ा, नीम-हकीम पर अलग खर्च बढ़ गया है. पारासिटामोल व एंटीबायोटिक दवाओं की कीमत भी एक से दो रुपये बढ़ गयी है. संक्रमित हो जाने पर इलाज का अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है. निजी अस्पतालों का खर्च मध्यम वर्ग के रेंज से पार हो जा रहा है. इलाज के लिए सरकार द्वारा निर्धारित अधिकतम 5,500 रुपये से 18,000 रुपये प्रतिदिन देना संभव नहीं हो पा रहा है. मध्यम वर्ग की परेशानी तब बढ़ जा रही है, जब घर के दो से तीन लोग संक्रमित हो जा रहे हैं. उनके सामने इलाज कराने में भी परेशानी हो रही है.

न टैक्स में राहत न लोन में : मध्यम वर्ग घर, वाहन, एजुकेशन या अन्य जरूरतों के लिए बैंकों से कर्ज ले लेता है. कोरोना के कारण खर्च तो घट गया, लेकिन बैंकों ने राहत नहीं दी. कटे हुए वेतन में ही लोन चुकाने की चुनौती से मध्यम वर्ग जूझ रहा है. छोटे टैक्स देनेवालों को भी कोई राहत नहीं दी. छोटे व्यापारियों का कारोबार तीन-चार माह बंद रहा. इनको राहत देने के लिए सरकार ने कोई पहल नहीं की. यही कारण रहा कि कई मध्यम वर्गीय व्यापारियों को कारोबार छोड़ना या बदलना पड़ा.

Post by : Pritish Sahay

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