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पेसा कानून के प्रावधानों का पालन नहीं हुआ

Updated at : 28 Jul 2019 12:53 AM (IST)
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पेसा कानून के प्रावधानों का पालन नहीं हुआ

रांची : पेसा कानून 24 दिसंबर 1996 में राष्ट्रपति की लिखित सहमति के बाद लागू हुआ. यह ऐसा कानून है जो आदिवासियों की भाषा संस्कृति, कस्टमरी लॉ, पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था, जल, जंगल, जमीन की रक्षा करता है. उक्त बातें आदिवासी बुद्धिजीवी मंच के प्रतिनिधि विक्टर मालतो ने कहा. वे मंच के तत्वावधान में मोरहाबादी स्थित […]

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रांची : पेसा कानून 24 दिसंबर 1996 में राष्ट्रपति की लिखित सहमति के बाद लागू हुआ. यह ऐसा कानून है जो आदिवासियों की भाषा संस्कृति, कस्टमरी लॉ, पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था, जल, जंगल, जमीन की रक्षा करता है. उक्त बातें आदिवासी बुद्धिजीवी मंच के प्रतिनिधि विक्टर मालतो ने कहा. वे मंच के तत्वावधान में मोरहाबादी स्थित डॉ रामदयाल मुंडा जनजातीय शोध संस्थान में पी पेसा पर आयोजित राज्यस्तरीय सेमिनार में मुख्य वक्ता के तौर पर बोल रहे थे.

उन्होंने कहा कि झारखंड के 12 जिले अनुसूचित क्षेत्र के तहत आते हैं. इन क्षेत्रों में पंचायती राज व्यवस्था अौर नगरपालिका का गठन नहीं हो सकता. झारखंड में पेसा कानून के मूल प्रावधानों को कभी लागू ही नहीं किया गया. पेसा एक्ट की धारा 3,4, 4(एम), 4(अो), धारा 5 तथा अनुच्छेद 244(1) के तहत अनुसूचित क्षेत्रों में स्वशासी जिला परिषद अौर जनजातीय ग्राम सभा की स्थापना होनी चाहिए थी.
स्वशासी जिला परिषद अपने इलाके में स्वशासन अौर नियंत्रण के लिए अधिकृत है. वह जमीन, जमीन से हस्तांतरण अौर महाजनों पर अंकुश लगाने पर निर्णय लेने के लिए सक्षम है. अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा को विशेष शक्तियां प्राप्त है. इसके तहत प्रत्येक ग्राम सभा इतनी सक्षम होगी कि वह पारंपरिक रीति रिवाज को संरक्षित कर सके. पेसा कानून के तहत लघु वनोपज पर भी ग्रामीणों का अधिकार है.
कानून के बाद भी हम अपनी सुरक्षा नहीं कर पा रहे : कंडुलना
अध्यक्षता कर रहे वाल्टर कंडुलना ने कहा कि पांचवी अनुसूची में स्पष्ट है कि हमें अपने क्षेत्र में प्रशासन पर नियंत्रण का अधिकार है. इन कानूनों के बाद भी हम अपनी सुरक्षा नहीं कर पा रहे हैं. आदिवासियों की 30 लाख एकड़ भूमि छीनी जा चुकी है. पूर्व विधायक देवेंद्र नाथ चंपिया ने कहा कि आदिवासी समाज के राजनेताअों, बुद्धिजीवियों ने भी ठीक से पेसा कानून के प्रावधानों को नहीं समझा.
उनकी नासमझी अौर लापरवाही की वजह से आदिवासियों के हक अधिकार को नुकसान हुआ. सेमिनार को वाणिज्य कर विभाग के पूर्व आयुक्त बासिल किड़ो, पूर्व इनकम टैक्स कमिश्नर एतवा मुंडा सहित अन्य ने भी संबोधित किया.
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