सिटी ऑफ ब्रदरहुड आसनसोल, तुम्हें क्या हो गया है

Updated at : 07 Jun 2019 5:19 AM (IST)
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सिटी ऑफ ब्रदरहुड आसनसोल, तुम्हें क्या हो गया है

डॉ. प्रदीप सुमन आसनसोल : सिटी ऑफ ब्रदरहुड (भाईचारे का शहर) कहलानेवाले आसनसोल, तुम्हें क्या हो गया है ? मामूली बातों पर जिस तरह से विवाद बढ़ कर सांप्रदायिक तनाव का रूप ले रहे हैं, उससे किसी का भी भला तो नहीं हो रहा है ! बिडंबना यह भी कि इन घटनाओं को तुमने उपद्रवियों […]

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डॉ. प्रदीप सुमन

आसनसोल : सिटी ऑफ ब्रदरहुड (भाईचारे का शहर) कहलानेवाले आसनसोल, तुम्हें क्या हो गया है ? मामूली बातों पर जिस तरह से विवाद बढ़ कर सांप्रदायिक तनाव का रूप ले रहे हैं, उससे किसी का भी भला तो नहीं हो रहा है ! बिडंबना यह भी कि इन घटनाओं को तुमने उपद्रवियों तथा पुलिस- प्रशासन तक ही सीमित कर रखा है.
तुम्हारे अमन-पसंद नागरिक, तुममें बसर कर रहे हजारों बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता तथा सौहार्द व मानवता के पुजारियों ने खुद को इन घटनाओं से अलग कर रखा है. वे बस चर्चा भर कर लेते हैं. बंद कमरों से बाहर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर चंद शब्द खर्च कर अपने दायित्वों की इतिश्री समझ लेते हैं.
हिंदी साहित्य के व्यंग्यकारों की अग्रणी कतार में हरिशंकर परसाई शामिल रहे हैं. उन्होंने दशकों पहले इन विसंगतियों को समझ लिया था. उनकी मशहूर रचना ‘आवारा भीड़ के खतरे’ का एक उद्धरण याद आ रहा है, जिसमें वह चेतावनी देते हैं- “मैं देख रहा हूं कि नई पीढ़ी अपने ऊपर की पीढ़ी से ज्यादा जड़ और दकियानूस हो गयी है. दिशाहीन, बेकार, हताश और विध्वंसवादी युवकों की यह भीड़ खतरनाक होती है. इसका उपयोग महत्वाकांक्षी और खतरनाक विचारधारा वाले समूह कर सकते हैं.” ठीक यही नियति तुम्हारी हो गयी है.
तुम्हारा कभी का संवेदनशील समाज आज संवेदनहीन हो गया है. वह इस तरह की घटनाओं को नियति समझ कर नजरअंदाज कर देता है. तुम्हारे इर्द-गिर्द हजारों बुद्धिजीवी भी तो हैं ! आखिर उनका दायित्व क्या है ? फिर याद दिला रहा हूं. हरिशंकर परसाई ने लिखा था – “ इस देश के बुद्धिजीवी शेर हैं, पर वे सियारों की बारात में बैंड बजाते हैं.” आसनसोल में भी यही स्थिति तो नहीं बन गयी है ?
पिछले तीन वर्षों से कभी रामनवमी के नाम पर तो कभी ईद के नाम पर या कभी व्यक्तिगत मुद्दों को लेकर सांप्रदायिक संघर्षों का मानो एक सिलसिला चल पड़ा है. मिनी भारत समझे जानेवाले आसनसोल का सामाजिक तानाबाना बिखरने लगा है. समाज से लेकर व्यवसाय तक दरकने लगे हैं. चिंतित तो हर शख्स है.
लेकिन हताशा है, कहीं से कोई मजबूत पहल नहीं है, कोई सार्थक हस्तक्षेप नहीं है. आसनसोल, इस तरह तो तुम्हारा अस्तित्व ही मुश्किल में पड़ जायेगा, तुम्हारी पहचान ही बदल जायेगी. इन घटनाओं को नियंत्रित करने के लिए तुम्हें मुखर होना होगा, सशक्त संवाद की स्थिति कायम करनी होगी, भावनाओं को समझना होगा तथा संबंधों व सामाजिक ताना-बाना को जीवंत करना होगा, जीवंत बनाये रखना होगा.
मौसम की मेहरबानी का इंतजार करेंगे, तो शीत से निबटते-निबटते लू तंग करने लगेगी. मौसम बदलने के इंतजार से कुछ नहीं होता. वसंत अपने आप नहीं आता, उसे लाना पड़ता है. सहज आनेवाला तो पतझड़ होता है. वसंत नहीं. अपने आप तो पत्ते झड़ते हैं. नये पत्ते तो वृक्ष का प्राण-रस पीकर पैदा होते हैं. वसंत यों नहीं आता.
शीत और गरमी के बीच जो जितना वसंत निकाल सके, निकाल ले. दो पाटों के बीच फंसा है शहर का वसंत. पाट और आगे खिसक रहे हैं. वसंत को बचाना है, तो जोर लगाकर इन दो पाटों को पीछे धकेलो – इधर शीत को, उधर गरमी को. तब बीच से बचते हुए निकल सकेगा तुम्हारा घायल वसंत.
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