Ajit Pawar : कांग्रेस के साथ सरकार बनाने से NCP के बंटवारे तक चाचा–भतीजा रहे आमने–सामने, लेकिन प्यार नहीं हुआ कम
Published by : Rajneesh Anand Updated At : 28 Jan 2026 4:03 PM
अजित पवार, सुप्रिया सुले और शरद पवार
Ajit Pawar news : चाचा–भतीजा का रिश्ता हमारे देश में बहुत ही खास माना जाता है, यही वजह है कि जब महाराष्ट्र की राजनीति में चाचा–भतीजा यानी शरद पवार और अजित पवार की इंट्री हुई, तो सबकी नजरें उसपर टिकीं. राजनीति के मैदान में शरद पवार ने अजित पवार को कई अहम जिम्मेदारियां भी दीं. इन जिम्मेदारियों ने अजित पवार को जिम्मेदार तो बनाया, लेकिन अजित पवार 1991 में जब बारामती संसदीय सीट अपने चाचा शरद पवार के लिए छोड़ दी, तो उनका कद राजनीति में काफी बड़ा हो गया. साथ ही चाचा–भतीजे का रिश्ता काफी मजबूत भी हुआ. यह जुगलबंदी तब टूटी, जब अपनी महत्वाकांक्षा में अजित पवार ने बीजेपी का दामन थाम लिया और 41 विधायकों के साथ असली एनसीपी का तमगा शरद पवार से छिन लिया.
Ajit Pawar news : अजित पवार और शरद पवार दोनों ही भारतीय राजनीति के दिग्गज नेता हैं और इन दोनों की ही खासियत यह है कि इन्होंने अपने बूते अपनी जगह बनाई. अजित पवार, शरद पवार के बड़े भाई अनंतराव पवार के बेटे हैं, इस लिहाज से इन दोनों का पारिवारिक रिश्ता है, जो चाचा–भतीजे का है. अजित पवार ने जब करियर की शुरुआत की, तो शरद पवार उनके गुरु बने, लेकिन धीरे–धीरे राजनीति के मैदान में अजित पवार ने गुरु को पीछे कर दिया.
शुरुआत में मधुर था शरद पवार और अजित पवार का रिश्ता
राजनीति के मैदान में अजित पवार ने जब एंट्री की, उसक वक्त शरद पवार अपनी जगह बना चुके थे. इस वजह से शरद पवार ने एक तरह से अजित पवार को संवारने का काम किया. उन्होंने अपने भतीजे को पार्टी की जिम्मेदारियां सौंपी, ताकि उनका व्यक्तित्व निखरे. गौर करने वाली बात यह है कि अजित पवार सिर्फ पिछलग्गू नेता नहीं बने, बल्कि उन्होंने सहकारिता के क्षेत्र में जमीनी स्तर पर काम किया और अपनी पहचान बनाई. अजित के कद से शरद पवार को परेशानी भी नहीं थी, दिक्कत तब हुई जब अजित ने शरद पवार से अलग रास्ता चुना.
पार्टी में बढ़ी उत्तराधिकार की जंग
अजित पवार और शरद पवार के बीच पारिवारिक रिश्ते तो हमेशा ही अच्छे रहे, लेकिन राजनीति में विरोध शुरू हो गया. अजित पवार को शरद पवार के कई फैसले पसंद नहीं थे, उनमें से एक था 2004 में कांग्रेस के नेतृत्व में सरकार बनाना . कारण यह था कि 2004 के चुनाव में एनसीपी बड़ी पार्टी थी और कांग्रेस को उससे कम सीटें मिली थीं. शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले और रोहित पवार की राजनीति में एंट्री से पवार परिवार में उत्तराधिकार की जंग बढ़ी. इस वजह से भी अजित पवार ने अपने लिए अलग रास्ता चुना. रोहित पवार अजित पवार के भतीजे हैं और शरद पवार के बड़े भाई के पोते हैं. इस वजह से भी पार्टी में उनकी पैठ है और वे मजबूती के साथ शरद पवार के साथ खड़े हैं.
2023 में अजित पवार ने शरद पवार को दिया बड़ा झटका

2023 में अजित पवार ने एनसीपी के 41 विधायकों के साथ अपना अलग रास्ता चुना और बीजेपी के साथ सरकार बनाई. अजित पवार के इस कदम से परिवार में दूरियां बढ़ी और असली एनसीपी का मसला कोर्ट तक पहुंचा. उससे पहले नवंबर 2019 में, अजित पवार ने अपना सबसे अप्रत्याशित कदम उठाया था, जब उन्होंने पार्टी से अलग होकर बीजेपी के साथ सरकार बना ली थी. सुबह-सुबह एकदम चौंकाने वाले अंदाज में देवेंद्र फडणवीस ने सीएम और अजित पवार ने डिप्टी सीएम के रूप में शपथ ली थी. अजित पवार के इन फैसलों से पार्टी दो गुट में बंट गई.
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पार्टी भले ही बंटी हो परिवार नहीं बिखरा
अजित पवार के फैसले से एनसीपी को बड़ा झटका लगा और पार्टी दो फाड़ हो गई, लेकिन अगर परिवार की बात करें, तो वह पूरी तरह एकजुट रहा. 2023 के बंटवारे के बाद भी अजित पवार और शरद पवार कई बार साथ में दिखे और अजित की मां आशा ताई ने तो खुले तौर पर परिवार की एकजुटता की बात भी कही थी. अजित पवार की दुर्घटना में मौत के बाद भी पूरा परिवार जिस तरह से एकजुट है, वह यह साबित करता है कि राजनीतिक विरोध होने के बावजूद भी पवार परिवार एकजुट है.
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By Rajneesh Anand
रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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