थानेदार, ट्रैफिक प्रभारी होंगे दंडित
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 29 May 2018 4:41 AM
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आसनसोल : अंडाल के थानेदार संजय चक्रवर्ती तथा उनकी सहयोगी रही अवर निरीक्षक अनन्या दे (इस समय आसनसोल ट्रॉफिक कंट्रोल रूम की प्रभारी) की नकेल राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने कसनी शुरू कर दी. दोनों को हरिजन उत्पीड़न का दोषी मानते हुए कार्रवाई तय हो गयी है. इस संबंध में आसनसोल साउथ थाना अंतर्गत कुमारपुर […]
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आसनसोल : अंडाल के थानेदार संजय चक्रवर्ती तथा उनकी सहयोगी रही अवर निरीक्षक अनन्या दे (इस समय आसनसोल ट्रॉफिक कंट्रोल रूम की प्रभारी) की नकेल राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने कसनी शुरू कर दी. दोनों को हरिजन उत्पीड़न का दोषी मानते हुए कार्रवाई तय हो गयी है.
इस संबंध में आसनसोल साउथ थाना अंतर्गत कुमारपुर निवासी शुद्धदेव रविदास ने आयोग के समक्ष शिकायत दर्ज करायी है. आयोग के चेयरमैन प्रो. (डॉ) राम शंकर कथेरिया ने इसकी अगली सुनवायी आगामी 31 जुलाई को निर्धारित की है. सुनवायी में पुलिस आयुक्त लक्ष्मी नारायण मीणा तथा जिलाशासक शंशाक सेठी भी उपस्थित रहेंगे.
क्या है मामला
श्री रविदास ने अपनी याचिका में कहा है कि उनका परिवार रियल स्टेट व जमीन क्रय-विक्रय के व्यवसाय से जुड़ा है. वे अनुसूचित जाति के हैं. कुमारपुर के टीलाबांध में उनकी पैतृक जमीन है. जिस पर कुछ दबंग पुलिस से मिल कर कब्जा करना चाहते हैं. आठ अप्रैल, 2015 को उनकी जमीन पर प्रबोध मंडल के नेतृत्व में जेसीबी से कब्जा शुरू किया गया. विरोध करने पर जातिसूचक शब्द कह कर धमकी दी गयी. साथ ही थाने में पांच लाख रूपये पहुंचाने को कहा गया.
रूपये नहीं देने पर एक सप्ताह के बाद साउथ थाना पीपी पुलिस उनके घर आयी तथा उनके भाई मनोज तथा कर्मी जयंत बाउरी को पकड़ कर ले गयी. पीपी कार्यालय में थाना प्रभारी श्री चक्रवर्ती तथा पीपी प्रभारी एसआइ सुश्री दे के समक्ष उन्हें पेश किया गया. दोनों ने जाति सूचक शब्दों का उपयोग कर अपमानित किया.
पांच लाख रूपये की राशि की मांग की. इंकार करने पर भादवि की धारा 341, 323,325, 326, 307, 506, 34 तथा 25 व 27 आर्म्स एक्ट के तहत झूठे मुकदमे में गिरफ्तार कर कोर्ट में भेज दिया. साक्ष्य के अभाव में दोनों को कोर्ट से जमानत मिल गयी. पुलिस ने उनके सहयोगी सुरेश यादव, भाई विजय तथा विनय को एनकाउंटर करने की धमकी दी तथा इस कांड में आरोपी बनाया.
इसके बाद सभी ने कोर्ट में सरेंडर कर जमानत ली. इसके बाद उन्होंने आयोग के पास न्याय की गुहार लगायी. आयोग ने इस मामले में अब तक कई बार सुनवाई की है.
पिछली सुनवाई हुई 24 अप्रैल को
पिछली सुनवायी बीते 24 अप्रैल को आयोग के समक्ष हुयी. बैठक में जिला प्रशासन के प्रतिनिधि के रूप में अतिरिक्त जिलाशासक खुर्शीद कादरी तथा पुलिस आयुक्त के प्रतिनिधि के रूप में पुलिस उपायुक्त कुमार गौतम उपस्थित थे. पंचायत चुनाव के कारण पुलिस आयुक्त ने उपस्थित न होने की अनुमति मांगी थी, जिसे सुनवाई के दौरान आयोग ने मंजूर नहीं किया.
याचिकाकर्त्ता श्री रविदास ने कहा कि वह और उसके परिजन इन दो पुलिस अधिकारियों द्वारा प्रताड़ित तथा झूठे मामले में फंसाये गये हैं. झूठे मामले में उनके खिलाफ कोर्ट में आरोप पत्र जमा कर दिया गया है. उन्हें लगातार प्रताड़ित किया जा रहा है.
डीएम को भी मिला निर्देश
आयोग ने पश्चिम बर्दवान के जिलाशासक को भी सलाह दी है कि इस अधिनियम के तहत दर्ज होनेवाले मामलों को संज्ञान में ले तथा पुलिस अधिकारियों के खिलाफ होने पर इनकी मॉनीटरिंग करें. उन्हें कहा गया कि आईपीसी की धारा 173(8) के तहत संबंधित लोक अभियोजक से इस संबंध में बात करे.
लोक अभियोजक कोर्ट को अवगत कराये कि याचिकाकर्त्ता के खिलाफ कोर्ट में गलत तरीके से आरोप पत्र जमा किया गया है. जिसकी पुष्टि पुलिस आयुक्त ने अपने पत्र में की है.
सीपी, डीएम को हाजिर रहने का सम्मन
आयोग ने पुलिस आयुक्त श्री मीणा तथा जिलाशासक श्री सेठी को आगामी 31 जुलाई को आयोग के कार्यालय मं उपस्थित रहने को कहा है ताकि उनकी मौजूदगी में अगली सुनवाई हो सके.
आयोग का रहा कड़ा रूख
आयोग चेयरमैन डॉ कथेरिया के अनुसार पुलिस आयुक्त की रिपोर्ट में कहा गया है कि दोनों अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की गयी है. उन्हें याचिकाकर्त्ता के गोदाम में गैरकानूनी तरीके से छापेमारी करने, जाति आधारित गाली देने तथा भादवि की धारा 326, 385 व अन्य धाराओं के तहत झूठी प्राथमिकी दर्ज करने का दोषी पाया गया.
उन्हें दंडित भी किया जा चुका है. लेकिन दोनों के खिलाफ एससी,एसटी पीओए एक्ट 1989 के तहत कोई साक्ष्य नहीं मिला. आयोग ने इस पर सवाल खड़े कर दिये. उसने कहा कि पुलिस आयुक्त ने स्वीकार किया है कि दोनों पुलिस अधिकारियों ने याचिकाकर्त्ता को प्रताड़ित किया तथा दंडित किये गये. इससे स्वत: दिखता है कि दोनों इस एक्ट की धारा 3(1)(आठ), (नौ) तथा 3(2)(एक) (दो), (सात) के दोषी है.
इस मामले में पुलिस महानिदेशक तथा प्रिंसिपल सेक्रेटरी (गृह) को भी पुलिस आयुक्त को सलाह देने को कहा गया है. इस मामले में आयोग ने हलफनामा भी मांगा है कि आखिरकार इन दो पुलिस अधिकारियों के खिलाफ इस अधिनियम की धारा क्यों नहीं लागू होती है?
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