सालतोड़ा सीट को लेकर तृणमूल कांग्रेस में मंथन

मिशन सालतोड़ा के तहत पार्टी इस सीट को वापस पाने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है.
2026 विधानसभा चुनाव में मिशन सालतोड़ा, जातीय गणित बना निर्णायक बांकुड़ा. 2026 के विधानसभा चुनाव को लेकर सालतोड़ा विधानसभा सीट तृणमूल कांग्रेस के लिए अहम बन गयी है. मिशन सालतोड़ा के तहत पार्टी इस सीट को वापस पाने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है. इसी कड़ी में पश्चिम बंगाल बाउरी समुदाय ने शनिवार को गंगाजलघाटी के दुर्लभपुर में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सालतोड़ा सीट से बाउरी समुदाय के उम्मीदवार को उतारने की मांग उठायी.
बाउरी समुदाय की मांग
प्रेस कॉन्फ्रेंस में बाउरी समुदाय के प्रतिनिधियों ने कहा कि सालतोड़ा विधानसभा क्षेत्र में लगभग 35 प्रतिशत आबादी बाउरी समाज की है. वर्तमान में यहां बाउरी समुदाय का विधायक है, लेकिन वह सत्ताधारी पार्टी से नहीं है. समुदाय का कहना है कि सालतोड़ा की जीत-हार काफी हद तक बाउरी वोटों पर निर्भर करती है, इसलिए तृणमूल को इसी समाज से उम्मीदवार उतारना चाहिए.2021 चुनाव का अनुभव
2021 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल ने 2016 के विजेता उम्मीदवार स्वपन बाउरी के स्थान पर संतोष मंडल को मैदान में उतारा था. इसका खामियाजा पार्टी को उठाना पड़ा. स्वपन बाउरी 2016 में 12,697 वोटों के अंतर से जीते थे, जबकि 2021 में संतोष मंडल बीजेपी की चंदना बाउरी से 4,145 वोटों से हार गये. माना जा रहा है कि बाउरी उम्मीदवार नहीं उतारने से तृणमूल को 16 हजार से अधिक वोटों का नुकसान हुआ.भाजपा और वाममोर्चा की रणनीति
2021 में भाजपा ने चंदना बाउरी को उम्मीदवार बनाया और उन्होंने करीब 45 प्रतिशत वोट हासिल कर जीत दर्ज की. 2016 में भाजपा ने बाउरी उम्मीदवार की जगह स्नेहाशीष मंडल को मैदान में उतारा था, जिन्हें मात्र 4 प्रतिशत वोट मिले थे. उसी चुनाव में वाम मोर्चा के शास्त्रीचरण बाउरी 35 प्रतिशत वोट के साथ दूसरे स्थान पर रहे थे.पत्थर उद्योग और बेरोजगारी का मुद्दा सालतोड़ा इलाका पत्थर खदान और क्रशर उद्योग के लिए जाना जाता है. यहां करीब 250 क्रशर प्लांट हैं, जिनसे लगभग 25 हजार मजदूर सीधे और 20 हजार लोग अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं. मौजूदा सरकारी नियमों के कारण यह उद्योग लगभग बंद हो गया है, जिससे करीब 45 हजार लोग बेरोजगार हुए हैं. बड़ी संख्या में मजदूरों को काम की तलाश में दूसरे राज्यों का रुख करना पड़ा है.
अभिषेक बनर्जी का आश्वासन
तृणमूल के वरिष्ठ नेता अभिषेक बनर्जी ने हाल ही में सालतोड़ा में बैठक कर क्रशर उद्योग जल्द शुरू करने का वादा किया. उनके ऐलान के बाद पत्थर खदान के पट्टे को लेकर सरकारी नोटिस भी जारी किया गया, जिससे इलाके में राजनीतिक हलचल तेज हो गयी है.
शूद्री समुदाय की अलग राय
हालांकि, सालतोड़ा में शूद्री समुदाय भी मजबूत स्थिति में है. शूद्री समुदाय के नेताओं का कहना है कि अगर तृणमूल बाउरी उम्मीदवार उतारती है और माकपाव भाजपाभी बाउरी उम्मीदवार मैदान में लाती हैं, तो बाउरी वोट बंट सकता है. उनका तर्क है कि संतोष मंडल को उम्मीदवार बनाने पर शूद्री समुदाय के करीब 30 प्रतिशत वोट और बाउरी समुदाय के एक वर्ग का समर्थन मिल सकता है.
राजनीतिक असमंजस
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि अगर तृणमूल ने उम्मीदवार चयन में संतुलन नहीं साधा, तो सालतोड़ा सीट एक बार फिर हाथ से निकल सकती है. ऐसे में बाउरी और शूद्री समुदाय के बीच संतुलन बनाना सत्ताधारी पार्टी के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है.
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