Ranchi News : सखी फूल लोढ़े चलु फुलवरिया...

Published by :MUNNA KUMAR SINGH
Published at :23 Jul 2025 8:20 PM (IST)
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Ranchi News : सखी फूल लोढ़े चलु फुलवरिया...

मिथिला की संस्कृति अपने विशिष्ट रीति-रिवाजों, परंपराओं और लोक जीवनशैली के लिए जानी जाती है.

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परंपरा, आस्था और पर्यावरण चेतना का संदेश देता है मधुश्रावणी

मायके में नागदेवता की पूजा और कथा सुन उत्सव मना रही हैं नवविवाहिताएं

मिथिला संस्कृति की झलक के साथ सजी मधुश्रावणी की रंगारंग शाम

रांची(लता रानी). मिथिला की संस्कृति अपने विशिष्ट रीति-रिवाजों, परंपराओं और लोक जीवनशैली के लिए जानी जाती है. इसी परंपरा का एक अद्वितीय और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध पर्व है मधुश्रावणी. इन दिनों मैथिल परिवारों में पूरी आस्था और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है. यह पर्व विशेष रूप से नवविवाहिताओं द्वारा अपने मायके में मनाया जाता है और वैवाहिक जीवन की मंगलकामना से जुड़ा होता है. इस वर्ष यह अनुष्ठान 15 जुलाई से शुरू होकर 27 जुलाई को समाप्त होगा. दो सप्ताह तक चलने वाले इस पर्व के दौरान नवविवाहिता व्रत रखती हैं. प्रतिदिन पूजा करती हैं. मिथिला की पारंपरिक लोक कथाओं को सुनती हैं. पहले यह पर्व केवल घरों में मनाया जाता था. वहीं, अब मिथिला समाज की महिलाएं इस उत्सव को सामूहिक रूप देने की दिशा में प्रयासरत हैं. झारखंड मिथिला मंच जैसे संगठन वर्षों से रांची में सामूहिक मधुश्रावणी महोत्सव का आयोजन कर रहे हैं. नवविवाहिताओं को आमंत्रित कर परंपराओं से जोड़ा जाता है. झारखंड मिथिला मंच की महासचिव निशा झा बताती हैं कि वर्ष 1916 से मंच इस पर्व को संगठित रूप से मना रहा है. नवविवाहिताओं को आमंत्रित कर उन्हें अपनी संस्कृति से जोड़ा जाता है.

हर दिन विशेष कथा सुनने की परंपरा

मधुश्रावणी सावन महीने के कृष्ण पक्ष की पंचमी से प्रारंभ होकर शुक्ल पक्ष की तृतीया तक मनाया जाता है. नवविवाहिताएं हर दिन नागदेवता, विषहरा, शिव-गौरी, सूर्य, चंद्रमा और नवग्रहों की पूजा करती हैं. परंपरा के अनुसार पूजा में बासी फूलों का विशेष स्थान होता है. हर दिन विशिष्ट कथाएं सुनाई जाती हैं, जैसे मौना पंचमी, मनसा देवी, समुद्र मंथन, सती कथा, गौरी तपस्या, कार्तिकेय जन्म आदि. पूजा महिला पुरोहितों द्वारा करायी जाती है, जो कथा-वाचन भी करती हैं.

सामूहिक लोक गीतों का गान, पर्व को बनाता है खास

लोक गीतों और भजनों की मधुर स्वर लहरियों से वातावरण भक्तिमय हो उठता है “सखी फूल लोढ़े चलु फुलवरिया…”, “बेटी है भेजै छी भैया के ओझा जी एबे कारथिन्ह न…” जैसे पारंपरिक गीतों के माध्यम से. मधुश्रावणी न केवल वैवाहिक जीवन की मंगलकामना का पर्व है, बल्कि यह पर्यावरण से जुड़ाव और प्रकृति के सम्मान का भी प्रतीक है. पेड़-पौधों, फूल-पत्तियों का उपयोग, लोक कथाएं और समर्पण यह सब मिलकर इस पर्व को संपूर्ण सांस्कृतिक अनुष्ठान बना देते हैं.

क्या कहती हैं नवविवाहिताएं…

मां के साथ कथा सुनना सुखद अहसास

आरुषी श्रेया झा, आइटी प्रोफेशनल, गुड़गांव से रांची आयी हैं. कहती हैं यह पर्व मेरे लिए आत्मिक जुड़ाव का अनुभव है. मां के साथ कथा सुनना और व्रत करना बेहद सुखद है.

हर दिन उत्सव जैसा माहौल

पम्मी ठाकुर, दीपाटोली, रांची बताती हैं कि ससुराल में सासू मां के सहयोग से हर दिन उत्सव जैसा माहौल रहता है. पूजा, फूल तोड़ना और डलिया सजाना बहुत अच्छा लगता है.

यह मेरा पहला मधुश्रावणी

प्रतिक्षा झा, कुसुम विहार कहती हैं कि दुल्हन की तरह सज कर हर दिन पूजा करना मेरे लिए सौभाग्य है. यह मेरा पहला मधुश्रावणी है. श्रेया चौधरी, चुटिया, जो मूल रूप से उत्तर प्रदेश की रहने वाली हैं, बताती हैं कि हमारे यहां यह परंपरा नहीं है, लेकिन ससुराल में व्रत कर बहुत अच्छा लग रहा है. सासू मां से विधिवत सीख रही हूं.

यह पर्व हमारी संस्कृति की खूबसूरती

निधि झा, सिंह मोड़ कहती हैं कि यह पर्व हमारी संस्कृति की खूबसूरती है. फूल तोड़ना, पूजा करना और कथा सुनना एक आध्यात्मिक अनुभव है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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