डेपुटेशन कैंसिल होते ही फुर्र हो गए पलामू के 11 टीचर, सात महीने बाद भी नहीं लौटे ऑरिजनल स्कूल

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पलामू में शिक्षकों की मनमानी से स्कूल खाली. एआई जेनरेटेड प्रतीकात्मक तस्वीर.

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Palamu Teacher: पलामू के पाटन प्रखंड में डेपुटेशन रद्द होने के सात महीने बाद भी 11 शिक्षक अपने मूल विद्यालय में नहीं लौटे हैं. जिला शिक्षा अधीक्षक के आदेश के बावजूद शिक्षक जिला मुख्यालय में जमे हैं. ग्रामीणों ने इसे शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल बताते हुए कार्रवाई नहीं होने पर आंदोलन की चेतावनी दी है. इससे संबंधित पूरी खबर नीचे पढ़ें.

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पलामू से रामनरेश तिवारी की रिपोर्ट

Palamu Teacher: झारखंड के पलामू जिले के पाटन प्रखंड में शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक गंभीर मामला सामने आया है. यहां के विभिन्न स्कूलों में डेपुटेशन (प्रतिनियोजन) पर कार्यरत 11 शिक्षक और शिक्षिकाओं का डेपुटेशन रद्द कर दिया गया. इसके बाद वे सभी 11 शिक्षक अब तक अपने ऑरिजनल स्कूल में योगदान देने नहीं पहुंचे हैं. जिला शिक्षा अधीक्षक की ओर से स्पष्ट निर्देश जारी होने के बावजूद करीब सात महीने बाद भी इन शिक्षकों ने आदेश का पालन नहीं किया है.

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जिला शिक्षा अधीक्षक ने जारी किया था आदेश

जानकारी के अनुसार, 18 जुलाई को इस मामले को लेकर खबर प्रकाशित होने के बाद जिला शिक्षा विभाग हरकत में आया था. इसके बाद 30 जुलाई 2025 को जिला शिक्षा अधीक्षक ने पत्रांक 1029 जारी करके कार्यरत 11 शिक्षकों का डेपुटेशन रद्द कर दिया. साथ ही, उन्हें दो दिनों के भीतर अपने ऑरिजनल स्कूल में योगदान देने का निर्देश दिया गया था. खबर ये भी मिल रही है कि विभागीय आदेश के बावजूद ये सभी 11 शिक्षक अब भी जिला मुख्यालय के आसपास ही जमे हुए हैं और ऑरिजनल में योगदान देने नहीं जा रहे.

सरकार की नई व्यवस्था के बावजूद जारी है गड़बड़ी

झारखंड सरकार ने स्कूलों में बच्चों की संख्या और विषयवार शिक्षकों की जरूरत को देखते हुए शिक्षकों की पदस्थापना की व्यवस्था लागू की है. इस व्यवस्था के तहत यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया है कि हर विद्यालय में पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध रहें. इसके बावजूद कुछ शिक्षक अपने प्रभाव और पैरवी के दम पर डेपुटेशन कराकर शहर में ही रहना पसंद कर रहे हैं. इससे ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों में पढ़ाई प्रभावित हो रही है.

ग्रामीणों ने जताई नाराजगी

इस मामले को लेकर ग्रामीणों में भी नाराजगी देखने को मिल रही है. ग्रामीणों का कहना है कि शिक्षक अपनी सुविधा के लिए शहर में रहना चाहते हैं और गांव के स्कूलों में पढ़ाने से बचते हैं. उनका आरोप है कि शिक्षकों की ऊंची पहुंच और पैरवी के कारण विभाग के अधिकारी भी इस मामले में कोई ठोस कार्रवाई नहीं कर रहे हैं. ग्रामीणों के अनुसार इसका सबसे ज्यादा नुकसान गांव के बच्चों की पढ़ाई पर पड़ रहा है.

सीमित अवधि के लिए होता है डेपुटेशन

सरकारी नियमों के अनुसार, किसी भी शिक्षक का डेपुटेशन आम तौर पर तीन महीने के लिए किया जाता है. विशेष परिस्थितियों में इसे छह महीने तक बढ़ाया जा सकता है. इसके बाद, संबंधित शिक्षक को अनिवार्य रूप से अपने ऑरिजनल स्कूल में लौटना होता है. लेकिन पाटन प्रखंड के इस मामले में नियमों की अनदेखी साफ तौर पर दिखाई दे रही है. सात महीने बीत जाने के बाद भी शिक्षक अपने ऑरिजनल स्कूल में नहीं लौटे हैं.

अभिभावकों ने दी आंदोलन की चेतावनी

पाटन मध्य के पूर्व जिला परिषद सदस्य नंदकुमार राम ने इस मामले को गंभीर बताते हुए कहा कि शिक्षकों की पहुंच और पैरवी के कारण विभागीय अधिकारी भी कार्रवाई करने से बच रहे हैं. उन्होंने कहा कि यदि जल्द ही इस मामले में कार्रवाई नहीं की गई तो बच्चों के अभिभावकों को एकजुट कर आंदोलन किया जाएगा. उनका कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों के भविष्य के साथ किसी भी तरह का समझौता नहीं किया जा सकता.

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शिक्षा व्यवस्था पर उठ रहे सवाल

इस पूरे मामले ने जिले की शिक्षा व्यवस्था पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं. एक ओर सरकार ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा व्यवस्था मजबूत करने की बात करती है, वहीं दूसरी ओर आदेश जारी होने के बावजूद शिक्षक मूल विद्यालय में नहीं लौट रहे हैं. यदि जल्द ही इस पर कार्रवाई नहीं होती है, तो आने वाले समय में यह समस्या और गंभीर हो सकती है.

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