झारखंड की पारंपरिक थाली में छिपा है बीमारियों का इलाज : डॉ मोहिनी गुप्ता

Published by : Akarsh Aniket Updated At : 09 May 2026 9:39 PM

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झारखंड की पारंपरिक थाली में छिपा है बीमारियों का इलाज : डॉ मोहिनी गुप्ता

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प्रतिनिधि, मेदिनीनगर

पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्मृति नगर भवन में योध सिंह नामधारी महिला महाविद्यालय द्वारा झारखंड स्टेट हायर एजुकेशन काउंसिल के सहयोग से आयोजित दो दिवसीय बहुविषयक सेमिनार का शनिवार को समापन हो गया. इसकी अध्यक्षता वाइएसएन महिला महाविद्यालय के प्राचार्या डा मोहिनी गुप्ता ने की. सेमिनार का मुख्य विषय व्हेयर कल्चर मीट्स न्यूट्रिशन झारखंड लोकल फूड फॉर अ सस्टेनेबल टुमारो (जहां संस्कृति और पोषण का मिलन होता है: सतत भविष्य के लिए झारखंड का स्थानीय भोजन) था.समापन समारोह के दूसरे दिन मुख्य रिसोर्स पर्सन के रूप में सिद्धू कानू विश्वविद्यालय के पीजी अंग्रेजी विभाग की डॉ अंजुला मुर्मू ने झारखंड की संथाल जनजाति की खान-पान संस्कृति और समृद्ध परंपरा पर विस्तार से प्रकाश डाला.उन्होंने मशरूम, मडुआ (रागी), लाल चींटी की चटनी और पारंपरिक फर्मेंटेड ड्रिंक्स (हड़िया आदि) के पोषक तत्वों के बारे में बताया. उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज में प्रचलित इन पारंपरिक भोज्य पदार्थों के सेवन से कुपोषण और एनीमिया (खून की कमी) जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से प्रभावी ढंग से बचा जा सकता है.कार्यक्रम में डॉ रणवीर सिंह ने किसानों और युवाओं को इंटीग्रेटेड फार्मिंग सिस्टम (एकीकृत कृषि प्रणाली) अपनाने की सलाह दी, ताकि आय के साथ-साथ पोषण भी सुनिश्चित हो सके. पलामू के पूर्व आयुक्त डॉ जटाशंकर चौधरी ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि जनजातीय ज्ञान धीरे-धीरे विलुप्त हो रहा है, जिसे जीवित रखना और आगे बढ़ाना आज की जरूरत है. उन्होंने सरकार की विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं की भी जानकारी दी जो इन समस्याओं के समाधान में सहायक हो सकती हैं.

झारखंड के खाद्य पदार्थ और पौष्टिक आहार को वैश्विक पहचान दिलाने की जरूरत

सेमिनार के समापन पर संयोजिका डॉ मिनी टुडू ने दो दिवसीय संगोष्ठी की विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की. उन्होंने कहा कि झारखंड की पहचान केवल खनिजों से नहीं, बल्कि यहां की समृद्ध जनजातीय संस्कृति और पारंपरिक ज्ञान से भी है. आज दुनिया लाइफस्टाइल बीमारियों और खाद्य असुरक्षा से जूझ रही है. हमारे स्थानीय और पारंपरिक खाद्य पदार्थ सस्टेनेबल न्यूट्रिशन का सबसे बेहतर विकल्प हैं. ये न केवल पोषण से भरपूर हैं, बल्कि पर्यावरण के अनुकूल भी हैं. प्रधानमंत्री का यह मंत्र केवल स्थानीय वस्तुओं को अपनाना नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी, अपने किसानों और अपनी परंपराओं का सम्मान करना है. झारखंड के स्थानीय खाद्य पदार्थ और यहाँ के पौष्टिक उत्पादों को वैश्विक पहचान दिलानी होगी. इस संगोष्ठी के माध्यम से कृषि, खाद्य विज्ञान, महिला उद्यमिता और अनुसंधान जैसे विभिन्न आयामों पर चर्चा कर पारंपरिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का रोडमैप तैयार किया गया है. सेमिनार में आभा मुखर्जी, अनुज भारती, गुलपसा परवीन, पंखुरी कुमारी, शिवानी सिंह, कुमारी कल्पना, डॉ संगीता कुजूर, विजया लक्ष्मी सहित अन्य ने अपने विचार रखे. मंच संचालन डॉ ललित भगत ने किया, जबकि मिस शालिनी मुर्मू ने सभी अतिथियों और प्रतिभागियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया.

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