कटवा में ‘लाल गढ़’ पर दीदी का कब्जा, क्या युवा और किसान बिगाड़ेंगे खेल? जानें अजय-हुगली के संगम का सियासी मिजाज

Katwa Assembly Election 2026: पूर्व बर्धमान के कटवा विधानसभा क्षेत्र में टीएमसी और भाजपा के बीच कड़ा मुकाबला होने की उम्मीद है. आलू-धान के गिरते दाम और रोजगार की कमी बनी चुनाव का बड़ा मुद्दा. जानें क्या है रवींद्रनाथ चटर्जी का चुनावी इतिहास.
Katwa Assembly Election 2026: पश्चिम बंगाल के ऐतिहासिक शहर कटवा में इस बार चुनावी पारा सातवें आसमान पर है. कभी वामपंथ का अभेद्य दुर्ग रहा यह क्षेत्र अब तृणमूल कांग्रेस (TMC) और भाजपा के बीच हाई-वोल्टेज मुकाबले का गवाह बन रहा है.
विकास और रोजगार के पैमाने पर उम्मीदवारों को तौल रहा वोटर
अजय और हुगली नदियों के संगम पर स्थित यह सामरिक क्षेत्र आज अपनी सांस्कृतिक विरासत से ज्यादा किसानों के संकट और युवाओं की टूटती आकांक्षाओं के कारण चर्चा में है. चुनावी शोर के बीच यहां का वोटर इस बार विकास और रोजगार के पैमाने पर उम्मीदवारों को तौल रहा है. नवाबों के दौर में मुर्शिदाबाद का ‘प्रवेश द्वार’ कहा जाने वाला कटवा आज विकास के द्वार खुलने की बाट जोह रहा है.
रवींद्रनाथ चटर्जी का दबदबा बनाम विपक्ष की चुनौती
कटवा की राजनीति में रवींद्रनाथ चटर्जी एक बड़ा नाम हैं. कांग्रेस के दिग्गज रहे चटर्जी अब टीएमसी के खेमे में हैं और लगातार जीत दर्ज कर रहे हैं. वर्ष 1996 से अपनी धाक जमाने वाले चटर्जी 2016 में टीएमसी में शामिल हुए और कांग्रेस उम्मीदवार को महज 911 वोटों से हराया. 2021 में भाजपा को उन्होंने 9,155 मतों से शिकस्त दी.
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कटवा में इस बार त्रिकोणीय मुकाबला
कटवा विधानसभा सीट पर इस बार रवींद्रनाथ चटर्जी के सामने भाजपा की कृष्णा घोष और माकपा के संजीब दास मैदान में हैं. मुकाबला मुख्य रूप से सत्ताधारी दल और भगवा खेमे के बीच होता दिख रहा है.
ग्राउंड रिपोर्ट: एआई (AI) का सपना और रोजगार का सूखा
कटवा के युवाओं में आधुनिक तकनीक को लेकर जबर्दस्त उत्साह है, लेकिन संसाधनों की कमी उन्हें खल रही है. हुगली वीमेंस कॉलेज की छात्रा प्रियंका अधिकारी ने कहा कि वे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) में करियर बनाना चाहती हैं, लेकिन कोलकाता तक में सही अवसर नहीं मिल रहे हैं. युवाओं का मानना है कि शहर की बुनियादी सुविधाएं दम तोड़ रही हैं, जिसके कारण उन्हें पलायन के लिए मजबूर होना पड़ रहा है.
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खेती का गणित : आलू और धान की कीमतों ने किसानों की तोड़ी कमर
कटवा की उपजाऊ मिट्टी पर पसीना बहाने वाला किसान आज खुद को ठगा महसूस कर रहा है. मंडियों में आलू 650-700 रुपए प्रति क्विंटल बिक रहा है, जिससे लागत भी नहीं निकल रही. किसान दूधकुमार जाना के मुताबिक, व्यापारियों की मनमानी के आगे वे बेबस हैं.
एमएसपी (MSP) की हकीकत
धान का समर्थन मूल्य 2,203 रुपए होने के बावजूद किसान बिचौलियों को कम दाम पर फसल बेचने को मजबूर हैं. मुर्शली गांव के किसान पुषन मंडल ने बताया कि कर्ज के बोझ के कारण आधी फसल साहूकार के पास चली जाती है.
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Katwa Assembly Election 2026: सामाजिक और भौगोलिक समीकरण
कटवा का चुनावी गणित काफी दिलचस्प है. यहां 65.40 प्रतिशत ग्रामीण और 34.60 प्रतिशत शहरी मतदाता हैं. अनुसूचित जाति की 27.41 प्रतिशत हिस्सेदारी और 21.80 प्रतिशत मुस्लिम आबादी चुनाव परिणाम तय करने में निर्णायक भूमिका निभायेगी.
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By Mithilesh Jha
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