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जेल से निकलने के बाद भाकपा माओवादी पोलित ब्यूरो सदस्य रहे नारायण सान्याल ने कहा

Updated at : 21 Nov 2014 8:15 AM (IST)
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जेल से निकलने के बाद भाकपा माओवादी पोलित ब्यूरो सदस्य रहे नारायण सान्याल ने कहा

हजारीबाग जेल से निकलने के बाद रांची में की पत्रकार वार्ता रांची : जब हथियार ही छोड़ देंगे, तो फिर सरकार से वार्ता किस बात की होगी. यह सही रास्ता नहीं है. यह बात भाकपा माओवादी के पोलित ब्यूरो सदस्य रहे नारायण सान्याल ने कही. उन्होंने गृह मंत्री राजनाथ सिंह के बयान, जिसमें माओवादियों को […]

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हजारीबाग जेल से निकलने के बाद रांची में की पत्रकार वार्ता

रांची : जब हथियार ही छोड़ देंगे, तो फिर सरकार से वार्ता किस बात की होगी. यह सही रास्ता नहीं है. यह बात भाकपा माओवादी के पोलित ब्यूरो सदस्य रहे नारायण सान्याल ने कही. उन्होंने गृह मंत्री राजनाथ सिंह के बयान, जिसमें माओवादियों को हथियार छोड़ कर मुख्यधारा में आने को कहा था, का विरोध किया.

उन्होंने कहा कि बातचीत का सवाल कहां है. बातचीत के कारण ही हमारे नेता आजाद मारे गये. एक पत्रकार और एक ग्रामीण को भी पुलिस ने फरजी मुठभेड़ में मार दिया. नारायण सान्याल गुरुवार को हजारीबाग जेल से बाहर आये. वहां से वह अपनी बहन के साथ रांची पहुंचे. नामकुम के कालीनगर स्थित मानवाधिकार कार्यकर्ता शशिभूषण पाठक के घर पर उन्होंने पत्रकारों से बात की. यह पूछे जाने पर कि क्या सिस्टम को बदलने का एकमात्र रास्ता हथियारबंद संघर्ष ही है, उन्होंने कहा : हम ऐसा मानते हैं, पर आप लोग फंसाइये नहीं.

पुलिस हमें फिर जेल भेज देगी. उन्होंने कहा कि सिस्टम को बदलने का एकमात्र यही रास्ता है. यह एक विचारधारा है. माओवादी जो कर रहे हैं, सही कर रहे हैं. इसमें गलतियां भी होती होंगी, लेकिन यह सब 2006 से पहले की बात है. अभी क्या हो रहा है, इसकी मुझे जानकारी नहीं है.

संगठन में भ्रष्टाचार के कारण आत्मग्लानि होती है

भाकपा माओवादी में भ्रष्टाचार और संगठन से टूट कर कई संगठन बनने के सवाल पर नारायण सान्याल ने कहा कि यह भयानक व डरावनी स्थिति है. आत्मग्लानि होती है. क्योंकि बहुत सारे लोग जो हमारे साथी थे, आज दूसरी पार्टियों में चले गये. चूक कहां हुई, के सवाल पर उन्होंने कहा कि गड़बड़ियां सोसाइटी की देन है, पर हम जिम्मेदारी से नहीं बच सकते. सदस्यों के चुनाव के वक्त हम सही तरीके से स्क्रीनिंग नहीं कर सके. संगठन के कुछ लोगों में भ्रष्टाचार है. कितना है यह कहना मुश्किल है.

माओवादी बैकफुट पर हैं

आज भाकपा माओवादी संगठन बैकफुट पर हैं. इस बात से नारायण सान्याल सहमत हैं. उन्होंने कहा कि इसकी वजह सरकार की पुलिसिया कार्रवाई नहीं है. इसकी असल वजह यह है कि हम सोसाइटी में कितना सक्रिय रह पाये या समाज को क्या दे पाये? अब तक समाज को हम कोई निर्णायक व्यवस्था नहीं दे पाये. इससे आम जनता निराश है.

जेलों में इलाज की स्थिति भयावह

नारायण सान्याल ने कहा कि झारखंड के जेलों में बंदियों के इलाज की व्यवस्था की स्थिति भयावह है. कोई व्यवस्था नहीं है. सबसे खराब स्थिति यह है कि जेलों के भीतर हो रही घटनाओं की सूचना बाहर मीडिया तक नहीं पहुंचती है. यहां तक की अधिवक्ता को भी जेल में बंदियों से मिलने नहीं दिया जाता है. गिरिडीह और हजारीबाग जेल में रहते हुए उन्होंने कभी अपने अधिवक्ता का चेहरा

नहीं देखा.

मेरा अपहरण कर पुलिस ने प्रताड़ित किया

नारायण सान्याल ने अपनी गिरफ्तारी के बारे में बताया कि वर्ष 2005 के दिसंबर माह में वह रायपुर में थे. सड़क पर घूम रहे थे. तभी आंध्रप्रदेश की ग्रे-हाउंड फोर्स ने उनका अपहरण कर लिया. उन्हें खम्माम ले जाया गया. पुलिस उनकी हत्या कर देती, लेकिन उनके अपहरण की सूचना लीक हो गयी. इसके बाद पुलिस ने तीन जनवरी 2006 को उनकी गिरफ्तारी को सार्वजनिक किया. उन्होंने आरोप लगाया कि पांच-छह दिन तक उन्हें प्रताड़ित किया गया. जिस केस में खम्माम पुलिस ने गिरफ्तार किया, उसमें तीन माह के भीतर चाजर्शीट ही दाखिल नहीं की गयी. इस कारण उन्हें जमानत मिल गयी.

लेकिन जेल से बाहर निकालने के बजाय उन्हें अप्रैल 2006 में दंतेवाड़ा ले जाया गया और उन्हें हत्या के एक मामले में जेल भेज दिया गया. वहीं पर एक अन्य मामले में अदालत ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा दी. वर्ष 2011 में उन्हें गिरिडीह लाया गया. यहां वर्ष 2005 में होमगार्ड मुख्यालय में हुई हथियारों की लूट के मामले में जेल भेजा गया. इस केस के खत्म होने के बाद सरकार ने वर्ष 2012 में उन पर एनएसए लगा दिया. जुलाई 2014 में इसमें भी जमानत मिल गयी.

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